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दिल्ली में 2000 करोड़ का जमीन घोटाला, सरकार खामोश क्यों

दिल्ली के मशहूर अपोलो हॉस्पिटल के पास ‘राधाकृष्ण विहार’ नाम की एक जगह है. प्रसिद्ध साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल के शब्दों में कहें तो जैसे कि सत्य के होते हैं, इस राधाकृष्ण विहार के भी कई पहलू हैं. सरकारी दस्तावेज और अधिकारी बताते हैं कि राधाकृष्ण विहार सरकारी जमीन पर बसा है. जबकि कुछ अन्य लोग, जिनका इस पर कब्ज़ा है, कहते हैं कि यह उनके पुरखों की जमीन है. बहरहाल, मौके पर स्थिति यह है कि राधाकृष्ण विहार में कुछ दर्जनभर झुग्गियां और लगभग इतनी ही दुकानें बनी हुई हैं. पक्की दीवार और कच्ची छतों वाली ये लगभग सभी दुकानें किराए पर चढ़ी हुई हैं.

आरोप हैं कि राधाकृष्ण विहार दिल्ली के सबसे बड़े जमीन घोटाले का हिस्सा है और कई छोटे-बड़े नेता और अधिकारियों के हित इससे जुड़ते हैं. कुछ साल पहले इस इलाके को, दिल्ली के कई अन्य इलाकों की तरह, अनधिकृत कॉलोनियों में शामिल कर लिया गया था. लेकिन इसके कुछ ही समय बाद यह खुलासा हुआ कि यहां कोई कॉलोनी थी ही नहीं और इसे अनधिकृत कॉलोनी में शामिल करवाना कुछ भूमाफियाओं की साजिश थी जो सैकड़ों करोड़ की इस जमीन को हथियाना चाहते थे. इस पूरे घोटाले की कागजी पड़ताल करने और कानूनी पेचों में उलझी स्थिति को समझने से पहले राधाकृष्ण विहार की वर्तमान स्थिति को थोड़ा विस्तार से समझते हैं.

जसोला अपोलो मेट्रो स्टेशन से बेहद नजदीक बसे राधाकृष्ण विहार में रहने वाले अधिकतर वे लोग हैं जो मेट्रो स्टेशन के बाहर ठेला लगाने का काम करते हैं. लेकिन दिल्ली की अन्य झुग्गी बस्तियों की तरह यहां इन लोगों की अपनी कोई झुग्गियां नहीं हैं. राधाकृष्ण विहार के कच्चे मकानों या झुग्गियों में रहने के लिए इन लोगों को हर महीने किराया चुकाना पड़ता है. यही स्थिति यहां बनीं दुकानों की भी है.

निरंजन सिंह को कई लोग ‘पप्पी भैया’ कहकर भी बुलाते हैं. वही पप्पी भैया जिनका जिक्र अहमद ने कुछ देर पहले हमसे किया था. निरंजन सिंह असल में कांग्रेसी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सचिन पायलट के निजी सचिव हैं

यहां की अधिकतर दुकानें कार मैकेनिकों ने किराए पर ली हैं. ऐसी ही एक दुकान अहमद की भी है. वे पिछले ढाई साल से यहां मैकेनिक का काम कर रहे हैं. अहमद बताते हैं कि जब उन्होंने यह दुकान किराए पर ली थी तब इसका किराया छह हजार रूपये प्रतिमाह हुआ करता था. आज वे इस दुकान का दस हजार रूपये किराया चुका रहे हैं. यह पूछने पर कि वे किराया किसे देते हैं, अहमद बताते हैं, ‘यहां की सभी दुकानें पप्पी भैया की हैं. हम कभी पप्पी भैया को किराया देते हैं और कभी उनके किसी आदमी को.’

हम अहमद को यह नहीं बताते कि हम पत्रकार हैं. हम उनसे यह कहते हुए मिलते हैं हमें भी इस इलाके में किराए की एक दुकान चाहिए. ‘यहां दुकान लेने के लिए किससे बात करनी होगी?’ इस सवाल के जवाब में अहमद कहते हैं. ‘पास में ही एक दुकान है. पप्पी भैया जब भी आते हैं वहीं बैठते हैं. वे या उनका कोई आदमी वहां बैठा होगा. आप लोग उनसे बात कर लीजिये.’

