मुख्यमंत्री जनता दरबार में “अहंकार” के साथ “तिरस्कार” काण्ड

सरकार और जनता के बीच संवाद का एक कुदृश्य इस समय पूरे देश में सनसनी फैला रहा है. कोशिश पूरी हुई कि यह नज़ारा किसी तरह जनता के बीच पहुंच न पाए, लेकिन ज़माना सोशल मीडिया का है. उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के उस ‘जनता दरबार’ में सरकार से एक नागरिक की फरियाद करने के दौरान हुई ‘तू-तू मैं-मैं’ का नज़ारा कैमरों में कैद हो चुका था. वह ‘जनता मिलन’ उर्फ ‘जनता दरबार’ था. वह लोकतांत्रिक राजव्यवस्था में चुनाव के बाद सबसे दुर्लभ माना जाने वाला कार्यक्रम था. लिहाज़ा उसमें घटी किसी असामान्य घटना को ख़बर बनने से रोकना फिज़ूल की कवायद थी. फिर भी यह कवायद हुई और आखिर में फिज़ूल की ही साबित हुई. 24 घंटे के भीतर ही देश के मुख्य मीडिया को इस खबर को चलाना ही पड़ा. हालांकि जीती-जागती ख़बर के साथ उसके विश्लेषण का मौका मीडिया के पास हमेशा रहता है. इस घटना में भी हुआ. उस फरियादी अध्यापिका के व्यवहार में खोट निकालने के विश्लेषण मीडिया में छा रहे हैं. अलबत्ता यह फिलहाल ज़्यादा पता नहीं है कि उस महिला की त्रासदी कितनी बड़ी थी…? जनता दरबार से पहले उसने अपनी समस्या के निराकरण के लिए कहां-कहां फरियाद की थी…? सरकार की तरफ से सिर्फ एक ही कथानक चर्चा में लाया जा रहा है कि उस महिला को अपनी शिकायत रखने का यह उचित मंच नहीं था. यानी सवाल उठना स्वाभाविक है कि तो फिर इस तरह के दरबार किस तरह की शिकायत रखने के लिए होते हैं…?

‘जनता दरबार’ उर्फ ‘दरबार-ए-आम’…
कुछ अख़बारों ने इस आयोजन को ‘जनता मिलन’ कहकर प्रचारित किया है, यानी एक उत्सव या समारोह की तरह. इस प्रचार के ज़रिये यह साबित करना आसान हो गया कि उस महिला द्वारा आवेग के साथ अपनी समस्या रखना अनुचित था. लेकिन मध्ययुगीन दरबार-ए-आम के अनुभव हैं कि शहंशाह लोग दरबार-ए-आम इसलिए लगाते थे कि कहीं उनके दरबारी या मंत्री जनता के साथ कोई ज़ुल्म या ज़्यादती या कोताही तो नहीं बरत रहे हैं…? उसी दरबार में शहंशाह किसी की शिकायत सुनकर सबसे पहले संबंधित दरबारी की तरफ आंखें तरेरते थे. दरबार-ए-आम के दूसरे फरियादी भी शहंशाह की इस मुद्रा को देखकर अभिभूत हो जाते थे. वे शासक भरसक कोशिश करते थे कि फरियादी को वहीं के वहीं राहत दे दी जाए, और जनता के बीच यश बढ़ाया जाए, लेकिन उत्तराखंड कांड में ऐसा नहीं हुआ.

फरियादी से खुद निपटने लगे मुख्यमंत्री…
चाहे आधुनिक प्रबंधन हो, चाहे आधुनिक लोक प्रशासन, इन विद्यायों या शास्त्रों में पढ़ाया-सिखाया जाता है कि नागरिक या कर्मचारी की शिकायत को तसल्ली से सुना जाए. समस्याग्रस्त व्यक्ति का आधा दुःख-दर्द तो उसी समय कम हो जाता है, जब कोई उसकी समस्या सुन ले. उत्तरखंड में सरकारी शिक्षाकर्मी उस विधवा मां का दुःख यह था कि वह लगातार दुर्गम पहाड़ी इलाके के स्कूल में तैनात है. वह अपने बच्चों के साथ नहीं रह पा रही है. लिहाज़ा उसका ट्रांसफर कर दिया जाए. मुकदमा बस इतना ही था, लेकिन इसी बीच मुख्यमंत्री को फरियादी का तेवर रास नहीं आया. और ‘तू-तू मैं-मैं’ हो गई. भरे दरबार में ही हो गई. मुख्यमंत्री ने तत्काल ही गुस्से में आदेश दे दिया कि इसे फौरन मुअत्तल करो, बाहर निकालो. आखिर उसे जबरन बाहर निकाला गया और बताते हैं कि हिरासत में भी ले लिया गया. गज़ब यह हो गया कि सरकार और नागरिक की ‘तू-तू मैं-मैं’ वीडियो कैमरों में रिकॉर्ड भी हो गई. उसके बाद इस ख़बर की देशभर में चर्चा होने से कौन रोक सकता था…?

