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शराब पर किस ओर हैं महिलायें!

एनटीआई न्यूज, उत्तराखंड ब्यूरो। उत्तराखंड की नयी बीजेपी सरकार ने आबकारी नीति की घोषणा तो कर दी लेकिन नयी आवंटित शराब की दुकानें खुलवाने में प्रशासन को काफी मशक्कत करनी पड़ रही है. राज्य में राजधानी देहरादून समेत कई इलाकों और कस्बों में स्थानीय लोग खुल कर शराब के विरोध में सड़कों पर उतर आये हैं जिनमें महिलाओं की भागीदारी काफी ज्यादा है. लेकिन शराब को लेकर राज्य की महिलाओं में फैले आक्रोश के बीच सबसे दिलचस्प बात ये है कि नयी आबकारी नीति के तहत आवंटित शराब की दुकानों के लिये आवेदन से लेकर आबंटन तक में महिलाओं की भागीदारी इस बार और बढ़ गयी है. इस साल आवंटित शराब की दुकानों में महिलाओं की हिस्सेदारी पंद्रह फीसदी से ज्यादा जा पहुंची है.

राज्य में शराब को लेकर शुरू हुआ आक्रोश शराबबंदी की मांग तक जा पहुंचा है. राजमार्गों से शराब की दुकानें हटाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राज्य सरकार ने उसका तोड़ निकालने के लिये शहरों की सीमाओं के भीतर के कई मार्गों को राजमार्ग की परिभाषा से हटा तो दिया लेकिन इसके कारण गली मोहल्लों में शराब की दुकानें खोले जाने से स्थानीय लोग भड़क उठे. राज्य भर में अनेक जगहों पर आबादी में शराब की दुकानें खोलने का जबर्दस्त विरोध हुआ. महिलाओं के धरना-प्रदर्शन करते हुए कई दुकानों में तोड़फोड़ तक की गयी और शराब कारोबारियों और खरीदारों को डंडे मार-मारकर दौड़ाया गया.

जून से लागू नयी आबकारी नीति के तहत शराब की दुकानों को आवंटित किये जाने की प्रक्रिया मई के अंतिम हफ्ते में शुरू हुई और राज्य में देसी-विदेशी शराब की कुल 526 दुकानों के लिये 26 हजार आवेदन आये जिनमें से करीब दस हजार आवेदन महिलाओं की ओर से प्रस्तुत किये गये. इनमें से 503 आवंटित दुकानों में से 80 महिलाओं के नाम पर हैं. 23 आवंटन प्रक्रियागत खामियों के चलते निरस्त कर दिये गये हैं.

दरअसल उत्तराखंड में शराब से सरकार को हर साल सेल्स टैक्स के बाद सबसे ज्यादा राजस्व हासिल होता है. इस बार भी सरकार के 15 फीसदी एक्साइज ड्यूटी बढ़ाने के बावजूद शराब की बिक्री में कमी नहीं आई है. नयी बकारी नीति में देसी और अंग्रेजी शराब की अलग-अलग दुकानें आवंटित करने की बजाय पहली बार 79 दुकानों को देसी और अंग्रेजी शराब बेचने के लिए लाइसेंस दिये गये हैं.

माना जा रहा है कि पर्वतीय राज्य में शराब के कारोबार में महिलाओं की बढ़ती दिलचस्पी का आंकड़ा वास्तव में एक धोखा है. ठीक उसी तरह जिस तरह पंचायतों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी ने केवल प्रधान पतियों की तादाद बढ़ायी है, उसी तरह शराब के कारोबार में भी महिलाओं को एक मुखौटे के रूप में ज्यादा इस्तेमाल किये जाने की आशंका है.

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