सोशल मीडिया के घाट पर भारतीय नेताओं की भीड़

शेयरचैट नाम के शुद्ध भारतीय सोशल मीडिया ने भारतीय राजनीति में धूम मचा रखी है। उम्मीद है पांच राज्यों के चुनावों के सेमीफाइनल के बाद होने वाले आम चुनाव तक इसकी पहुंच देश के लगभग सभी पार्टी के नेताओं तक हो जाएगी। इस माध्यम की खासियत है कि यह अंग्रेजी में बिल्कुल नहीं है। इसने हिंदी, तमिल और तेलुगू तीन भाषाओं में अपना ऐप विकसित किया है और अक्तूबर 2015 में लांच होने के 18 माह  बाद ही इसके ग्राहकों की संख्या 2.5 करोड़ तक पहुंच गई है।

इस समय भाजपा शासित तीन राज्यों के मुख्यमंत्री इसका उपयोग कर रहे हैं। उनमें छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस शामिल हैं। दिल्ली से भाजपा सांसद और भोजपुरी के मशहूर गायक मनोज तिवारी का भी शेयरचैट पर अकाउंट है। संयोग से छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में नवंबर में चुनाव होने वाले हैं और उसके कुछ माह बाद ही महाराष्ट्र में भी विधानसभा चुनाव होंगे।

भारतीय भाषाओं के मतदाताओं को रिझाने के लिए शुरू हुए इस मीडिया का फायदा उठाने में कांग्रेस भी पीछे नहीं है और उसने भी अपने पेज इस पर बना रखे हैं। बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए पिछले माह शेयरचैट को 10 करोड़ डालर यानी 720 करोड़ रुपए का निवेश मिला है। यह निवेश चीन की एक कंपनी शुनवेई ने किया है।

दरअसल फेसबुक और ट्वीटर पर अंग्रेजी का प्रभुत्व अभी भी है। विशेषकर ट्वीटर के बारे में तो कहा जाता है कि वहां से विशिष्ट जनों और खबर बनाने वालों पर असर पड़ता है, लेकिन मतदाताओं पर असर नहीं पड़ता। केपीएमजी और गूगल ने 2017 में जो अध्ययन किया था उसके अनुसार 2021 तक भारतीय भाषाओं में आनलाइन वक्ताओं की संख्या 53.6  करोड़ तक पहुंच जाएगी। जबकि अंग्रेजी में यह संख्या 19.9 करोड़ की ही होगी। दरअसल भारत की 1.3 अरब की आबादी में सिर्फ 10 प्रतिशत लोग ही अंग्रेजी बोलते हैं।

इन भावी संभावनाओं को देखते हुए शेयरचैट ने अंग्रेजी में अपने प्रोग्राम को नहीं तैयार किया। शुरू में उसका इरादा था लेकिन बाद में उस दिशा में कदम ही नहीं बढ़ाया। शेयरचैट की खासियत यह है कि उसके पास सोने की खदान की तरह कीमती आंकड़े हैं। वे आंकड़े जो स्थानीय भाषाएं बोलने वाले और उसके मतदाताओं के बारे में हैं। किसी भी राजनेता को अगर जिला, तहसील और गांव के आंकड़ों के बारे में जानना है तो उसे स्थानीय भाषा का ही सहारा लेना पड़ेगा। तभी वह मतदाताओं तक पहुंच पाएगा और तभी वह उन्हें प्रभावित करने के तरीके ढूंढ सकेगा। यही वजह है कि शेयरचैट की लोकप्रियता बढ़ रही है।

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