अहमद की बताई दुकान में दाखिल होने पर हम देखते हैं कि यह एक बड़ा-सा कमरा है जिसमें तीन चारपाई और कुछ कुर्सियां रखी हैं. इनमें से एक चारपाई पर राम कुमार नाम का एक पुलिसकर्मी अपनी वर्दी पहने लेटा है और दूसरी चारपाई पर एक अन्य व्यक्ति सो रहा है. यह दूसरा व्यक्ति भी शायद कोई पुलिसकर्मी ही है क्योंकि पुलिस की एक वर्दी कमरे की दीवार पर भी लटकी हुई है. हमारे यहां दाखिल होने पर राम कुमार हमारा परिचय पूछते हैं. यह बताने पर कि हम किराए की दुकान के सिलसिले में यहां आए हैं, राम कुमार कहते हैं, ‘अभी जमीन के मालिक कहीं बाहर गए हैं.’ वे हमें एक फ़ोन नंबर भी देते हैं जो उन्हें जुबानी याद है और कहते हैं, ‘यह निरंजन सिंह जी का फ़ोन नंबर है. इनसे आप किराए की दुकान की बात कर सकते हैं. निरंजन जी ही इस जमीन के मालिक हैं.’

निरंजन सिंह को कई लोग ‘पप्पी भैया’ कहकर भी बुलाते हैं. वही पप्पी भैया जिनका जिक्र अहमद ने कुछ देर पहले हमसे किया था. निरंजन सिंह असल में कांग्रेसी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सचिन पायलट के निजी सचिव हैं. कांग्रेस की वेबसाइट पर सचिन पायलट से संबंधित जो जानकारी मिलती है, उसमें भी निरंजन सिंह का नाम और वही फ़ोन नंबर मौजूद है जो राम कुमार ने हमें दिया है. राधाकृष्ण विहार में बसी इन तमाम दुकानों का किराया निरंजन सिंह और उनके परिवार वालों के पास ही जाता है. निरंजन स्वयं तो कांग्रेसी नेता सचिन पायलट से जुड़े हैं लेकिन उनके अन्य भाई भाजपा में हैं.

अबुल फज़ल एन्क्लेव पार्ट-2 एक्सटेंशन और कोटला महिग्राम एक्सटेंशन भी ऐसी ही फर्जी कॉलोनियां थी जिनमें ब्रह्म सिंह और उनके भाइयों ने अपनी रिहायशें दर्शायी थीं और प्रोविजनल सर्टिफिकेट ऑफ़ रेगुलराईजेशन जारी करवा लिए थे

निरंजन सिंह के एक भाई ब्रह्म सिंह पिछले चुनावों में ओखला विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के प्रत्याशी थे और एक अन्य भाई बीर सिंह, भाजपा से ही निगम पार्षद हैं. इन सभी भाइयों का सिर्फ राधाकृष्ण विहार की इसी जमीन पर नहीं बल्कि ओखला विधानसभा क्षेत्र की कुल सौ बीघा से ज्यादा सरकारी जमीन पर कब्ज़ा है जिसकी कुल कीमत दो हजार करोड़ रूपये के करीब मानी जाती है. इन जमीनों पर बसे सैकड़ों लोगों से लाखों रूपये का किराया भी प्रतिमाह निरंजन सिंह और उनके भाइयों द्वारा ही वसूला जाता है.

