केदारनाथ त्रासदी के अनाथ फिर हुए अनाथ

साल 2013 की केदारनाथ त्रासदी के दौरान अपने माता पिता से बिछड़ चुके नेपाली मूल के दो बच्चों को अब बाल गृह भेजने की तैयारी चल रही है. इन अबोध बच्चों को पांच साल तक पालने वाले अभिभावक करीब दस साल के लड़के की शरारतों से तंग आकर अब इन बच्चों से छुटकारा पाना चाहते हैं. अब समाज कल्याण विभाग भी सभी पहलुओं की जांच कर बच्चों को बाल गृह भेजने की प्रक्रिया पूरी कर रहा है.

2013 की आपदा के दौरान जखोली के बजीरा गांव के घनश्याम को नेपाली मूल के दो बच्चे सड़क पर लावारिस मिले थे. काफी खोजबीन करने के बाद भी जब उनके रिश्तेदारों का पता नहीं चला तो घनश्याम उन्हें अपने घर ले गए. कई दिन तक इन नन्हें-मुन्नों की देखभाल घनश्याम के परिवार ने की लेकिन जब बच्चों के किसी रिश्तेदार का पता नहीं चला तो घनश्याम ने पुलिस को इत्तला दी.

इसके बाद समाज कल्याण विभाग के अधिकारी, बाल कल्याण समिति व न्याय विभाग से जुड़े अधिकारी घनश्याम के घर पहुंचे और उससे कहा कि बच्चों को बाल गृह भेजना होगी. लेकिन कुछ ही समय पहले अपने लड़के की मौत का सदमा झेलने वाले घनश्याम और उनकी पत्नी को लगा ये बच्चे भगवान की नेमत हैं. उनके बार-बार आग्रह करने के बाद इन बच्चों को घनश्याम के सुपुर्द कर दिया गया. लेकिन अब खुद घनश्याम इन बच्चों को प्रशासन को सौंपना चाहता है.

घनश्याम जिन भाई बहन को पाल रहे हैं उनमें बड़ा लड़का जनक है जो अब पांचवीं में पढ़ता है. घनश्याम का कहना है कि लड़का काफी शरारती है और किसी की बात मानता ही नहीं है. वह स्कूल में झगड़ा करता है और अन्य बच्चों पर हमले भी कर रहा है. घनश्याम के अनुसार जनक बार-बार घर से भाग जाता है और मंगलवार को भी भाग गया था, पुलिसकर्मी उसे पकड़ कर घर लाए.

जनक का कहना है कि वह बाल गृह नहीं जाना चाहता. इसके बजाय वह कोटद्वार में पिता की रिश्तेदारी में जाना चाहता है क्योंकि वह वहां पर पहले भी रह चुका है. उसने आरोप लगाया कि उसे पीटा जाता है. हालांकि उसकी छोटी बहन का कहना है कि उनके माता-पिता उनसे बहुत प्यार करते हैं. वह भी अपने पिता की हां में हां मिलाते हुए कहती है कि भाई बहुत शरारती है और बार-बार घर से भाग जाता है.

ज़िला बाल कल्याण समिति की अध्यक्ष उषा सकलानी का कहना है कि पहले भी बच्चों को लेने के लिए कई बार टीम गई थी लेकिन घनश्याम ने मना किया. अब बच्चों को प्रशासनिक संरक्षण में बाल गृह भेजा जा रहा है.

इन बच्चों की त्रासदी केदारनाथ त्रासदी से जुड़ी तो है लेकिन उससे बड़ी भी है. जिस बदकिस्मती ने पांच साल पहले इन बच्चों के सिर से मां-बार का साया छीन लिया था अब उसने फिर इन्हें शिकार बना लिया है. अपने असली मां-बाप के नाम-शक्ल तो इन्हें याद नहीं हैं लेकिन घनश्याम और उनकी पत्नी को अब ये मां-बाप ही मानते हैं. सब समझते हुए मां-बाप से अलग कर दिए जाने की त्रासदी को बच्ची तो समझ नहीं पा रही है लेकिन जनक के लिए यह सब झेलना आसान नहीं है. शायद इसीलिए वह बार-बार घर से भाग रहा है ताकि अनाथालय के बजाय वह किसी परिवार में रह सके.

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