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तीन युवाओ ने बदली कश्मीरी युवाओ की किस्मत

‘उस शख्स को चुनौतियां पसंद थी, उसे बच्चों को पढ़ाना अच्छा लगता था। इसलिये आईआईटी की पढ़ाई पूरी करने के बाद जहां दूसरे युवा मोटी तनख्वाह की चाह में बड़ी कंपनियों का दामन थाम लेते हैं, वहीं उस शख्स ने ऐसे बच्चों का दामन थामा जो पढ़ना चाहते थे, आगे बढ़ना चाहते थे। इतना ही नहीं उस शख्स ने उन बच्चों के सपने को पूरा करने की ठानी, जिनका काफी वक्त शहर के हालात बिगड़ने और कर्फ्यू लगने के कारण बर्बाद हो जाता है। पटना (Patna) के रहने वाले इम्बेसात अहमद (Imbesat Ahmad) कश्मीर के श्रीनगर (Srinagar, Kashmir) में रहकर स्कूली बच्चों को आईआईटी और एनआईटी जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं (competitive examinations like IIT and NIT) की तैयारी कराते हैं। इसके लिए उन्होने अपने संगठन को नाम दिया है ‘राइज इन्स्टिट्यूट’ (Rise Institue)। इम्बेसात के इस काम में उनके दो और दोस्त भी मदद करते हैं और खास बात ये है कि ये दोनों भी आईआईटी पास हैं। आज ‘राइज’ के साथ करीब पांच सौ बच्चे जुड़े हुए हैं।

अपनी स्कूलिंग के दौरान ही इम्बेसात ने तय कर लिया था कि उनको शिक्षा के क्षेत्र में ही कुछ करना है लेकिन क्या करना है वो ये नहीं जानते थे। आईआईटी में पढ़ाई के दौरान एक बार उनको कश्मीर में आयोजित वर्कशॉप में हिस्सा लेने का मौका मिला। इस वर्कशॉप के बाद उन्होने फैसला लिया कि वो बच्चों को पढ़ाने का काम करेंगे। बच्चों को पढ़ाने की वजह एक और भी थी कि इम्बेसात को दूसरों को पढ़ाना अच्छा लगता था। बावजूद इसके बच्चों को काबिल बनाने के लिये उनके सामने एक चुनौती और थी, क्योंकि वो चाहते थे कि कश्मीर (Kashmir) में रहकर वो बच्चों को पढ़ाने का काम करें, लेकिन घरवाले इसके लिये तैयार नहीं हुआ। उनको परिवार की कड़ी नराजगी का सामना भी करना पड़ा, लेकिन पक्के इरादों वाले इम्बेसात की जिद्द के आगे आखिरकार उनके माता-पिता को झुकना पड़ा। आज वो ही इम्बेसात श्रीनगर में ‘राइज’ (Rise Institute in Srinagar) नाम से एक कोचिंग सेंटर चला रहे हैं।

rise talent search exam

बिहार के पटना शहर (Patna city of Bihar) में रहने वाले 25 साल के इम्बेसात अहमद (Imbesat Ahmad) ने आईआईटी खड़गपुर से भौतिक शास्त्र में ग्रेजुएशन (graduation in Physics from IIT Kharagpur) किया। साल 2012 में जब वो वर्कशॉप के सिलसिले में कश्मीर (Kashmir) आये तो यहां उन्होंने वर्कशॉप के दौरान शोपीयान (Shopian), पुलवामा (Pulwama) और श्रीनगर (Srinagar) के स्कूलों में जाकर वहां के करीब 200 बच्चों और टीचरों से बात की। करीब एक हफ्ते तक कश्मीर में रहने के दौरान उन्होने तीन अलग-अलग वर्कशॉप में हिस्सा लिया। यहां के बच्चों और टीचरों से बात करने पर उनको अहसास हुआ कि क्यों यहां के बच्चे देश की नामी संस्थाओं में प्रवेश नहीं ले पाते हैं। इम्बेसात ने News Trust of India को बताया कि