ब्रह्म सिंह और उनके भाइयों द्वारा इन तमाम जमीनों को कब्जाने का सिलसिला 2008 में शुरू हुआ था. उस वक्त तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने दिल्ली विधानसभा चुनावों से ठीक दो महीने पहले दिल्ली की 1239 अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने की घोषणा की थी. इन सभी अनधिकृत कॉलोनियों को तब नियमितीकरण के अस्थायी प्रमाण पत्र भी बांटे गए थे. आधिकारिक भाषा में इन्हें ‘प्रोविजनल सर्टिफिकेट ऑफ़ रेगुलराईजेशन’ (पीसीआर) कहा जाता है. 2008 में चुनावी लाभ लेने के लिए यह काम बहुत तेजी से किया गया था. इस कारण कई भूमाफियाओं को इस पूरी प्रक्रिया का लाभ उठाने का मौका मिल गया. नियमितीकरण की आड़ में कुछ भूमाफियाओं ने ऐसी-ऐसी कॉलोनियों के नाम पर भी पीसीआर जारी करवा लिए जिनका असल में कोई अस्तित्व ही नहीं था. राधाकृष्ण विहार भी ऐसी ही एक बोगस कॉलोनी थी. इसके साथ ही अबुल फज़ल एन्क्लेव पार्ट-2 एक्सटेंशन और कोटला महिग्राम एक्सटेंशन भी ऐसी ही फर्जी कॉलोनियां थी जिनमें ब्रह्म सिंह और उनके भाइयों ने अपनी रिहायशें दर्शायी थीं और पीसीआर जारी करवा लिए थे.

इस पूरे फर्जीवाड़े का खुलासा 2011 में तब हुआ जब दिल्ली के तत्कालीन संभागीय आयुक्त (राजस्व) विजय देव ने इस मामले की जांच की. यह जांच भाजपा नेता और पूर्व विधायक रामवीर सिंह बिधूड़ी की शिकायत के बाद शुरू हुई थी. उन्होंने ही लोकायुक्त एवं दिल्ली सरकार के विभिन्न विभागों में शिकायत पत्र देकर बताया था कि कैसे ब्रह्म सिंह और उनके भाइओं ने फर्जी कॉलोनियों के नाम पर पीसीआर हासिल कर लिए हैं. उस दौर में ब्रह्म सिंह भाजपा में शामिल नहीं हुए थे और बहुजन समाज पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हुआ करते थे.

संभागीय आयुक्त विजय देव ने अपनी जांच में पाया कि राधाकृष्ण विहार के नियमितीकरण के लिए कई फर्जीवाड़े किये गए थे. अपने आवेदन में ब्रह्म सिंह ने 67 लोगों की एक सूची सरकार को सौंपी थी. इन सभी लोगों को राधाकृष्ण विहार का निवासी दर्शाया गया था. लेकिन जांच में पाया गया कि इस सूची में लिखे गए नाम दरअसल ब्रह्म सिंह के ही रिश्तेदारों के थे और इनमें से कोई भी असल में राधाकृष्ण विहार का निवासी नहीं था (आज भी नहीं है). साथ ही यहां की नौ बीघा जमीन (खसरा नंबर 169,171) ग्राम सभा की थी और सात बीघा दस बिस्वा जमीन (खसरा नंबर 176) जॉइंट वाटर एंड सीवरेज बोर्ड की थी. 2011 में हुई इस जांच में यह भी लिखा गया था कि राधाकृष्ण विहार की यह ज़मीन करीब 500 करोड़ की है जिसे भूमाफिया गलत तरीकों से हथियाना चाहते हैं. आज इस ज़मीन की कीमत करीब 700 करोड़ बताई जाती है.

जिन जमीनों पर तीन कॉलोनियों के अवैध प्रोविजनल सर्टिफिकेट ऑफ़ रेगुलराईजेशन हासिल किये गए थे उनमें से कुछ तो ऐसी भी थीं जिन्हें सरकार ने 2006 में ही अधिग्रहीत किया था. यानी ये जमीनें 2006 तक खाली थीं.

सरकारी ज़मीनों की लूट का यही तरीका कोटला महिग्राम एक्सटेंशन में भी अपनाया गया था. यहां भी खसरा नंबर 300 (7 बीघा 11 बिस्वा) और खसरा नंबर 317 (2 बीघा 7 बिस्वा) की उस जमीन पर कॉलोनियों के लिए पीसीआर हासिल किये गए थे जिस जमीन को सरकार कई साल पहले ही अधिग्रहीत कर चुकी थी और जिसके असली मालिकों को मुआवजा भी कई साल पहले ही दिया जा चुका था. दिलचस्प यह भी है कि एक ही खसरा नंबर (317) को भूमाफियाओं ने दो अलग-अलग अनधिकृत कॉलोनियों में शामिल करके उनके पीसीआर हासिल कर लिये थे. सरिता विहार के नजदीक बसे अबुल फज़ल एन्क्लेव की भी लगभग 1100 करोड़ रूपये की ज़मीन को इसी तरह से हथियाने की कोशिश की गई थी.