क्या इस समय ‘जनता दरबार’ का औचित्य है…?
वह युग अलग था, जब सम्राट को पता चलना मुश्किल था कि उसके दरबारी क्या कर रहे हैं. उसे यह भी आसानी से पता नहीं चलता था कि जनता की वाकई हालत क्या है. उसे भेस बदलकर जनता के बीच जाना पड़ता था. दरबार-ए-आम लगाना पड़ता था. लेकिन आज तो हर राजव्यवस्था में असंख्य कर्मचारी हैं. लोकतंत्र में तो एक के ऊपर एक निगरानी के लिए अनगिनत विभाग हैं. हर फरियादी को खूब सुविधाएं हैं कि वह आसानी से अपनी शिकायत दर्ज कराए. ऊपर-नीचे हर जगह करा ले. इतनी सुविधाएं हैं कि देश के हर दफ्तर में शिकायतें पढ़ने के लिए अफसर तैनात हैं. बस मुश्किल यह है कि इन शिकायतों का निपटारा नहीं होता. दरअसल, शिकायतों के निपटारे के लिए किसी जनता दरबार की नहीं, फाइलों को निपटाने की ज़रूरत है. इसमें किसी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री को ज़्यादा कुछ नहीं करना है, बस, शिकायत सुनने वाले अफसरों के चाल-चलन पर निगाह रखनी है.

लफड़े वाली चीज़ है यह दरबार…
हम लोकतंत्र हैं. सरकारों को आजकल यह दिखाने की ज़्यादा ज़रूरत पड़ रही है कि हम लोक के प्रति संवेदनशील हैं. लेकिन बाज़रिया व्यवस्था यह काम हो नहीं पा रहा है, और अपने देश के बढ़ते आकार के चलते यह संभव नहीं कि लोकतंत्र में कोई शासक सीधे ही जनता से संवाद कर ले. उसके लिए एकतरफा संप्रेषण ही सुविधाजनक है, इसीलिए एकतरफा भाषण वाली रैलियों को ही सबसे अच्छा औज़ार मानने में ही समझदारी है.

फिर भी एक औचित्य ज़रूर है इन दरबारों का…
लोकतंत्र में जनता दरबारों के औचित्य पर विमर्श शुरू करें, तो पहली बात यही निकलेगी कि ये दरबार राजनीतिक प्रचार का एक बहुत कारगर औज़ार हैं. हालांकि इस रणनीतिक औज़ार के इस्तेमाल में जोखिम भी बड़ा है, जिसे कम करने के लिए यह ज़रूरी है कि ये दरबार बड़ी जुगत से लगें. यानी इन राजनीतिक कार्यक्रमों का रूप सुप्रबंधित नाट्य रूपांतरण जैसा हो. फरियादी प्रशिक्षित हों. बहुत संभव है, कुछ समय से चालू हुए इन कार्यक्रमों के लिए ऐसा ही किया जाता हो. फरियादियों का चुनाव सोच-विचार के साथ किया जाता हो. इन दरबारों की उपलब्ध्यिों के बखान के लिए प्रेस विज्ञप्तियां भी जुगत से बनाई जाती हों. बेशक, अब तक लगे दरबारों में यह जुगत कारगर दिखती आई है, लेकिन लगता है कि उत्तराखंड के दरबार में यह प्रबंधन कहीं गड़बड़ा गया. इतना ज़्यादा गड़बड़ा गया कि आगे से इन दरबारों को कारगर मानने की बजाय इनके जोखिम को ज़्यादा देखा जाएगा.

 

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