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कोचिंग हब से सुसाईड सिटी कैसे बना कोटा?

(नीरज त्यागी )

पिछले 5 सालों में 57 आत्महत्याओं के बाद कोटा का हॉस्टल एसोसिएशन, कुम्भकर्ण की नींद से जाग गया। ख़बर आयी कि अब कोटा के हॉस्टलों के सीलिंग फ़ैन्स में गुप्त ‘सायरन’ और ‘स्प्रिंग्स’ लगाए जाएंगे। माना जा रहा है कि इससे पंखे से लटक कर जान देने वालों पे लगाम लगेगी। दरअसल, पंखा बनाने वाली कंपनियों से आग्रह किया गया है कि वो पंखे में सायरन और स्प्रिंग लगाएं। 20 किलोग्राम से अधिक वज़न के दबाव के बाद पंखा न सिर्फ़ नीचे गिर जाएगा बल्कि उसमें लगा सायरन/अलार्म भी बजने लगेगा। इससे हॉस्टल के लोग सतर्क हो जाएंगे और ऐसे किसी हादसे को टाला जा सकता है।

IITian बनने का ख़्वाब लेकर मैं 2009 में कोटा आया था। एक निजी कोचिंग संस्थान में दाख़िले के बाद मुझे इंद्रा विहार कॉलोनी में हॉस्टल अलॉट हुआ। उस हॉस्टल में भारत के कोने-कोने से विद्यार्थी आये थे। मेरी तरह उन सबकी भी एक ही इच्छा थी कि वो देश के किसी प्रतिष्ठित IIT संस्थान से इंजीनियरिंग करें। एक मध्यम-वर्गीय परिवार से होने के कारण मुझे वहां ढलने में थोड़ा वक़्त लगा। ऐसा लगता था मानो मुझे किसी जेल में बंद कर दिया गया हो।ऊपर से जून महीने में शहर की तपती धूप में, साईकल पर मुंह पर रुमाल लपेटे कोचिंग जाना अपने-आप में एक चुनौती होती थी।

समय बीतता गया। टीचर्स अपने-अपने तरीक़ों से हमें समझाते या डराते। कहावत होती थी कि IIT की तैयारी आसान नहीं है; ‘मानो कि तुम दो साल तक एक कमरे में बंद हो और चाबी फेंक दी गयी हो।’ पीरियोडिक टेस्ट में कभी अच्छे मार्क्स आते तो कभी लिस्ट में सबसे नीचे आता। आगे चलकर ये सिलसिला ऐसे मोड़ पर आ गया जहां से मुझे IIT के साथ-साथ अन्य इंजीनियरिंग परीक्षाओं से भी दूरी महसूस होने लगी। सभी रास्ते बंद नज़र आ रहे थे। मैं समझ चुका था कि इसमें सफल नहीं हो पाऊंगा। किंकर्तव्यविमूढ़ की परिस्थिति हो गयी थी। लेकिन इन तमाम परिस्थितियों का ज़िम्मेदार मैं ख़ुद था, कोचिंग नहीं।

दूसरे साल के अंत की बात है, तब मैं एक पीजी में रहने लगा था। उसी पीजी में बिहार का एक लड़का ‘साकेत’ रहता था। एक शाम कोचिंग से हॉस्टल लौटा तो देखा कि बगल वाले मालव जी (बदला हुआ नाम) के घर के बाहर भीड़ लगी है। मैं अपने गेट तक पहुंचा ही था कि साकेत परेशान सा मेरे पास आया और बोला, “यार, मेरे भाई ने सुसाइड कर लिया। सब ख़त्म हो गया, भाई। पंखे से लटक गया वो। काश पंखा टूट जाता, काश टूट जाता।” और फिर वो रो पड़ा। इस घटना ने मुझे अंदर से हिलाकर रख दिया था। शायद इसलिए क्योंकि मैं सुसाइड करने वाले उस लड़के को जानता था, वो अपने बैच का ‘टॉपर’ था।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के मुताबिक़, पिछले साल कोटा में 17 छात्रों ने आत्महत्या की थी। इनमें से ज़्यादातर मामलों में पंखे से लटक कर आत्महत्या की गयी थी। इसके अलावा कोटा बैराज के पास चम्बल नदी में कूदकर जान देने वाले भी थे। अपने होस्टल के पांचवीं मंजिल से कूदकर एक लड़की ने अपनी जान दी थी। कई रिपोर्ट्स, इन घटनाओं के लिए कोचिंग संस्थानों के प्रेशर और रवैये को ज़िम्मेदार ठहराती हैं। उनका मानना है कि छात्रों का 10वीं पास करने के बाद इतनी बड़ी प्रतिस्पर्धा में ख़ुद को जगह दे पाना एक मुश्किल काम है। । 7-8 घंटे की क्लास के बाद लौटकर असाइनमेंट बनाना, फिर अगले दिन के लिए ख़ुद तो तैयार करना होता है। मेस में खाने की गुणवत्ता हर जगह अलग होती है। गर्मी के दिनों में दोपहर के ढाई बजे पढ़कर लौटना बहुत ही मुश्किल होता है। पथरीला इलाका होने के कारण दिन भर की हवाएं रात में भी गर्म महसूस होती हैं। इन सबका सामना करना कठिन होता है। दसवीं का एक छात्र मानसिक तौर कितना मज़बूत है, इसमें उसकी पृष्ठभूमि बहुत मायने रखती है।

आज सबसे ज़्यादा ज़रूरी है अभिभावकों को अपने बच्चे को सपोर्ट करने की। उन्हें कोटा भेजने से पहले ये समझाने की कि, अगर कभी मन में कुछ घबराहट हो तो उनसे बात करें। अगर कभी IIT कठिन लगे तो बात करें। बच्चों की मनोवैज्ञानिक स्थिति को समझना बहुत ज़रूरी है। उनमें वो भावना जगानी होगी जिसमें अल्लामा इक़बाल ने कहा था, “सितारों से आगे जहां और भी हैं, अभी इश्क़ के इम्तेहान और भी हैं।” अगर पढ़ाई और IIT आपका इश्क़ है तो इसे अपनी ताक़त बनाएं, कमज़ोरी नहीं।

साकेत ने कहा था कि काश पंखा टूट जाता। आज ये तकनीक आने वाली है, पर सवाल ये उठता है कि क्या किसी छात्र/छात्रा की ज़िंदगी और मौत के बीच पंखे का सायरन और स्प्रिंग आ सकते हैं?

क्या हमारे युवा इतने कमज़ोर हैं कि उनकी जान एक सायरन के भरोसे टिकी है? एक भावी इंजीनियर के लिए उन उपकरणों से छेड़-छाड़ करना ज़्यादा मुश्किल नहीं होना चहिये। और कोई चीज़ अगर गुप्त है तो उसे बताने की क्या ज़रूरत है कि वो गुप्त है? उसकी गोपनीयता तो वैसे भी लीक हो गई।

हालांकि, मैं ये भी मानता हूं कि अगर इससे एक छात्र/छात्रा की भी जान बचती है तो बहुत बड़ी बात है। लेकिन ज़रूरत है इस परेशानी की जड़ तक जाकर इसे समझने की। सिर्फ़ शिक्षण संस्थानों को दोष देना मूल परेशानी से मुंह फेरना होगा।

 

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