2011 में हुई इस जांच में पाया गया कि उपरोक्त तीनों ही कॉलोनियों को गलत और फर्जी तरीकों से पीसीआर दिए गए थे और ये तीनों ही कॉलोनियां वह मूलभूत शर्तें पूरी नहीं करती जिनके चलते इन्हें ‘अनियमित कॉलोनी’ घोषित किया जा सके. नियमों के अनुसार सिर्फ उन्हीं कॉलोनियों को पीसीआर जारी किये जा सकते थे जो 2002 से पहले अस्तित्व में आ चुकी हों और जिनमें 50 प्रतिशत से ज्यादा निर्माण हो चुके हों. जबकि जिन जमीनों पर तीन कॉलोनियों के अवैध पीसीआर हासिल किये गए थे उनमें से कुछ तो ऐसी भी थीं जिन्हें सरकार ने 2006 में ही अधिग्रहीत किया था. यानी ये जमीनें 2006 तक खाली थीं. इससे भी साफ़ होता है ब्रह्म सिंह की वे सूची पूरी तरह से झूठी थीं जिनमें दर्शाया गया था कि कई लोग जो उनके रिश्तेदार ही थे पिछले कई सालों से इन जमीनों पर रह रहे हैं. जिस दौरान इन कॉलोनियों को पीसीआर जारी किये गए थे, तब ब्रह्म सिंह की पत्नी कमलेश पार्षद हुआ करती थी. इस पूरे प्रकरण की जांच करवाने वाले पूर्व विधायक रामवीर सिंह बिधूड़ी ने कमलेश पर भी आरोप लगाए थे कि उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए ये पीसीआर हासिल किये हैं.

रामवीर सिंह बिधूड़ी ने ही एक अन्य सामाजिक कार्यकर्ता के साथ मिलकर इस पूरे मामले को उजागर किया था. उन्होंने इस मामले की सीबीआई जांच करवाने और दोषियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की भी मांग की थी. लेकिन आज रामवीर सिंह बिधूड़ी इस मामले में पहले जैसे तेवर नहीं दिखाते. दरअसल उन्होंने जब इस मामले में आवाज़ उठाई थी तब वे स्वयं कांग्रेस में थे और आरोपित ब्रह्म सिंह बसपा में. लेकिन आज शिकायतकर्ता रामवीर बिधूड़ी और आरोपित ब्रह्म सिंह दोनों ही भाजपा में शामिल हो चुके हैं. साफ़ है कि अब वे ब्रह्म सिंह के खिलाफ मुखरता से सामने नहीं आ सकते. यह भी माना जाता है कि ब्रह्म सिंह के भाजपा में शामिल होने का प्रमुख कारण यही था कि किसी भी तरह इन जमीनों का मामला दबा रहे और वे इस पर कब्ज़ा बनाए रखें.

जिस मामले को रामवीर बिधूड़ी इतना आगे तक ले गए क्या उस मामले में वे अब भी दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करेंगे? यह सवाल करने पर रामवीर बिधूड़ी कहते हैं, ‘मैं अब कोई मांग नहीं कर रहा. मुझे जितना करना था, मैंने किया. मैंने यह मामला उठाया था और जांच में मेरे द्वारा लगाए गए आरोप सही भी पाए गए थे. अब तो दिल्ली में दुनिया के सबसे ईमानदार आदमी की सरकार बन चुकी है. तो उन्हें जो उचित लगेगा वे करेंगे. इस मामले के राजनीतिक पहलुओं पर मैं कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता.’

मौके पर आज भी इन जमीनों पर ब्रह्म सिंह और उनके भाइयों का कब्ज़ा है और वे लाखों रूपये का मासिक किराया इन जमीनों से वसूल रहे हैं.