बच्चों से बात करते हुए मुझे अहसास हुआ कि कश्मीर के बच्चों को कोई गाइड करने वाला नहीं है और ना ही उनमें इसको लेकर जागरूकता है, जबकि बच्चों के अंदर मैंने काफी प्रतिभा देखी। वहीं दूसरी ओर मैंने देखा कि यहां पर बच्चों को पढ़ाने के लिए अच्छे और प्रशिक्षित टीचर (trained teachers) भी नहीं हैं।

उसी दौरान कश्मीर के रहने वाले मुबीन मसूदी (Mubeen Masudi) जो साल 2011 के मुबंई आईआईटी पासआउट (pass out from Mumbai IIT) हैं वो भी यहां पर बच्चों को पढ़ाना चाहते थे। इम्बेसात ने मुबीन से मुलाकात की और उन्हें अपने इस आइडिया के बारे में बताया। मुबीन को भी ये आइडिया पसंद आया और इन दोनों ने मिलकर साल 2013 में राइज इन्स्टिट्यूट (Rise Institute) की शुरूआत की। इसके बाद साल 2015 में सलमान शाहिद (Salman Shahid) जो की इम्बेसात के आईआईटी के बैचमैट हैं उन्होने साल 2015 में राइज के साथ काम करना शुरू किया।

राइड अपने कोचिंग में दाखिले से पहले टैलेंट सर्च इग्जाम आयोजित करते हैं जिसमें शामिल केवल 20 से 30 प्रतिशत बच्चों को ही वो राइज में दाखिला देते हैं। इन पांच सालों में वो करीब 500 से ज्यादा बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं की कोचिंग दे चुके हैं। जबकि इस समय ‘राइज’ में करीब 200 बच्चे कोचिंग ले रहे हैं। बच्चों की क्लासेज सुबह 8 बजे से शाम के 6 बजे तक चलती हैं और एक क्लास में 30 से 35 बच्चे होते हैं। इस समय ‘राइज’ में दो कार्यक्रम चल रहे हैं। इनमें से एक है दो साल का प्रोग्राम और दूसरा है 4 महीने का प्रोग्राम। दो साल के प्रोग्राम में वो 10वीं पास बच्चों को लेते हैं जबकि 4 महीने के प्रोग्राम में वो 12वीं पास बच्चों को लेते हैं।

rise founder imbesat ahmed

अपने काम में आने वाली चुनौतियों के बारे में इम्बेसात का कहना है कि कश्मीर के खराब हालात के कारण हमें बच्चों को पढ़ाने के लिये बार-बार कार्यक्रम बदलना पड़ता है, क्योंकि यहां पर आये दिन हड़ताल और कर्फ्यू रहता है। वहीं इंटरनेट की सेवाएं भी अक्सर बंद हो जाती हैं। इसके अलावा साल 2014 में आई बाढ़ में हमारा काफी नुकसान हुआ और मेहनत से तैयार की गई लाइब्रेरी बर्बाद हो गई। इस दौरान ‘राइज’ की कक्षाएं तीन महीने तक बंद रही। इसके अलावा साल 2016 में भी खराब हालात के कारण उनका इन्स्टिट्यूट करीब 4 महीने तक बंद रहा। जिसका असर उनके बच्चों के रिजल्ट पर भी पड़ा। वो मानते हैं कि इन घटनाओं का बच्चों की मानसिक स्थिति पर काफी बुरा प्रभाव पड़ता है। यही वजह है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में उनको निकलने की उम्मीद कम रहती है और वो हमेशा इस दवाब में रहते हैं कि वो कैसे दूसरे राज्यों के बच्चों से मुकाबला कर पायेंगे। इसके बावजूद इम्बेसात का मानना है कि चाहे हालात कितने भी खराब क्यों ना हों वो हर हाल में यहां के बच्चों को पढ़ाना जारी रखेंगे। क्योंकि उनको यहां पढ़ने वाले बच्चों के माता-पिता के अलावा स्थानीय स्तर पर काफी सहयोग मिलता है।

