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जातिगत अत्याचारों से बचने के लिए दलित अपना रहे हैं बौद्ध धर्म

भारतीय समाज में जाति हमेशा से एक महत्वपूर्ण कारक रही है। अतीत से लेकर वर्तमान तक, राजनीति में जाति की भूमिका हमेशा से रही है। जाति व्यवस्था के उदय और उसके प्रचलन के बारे में कई अलग-अलग दावे और व्याख्याएं की जाती रही हैं। अंबेडकर का मानना था कि जाति की जड़ें, हिन्दू पवित्र ग्रंथों में हैं। लेकिन हिन्दुत्व की विचारधारा के पैरोकारों का कहना है कि हिन्दू समाज में सभी जातियां समान थीं। मुस्लिम आक्रांता, हिन्दुओं को मुसलमान बनाना चाहते थे और जो लोग धर्मपरिवर्तन करने के लिए तैयार नहीं थे वे दूरदराज़ के स्थानों पर भाग गए और यहीं से जातिगत असमानता की शुरूआत हुई। यह व्याख्या घटनाओं की सही विवेचना नहीं है और ऊंची जातियों की सोच को प्रतिबिंबित करती है। जो लोग कहते हैं कि मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा ज़बरदस्ती धर्मपरिवर्तन करवाने की कोशिश के कारण जाति व्यवस्था जन्मी, उनके दावों का खंडन करने के लिए ‘मनुस्मृति’ पर्याप्त है, जो दूसरी सदी ईस्वी में रची गई थी और जिसमें जातिगत पदक्रम का विस्तार से वर्णन किया गया है। मनुस्मृति जब लिखी गई थी, तब इस्लाम दुनिया में था ही नहीं और ना ही मुस्लिम व्यापारी भारत के मलाबार तट पर पहुंचे थे। मुस्लिम शासकों के आक्रमण तो तब सदियों दूर थे।

इस बे-सिरपैर की व्याख्या के विपरीत, स्वामी विवेकानंद हमें बताते हैं कि दलितों द्वारा इस्लाम में धर्मपरिवर्तन, मुख्यतः जातिगत उत्पीड़न के चलते हुआ। औपनिवेशिक काल में भारत के अर्ध-आधुनिकीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई लेकिन इसके बाद भी जाति व्यवस्था बनी रही। आज, स्वाधीनता के 70 साल, और भारतीय संविधान, जो सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है, के लागू होने के 67 साल बाद भी, जाति व्यवस्था जिंदा है। गोरखनाथ मठ के भगवाधारी आदित्यनाथ योगी के उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद एक बार फिर यह साबित हो गया है कि जातिप्रथा हमारे समाज में आज भी उतनी ही मज़बूत है जितनी पहले थी। योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से उत्तरप्रदेश में दलितों पर अत्याचार की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई है। सहारनपुर में हुई हिंसा इसका एक उदाहरण है।

कुछ रपटों के अनुसार, पश्चिमी उत्तरप्रदेश के कुछ गांवों के 108 दलित परिवारों ने योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से दलितों पर अत्याचार की घटनाएं बढ़ने पर अपना विरोध प्रदर्शन करने के लिए बौद्ध धर्म अंगीकार कर लिया है। सहारनुपर के कुछ गांवों में, ठाकुरों और दलितों के बीच हिंसक झड़पें हुईं। ठाकुरों ने अंबेडकर की मूर्ति नहीं लगने दी और दलितों ने राजपूत शासक राणाप्रताप की जयंती मनाने के लिए एक जुलूस को निकलने नहीं दिया क्योंकि उसके लिए विधिवत अनुमति नहीं ली गई थी। दलितों का कहना है कि आदित्यनाथ की सरकार, केवल ठाकुरों की सरकार है।

सहारनपुर के निकट मुरादाबाद के लगभग 50 दलित परिवारों ने यह धमकी दी है कि अगर आदित्यनाथ, भगवा ब्रिगेड द्वारा दलितों पर किए जा रहे हमलों को नहीं रोकते तो वे हिन्दू धर्म त्याग देंगे। इस आशय की खबर ‘द टाईम्स ऑफ इंडिया’ के 22 मई, 2017 के अंक में छपी है। दलितों के हितों की रक्षा के लिए भीमसेना नाम का एक संगठन गठित हो गया है। सहारनपुर का प्रशासन कहता है कि भीमसेना, हिंसा कर रही है, जबकि दलितों का दावा है कि यह सेना उनकी रक्षक है। उनका यह भी आरोप है कि प्रशासन, ऊंची जातियों के पक्ष में झुका हुआ है और असली दोषियों को पकड़ने की बजाय, भीमसेना पर निशाना साध रहा है। हिन्दुओं के स्वनियुक्त रक्षकों के समूहों की संख्या में तेज़ी से वृद्धि हो रही है। इस पृष्ठभूमि में, भीमसेना को दलित, आशा की एक किरण के रूप में देख रहे हैं। उनका कहना है कि योगी सरकार के शासन में आने के बाद से आरएसएस और उसके अनुषांगिक संगठन अपना असली रंग दिखा रहे हैं और इसलिए उनके पास इसके सिवाए कोई विकल्प नहीं है कि वे ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म को त्याग दें। ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म ही संघ परिवार की हिन्दुत्व की विचारधारा का आधार है। अभी हाल (22 मई, 2017) में दिल्ली के जंतरमंतर पर बड़ी संख्या में दलित, उनके विरूद्ध किए जा रहे अत्याचारों का विरोध करने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं।