दिल्ली भाजपा के ही एक नेता नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘दो हजार करोड़ का यह घोटाला सिर्फ राजनीति के चलते ही दबाया जा रहा है. ब्रहम सिंह यदि आज भाजपा में न होते तो शायद जेल में होते.’ वे आगे कहते हैं, ‘जब ब्रह्म सिंह को भाजपा में शामिल किया गया तब भी उनके बारे में सब जानते थे. कई कार्यकर्ताओं ने उन्हें शामिल करने का विरोध भी किया था लेकिन पार्टी हाईकमान ने फिर भी उन्हें शामिल किया और विधानसभा का टिकट भी दिया. इसलिए अब कोई भी ब्रह्म सिंह के खिलाफ बोलकर अपना राजनीतिक भविष्य दांव पर नहीं लगाना चाहेगा. ‘

इन सभी कॉलोनियों के पीसीआर तो जांच के बाद रद्द कर दिए गए थे लेकिन मौके पर आज भी इन जमीनों पर ब्रह्म सिंह और उनके भाइयों का कब्ज़ा है और वे लाखों रूपये का मासिक किराया इन जमीनों से वसूल रहे हैं. इन आरोपों के बारे पूछने पर बीर सिंह (भाजपा पार्षद और ब्रह्म सिंह के भाई) कहते हैं, ‘ये सारे आरोप झूठे हैं और ये ज़मीनें हमारे परिवार की ही हैं.’ यह पूछने पर कि संभागीय आयुक्त की जांच में ये सभी जमीनें सरकारी बताई गई हैं, वे कहते हैं, ‘वह एकतरफा जांच थी. हम उसे नहीं मानते.’

इस पूरे घोटाले को मोटे तौर से समझें तो इसमें सबसे पहले खाली ज़मीनों को कॉलोनी दर्शाया गया, फिर उन्हें अनधिकृत कॉलोनी घोषित करवाया गया, फिर उनके नियमितीकरण के लिए पीसीआर हासिल किये गए और यदि ये कॉलोनियां नियमित भी हो जातीं तो फर्जी दस्तावेजों के आधार पर ऐसा करने वाले लोग रातों-रात अरबपति बन चुके होते. इस प्रक्रिया के लगभग सभी चरण पूरे किये भी जा चुके थे कि तभी इस घोटाले का पर्दाफाश हो गया. लेकिन यह पर्दाफाश सिर्फ कागजों तक ही सीमित रहा. न तो इस घोटाले में किसी के खिलाफ कार्रवाई हुई है और न ही अब तक सरकार इस जमीन को पूरी तरह अपने कब्जे में ले सकी है. आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने कुछ समय पहले ब्रह्म सिंह के खिलाफ कार्रवाई बात कही जरूर थी लेकिन यह बात बस बातों तक ही सीमित रही. इस क्षेत्र के विधायक आम आदमी पार्टी के नेता अमानतुल्लाह खान हैं. इस रिपोर्ट के लिखे जाने के दौरान वे पुलिस हिरासत में थे इसलिए उनसे इस प्रकरण पर बातचीत नहीं हो सकी.

इन भूमाफियाओं के खिलाफ कोई कार्रवाई होने की संभावनाएं सिर्फ इसलिए कम नहीं हैं क्योंकि ये लोग खुद बड़ी पार्टियों के नेता हैं, बल्कि इसलिए भी कम हैं क्योंकि प्रशासनिक अधिकारियों की भी इनसे पूरी मिलीभगत है. यदि ऐसा नहीं होता तो इन सरकारी जगहों पर दुकानें बनाना भी असंभव होता और इन जमीनों को हथियाने की प्रक्रिया का इतना आगे बढ़ जाना भी संभव नहीं होता कि इन्हें नियमित किये जाने के लिए प्रमाणपत्र तक जारी कर दिए जाएं. साथ ही जिन पुलिसकर्मियों की मदद से इन जगहों को खाली करवाया जाना था, जब वे ही ऐसी जगहों पर आराम करते मिलते हैं तो ये संभावनाएं लगभग समाप्त ही हो जाती हैं कि इन भूमाफियाओं को कभी दंडित किया जा सकेगा.

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