राइज सर्च इग्जाम के माध्यम से सिर्फ 10वीं पास उन्हीं बच्चों को लेते हैं जिन्होंने उनके इग्जाम को पास किया होता है। इन बच्चों के साथ राइज इन्स्टिट्यूट (Rise Institute) के टीचर भी काफी मेहनत करते हैं, क्योंकि इन बच्चों की गणित और साइंस बहुत कमजोर होती है। इस कारण ‘राइज’ की टीम इन बच्चों के हिसाब से अपना मॉड्यूल बनाया है। हालांकि शुरूआत में उन्होने जो माड्यूल बनाया था वो इसे यहां पर लागू नहीं कर पाये क्योंकि बच्चों की पढ़ाई उस स्तर की नहीं थी। शुरूआत में यहां के बच्चों को पढ़ाने के अनुभव को बताते हुए इम्बेसात कहते हैं कि

मैं बिहार के रहमानी सुपर 30 में बच्चों को पढ़ाता था। इस कारण मुझे लगता था कि मैं एक अच्छा टीचर हूं, लेकिन यहां आने के बाद एक साल के अंदर ही मुझे लगने लगा कि मैं काफी खराब टीचर हूं, जबकि ऐसा था नहीं मैं सिर्फ उन्हें दूसरे राज्यो के बच्चों के हिसाब से पढ़ा रहा था जबकि यहां के बच्चों का तो अभी तक गणित और साइंस का बेस ही मजबूत नहीं था।

Rise Members

इसके बाद उन्होने यहां के बच्चो की जरूरतों और उनके बेस को देखते हुए अपने मॉड्यूल तैयार किये और उनके बेस को मजबूत करने के लिए पहले बच्चों को गणित और साइंस में ज्यादा ध्यान दिया। इम्बेसात और उनकी टीम के लिये बड़ी खुशी की बात है कि उनकी मेहनत अब रंग लाने लगी है। यही वजह है कि पिछले साल ‘राइज’ के 4 छात्रों का आईआईटी में चयन हुआ था, जबकि 30 बच्चों का एनआईटी में चयन हुआ था। इस साल 42 बच्चों का एनआईटी में चयन हो चुका है, जबकि आईआईटी का रिजल्ट अभी आना है। ये ‘राइज’ की टीम की कोशिशों का असर है कि धीरे-धीरे श्रीनगर (Srinagar) में रहने वाले बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ रहा है। अब यहां के बच्चे भी मानने लगे हैं कि सही समय पर यदि सही फैसला लिया जाये तो इससे उनकी जिंदगी बदल सकती है। ‘राइज’ की टीम कोचिंग के अलावा श्रीनगर के स्कूलों और कॉलेजों (schools and colleges in Srinagar) में जाकर वर्कशॉप का आयोजन करते हैं। जहां पर वो छात्रों को बताते हैं कि वो किन-किन क्षेत्रों में अपना करियर बना सकते हैं। साथ ही बच्चों को रिज्यूम बनाना सीखाते हैं। दूसरे राज्यों की यूनिवर्सिटी में कैसे दाखिला लिया जा सकता है? एमबीए, डिजाइनिंग या दूसरे कोर्स कैसे दाखिला लेना है और उसके लिये क्या करना है? इन सब बातों की ये जानकारी देते हैं। वो एनआईटी के छात्रों से कहते हैं कि वो अपने आस-पास  की परेशानियों को देखें और उनका समाधान ढूंढने की कोशिश करें। हो सकता है कि समाधान ढूंढने में ही उनको अपना स्टार्टअप शुरू करने में मदद मिले। स्टार्टअप शुरू करने में छात्रों को ‘राइज’ की टीम गाइड करती हैं। यही वजह है कि उनकी ऐसी कोशिशों से ‘राइज’ की एक छात्रा बरीन ने पशमीना शॉल का ऑनलाइन पोर्टल शुरू किया है। इसके अलावा जून से ‘राइज’ की एक शाखा जम्मू में भी खुलने जा रही है।​

यदि आप भी इम्बेसात अहमद (Imbesat Ahmad) या उनके ‘राइज इन्स्टिट्यूट’ (Rise Institue) के बारे में और अधिक जानना चाहते हैं तो आप उनकी वेबसाइट पर जाकर और अधिक जानकारी जुटा सकते हैं।

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