दलितों के प्रश्न पर आरएसएस हमेशा से एक बड़ी दुविधा में फंसा रहा है। एक ओर वह उनके वोट चाहता है तो दूसरी ओर वह यह भी जानता है कि अगर उसने दलितों को समान दर्जा देने की बात कही, तो आरएसएस-हिन्दुत्व राजनीति के मूल समर्थक जो ऊंची जातियों के हैं, उससे दूर छिटक जाएंगे। इस समस्या से निपटने के लिए आरएसएस, सोशल इंजीनियरिंग व सांस्कृतिक अभियानों के ज़रिए दलितों को अपने साथ लेने का प्रयास कर रहा है। उसने सामाजिक समरसता मंचों की स्थापना की है और नीची जातियों के लोगों के साथ भोजन करने के कार्यक्रम शुरू किए हैं। एक दूसरे स्तर पर वह दलित नेताओं जैसे रामविलास पासवान, रामदास अठावले व उदित राज इत्यादि को सत्ता की लोलीपोप पकड़ाकर अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। आरएसएस की कोशिश यह भी है कि इतिहास को तोड़-मरोड़ कर इस रूप में प्रस्तुत किया जाए कि दलित, मुसलमानों के हमलों से हिन्दुओं की रक्षा करने वाले लोग थे। इस तरह की सांस्कृतिक जोड़तोड़, हिन्दू राष्ट्रवाद के सिद्धांतों का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

पिछले तीन वर्षों में दलितों के प्रति दुर्भाव और पूर्वाग्रह कई अलग-अलग तरीकों से प्रकट हुआ है। आईआईटी, मद्रास में अंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल पर प्रतिबंध लगाया गया। हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के प्रशासन की दलित-विरोधी नीतियों के कारण, वहां के शोधार्थी रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या हुई। गुजरात के ऊना में पवित्र गाय की रक्षा के नाम पर दलितों को बर्बर ढंग से पीटा गया। दरअसल, हिन्दू राष्ट्रवाद की राजनीति, जाति व्यवस्था से दमित वर्गों के लक्ष्य से एकदम विपरीत दिशा की ओर ले जाने वाली है। हमें याद रखना चाहिए कि सामाजिक न्याय के महानतम पैरोकारों में से एक अंबेडकर ने मनुस्मृति को सार्वजनिक रूप से जलाया था। लेकिन इसी मनुस्मृति का आरएसएस के चिंतकों जैसे एमएस गोलवलकर ने महिमामंडन किया। गोलवलकर जैसे लोगों ने तो भारतीय संविधान तक का इस आधार पर विरोध किया कि जब हमारे पास मनुस्मृति के रूप में पहले से ही एक ‘अद्भुत’ संविधान मौजूद है तो हमें नए संविधान की ज़रूरत ही क्या है? जहाँ अंबेडकर कहते थे कि गीता, मनुस्मृति का संक्षिप्त संस्करण है वहीं मोदी सरकार गीता का प्रचार-प्रसार करने में जुटी हुई है।

हिन्दू राष्ट्रवाद, भारत के एक काल्पनिक इतिहास का निर्माण करना चाहता है, जिसमें हिन्दू धर्मग्रंथों के मूल्यों का बोलबाला था। वह वैदिक युग के मूल्यों को पुनर्जीवित करना चाहता है, जिनका एक प्रजातांत्रिक समाज में कोई स्थान नहीं हो सकता। हिन्दू धर्म की कई अन्य धाराएं भी हैं जिन्हें संयुक्त रूप से श्रमण परंपराएं कहा जाता है। ये परंपराएं ऊँचनीच को खारिज करती हैं। लेकिन हिन्दू धर्म के ब्राह्मणवादी संस्करण ने इन परंपराओं को हाशिए पर ढकेल दिया है। पिछली लगभग एक सदी से ब्राह्मणवादी मूल ही हिन्दू राष्ट्रवाद का आधार बने हुए हैं। जंतरमंतर में चल रहा जबरदस्त विरोध प्रदर्शन इस बात की ओर संकेत करता है कि आरएसएस द्वारा हिन्दू धर्म के मूलतः समानता का धर्म होने की भ्रांति उत्पन्न करने का प्रयास सफल नहीं होगा। इससे हमें यह याद आता है कि अंबेडकर को अंततः धर्म द्वारा वैध ठहराई गई जाति व्यवस्था से बचने के लिए हिन्दू धर्म का ही त्याग करना पड़ा था। आज भी दलित यही करने में अपनी मुक्ति देखते हैं।

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