Templates by BIGtheme NET

बेड़ियों में जकड़ा बचपन..?

यूएन की रिपोर्ट कहती है कि 2016 में रोज़ाना 15,000 हज़ार बच्चे अपना 5वां जन्मदिन भी नहीं मना सके. यानी 5 साल से कम उम्र के 7000 बच्चों की रोजाना मौत होना दर्ज की गई. इनमें से 46 फीसदी यानी करीब 7,000 बच्चों की आंखें अपने जन्म के 28 दिनों के भीतर ही बंद हो गईं. हालांकि 2016 के दौरान बाल मृत्यु की 5.6 मिलियन की यह दर वर्ष 2000 की 9.9 मिलियन के मुकाबले काफी कम है. लेकिन नवजात बच्चों की मृत्यु दर 41 फीसदी से बढ़कर 46 फीसदी हो गई. बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था ‘संयुक्त राष्ट्र बाल कोष’ यानी ‘यूनिसेफ’, विश्व स्वास्थ्य संगठन, विश्व बैंक द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा हालातों में अगर सुधार नहीं किए गए तो 2017 से 2030 के बीच 60 मिलियन बच्चे अपना 5वां जन्मदिन नहीं मना सकेंगे. इनमें से आधे नवजात शिशु होंगे. नवजात शिशु मृत्यु दर के मामले में भारत सबसे आगे है. यहां नवजात शिशु मृत्यु दर का आंकड़ा 24 फीसदी है. जबकि हमसे कई गुना पिछड़ा कहे जाने वाले पाकिस्तान में यह दर 10 फीसदी, नाइजीरिया में 9 फीसदी है.

77 प्रतिशत भारतीय किशोरियों ने झेली है यौन हिंसा : संयुक्त राष्ट्र

विश्व बैंक समूह में स्वास्थ्य पोषण और जनसंख्या विभाग के प्रमुख टिम इवांस का कहना है कि 2017 में गर्भवति महिलाओं के कमजोर स्वास्थ्य के चलते 7,000 नवजात बच्चे रोजाना दम तोड़ रहे हैं. वैश्विक बाल मृत्यु दर को रोकने के लिए महिलाओं की बेहतर देखभाल और अच्छी सेहत जरूरी है. 2016 में जटिल प्रसूति समस्याओं के चलते प्रसव के दौरान 30 फीसदी बच्चों की मौत हुई थी. मां के खराब स्वास्थ्य के अलावा न्यूमोनिया और दस्त से संक्रामक रोगों की वजह से नवजात बच्चों की बड़ी संख्या में मौत होती है. न्यूमोनिया के कारण हर साल 16 फीसदी और दस्त आदि के कारण 6 फीसदी बच्चे काल के गाल में समा जाते हैं. ये ऐसे कारण हैं जिन पर रोक लगाई जा सकती है.

ऐसा नहीं है कि इस दिशा में कुछ भी नहीं किया जा रहा है. अगर भारत सरकार के स्वास्थ्य कार्यक्रमों पर नज़र दौड़ाएं तो ज्यादातर कार्यक्रम गर्भवति महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़े हुए हैं. महिला एवं बाल कल्याण विभाग के मुताबिक, 161 जिलों में इसके अच्छे नतीजे देखने को मिले हैं. 104 जिलों में जन्म अनुपात (एसआरबी) है, 146 जिलों में संस्थागत प्रसव की स्थिति में सुधार हुआ है.

यूनिसेफ के भारत में प्रतिनिधि डॉ. यास्मीन अली हक़ ने बताया कि यूनिसेफ भारत में बच्चों खासकर लड़कियों के जीवन में सुधार को लेकर व्यापक स्तर पर काम कर रहा है. इनमें उनकी महामारी को लेकर समाज में फैली भ्रांति और स्वच्छता पर ख़ास ध्यान दिया जा रहा है. लड़कियों में खून की कमी को लेकर आयरन की गोली के वितरण का काम किया जा रहा है. इसके अलावा बालिका शिक्षा पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है.

बाल विवाह: बचपन को मारने में बाल विवाह जैसी कुप्रथा आज भी हमारे समाज में फैली हुई है. बाल विवाह सही में बाल अधिकारों का हनन है. इससे बच्चों के शारीरिक, मानसिक और शैक्षिक विकास पर विपरित असर पड़ता है. यह पूरी तरह से समाज को प्रभावित करता है क्योंकि बाल विवाह गरीबी के चक्र को मजबूत करता है. लिंग भेदभाव, निरक्षरता और कुपोषण, साथ ही साथ उच्च शिशु और मातृ मृत्यु दर को भी बढ़ाता है. 2006 में बाल विवाह की 47 फीसदी की दर घटकर 2016 में 27 फीसदी पर आ गई है, लेकिन अगर यह एक फीसदी भी है तो भी बहुत गलत है. सरकार ने इसे रोकने के लिए कड़े कानून बनाए हैं. सरकार के साथ-साथ यूनिसेफ उन राज्यों में बाल विवाह को रोकने के लिए अथक काम कर रहा है जहां इस तरह के ज्यादा मामले देखे जाते हैं.

About News Trust of India

News Trust of India is an eminent news agency

Leave a Reply

Your email address will not be published.

ăn dặm kiểu NhậtResponsive WordPress Themenhà cấp 4 nông thônthời trang trẻ emgiày cao gótshop giày nữdownload wordpress pluginsmẫu biệt thự đẹpepichouseáo sơ mi nữhouse beautiful