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स्वदेशी आंदोलन से कैसे जन्म हुआ पार्ले जी का?

1929 में जब कंपनी शुरू हुई थी तो यहां सिर्फ ऑरेंज कैंडियां और किसमी टॉफी बनती थीं। कंपनी ने 75000 रुपयों में एक फैक्ट्री खरीदी और जर्मनी से मशीनें मंगाकर बिस्किट का उत्पादन शुरू कर दिया।

आज कॉ़न्फेक्शनरी का ये ब्रांड भारत के बाजार पर राज करता है। इस कंपनी का बिस्किट का कुल बिजनेस 27,000 करोड़ के आस-पास है।

वक्त के साथ कंपनी के बिस्कुट का नाम ग्लूको से पारले-जी हो गया। 1996 से 2006 तक यानी लगभग एक दशक तक इस कंपनी ने अपनी कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया।

आज मुंबई के सबसे भीड़-भाड़ उपनगरीय इलाकों में से एक विले पार्ले का 1929 में कोई अस्तित्व तक नहीं था। उस वक्त सिर्फ इरला और पर्ला नाम के दो गांव हुआ करते थे। उसी साल चौहान परिवार ने पहली भारतीय बिस्किट कंपनी पार्ले की शुरुआत की थी। उस वक्त कंपनी की फैक्ट्री सिर्फ डेढ़ एकड़ की जगह में बनी थी। उसमें भी सिर्फ 40×60 फीट का एक टीन शेड हुआ करता था। 1929 में भारत जब ब्रिटिश शासन के अधीन था और देश में स्वदेशी आंदोलन तेजी पकड़ रहा था।

भारत में शायद ही ऐसा कोई होगा जिसने कभी पारले जी का बिस्किट नहीं खाया होगा। आप में बहुत लोग आज भी ऐसे होंगे कि जिनकी चाय पारले-जी बिस्किट के बिना अधूरी है। बेहद ही सस्ते और स्वादिष्ट यह बिस्किट पूरे भारत में लोकप्रिय हैं। शुरू में यहां सिर्फ टॉफियां बनाई जाती थीं। लेकिन 1939 से इस कंपनी ने बिस्किट बनाना शुरू किया। आज कॉ़न्फेक्शनरी का ये ब्रांड भारत के बाजार पर राज करता है। इस कंपनी का बिस्किट का कुल बिजनेस 27,000 करोड़ के आस-पास है।

कंपनी के संस्थापक चौहान स्वदेशी आंदोलन से काफी प्रभावित थे। उनका टेक्सटाइल का भी बिजनेस हुआ करता था। पार्ले प्रॉडक्ट्स के कैटिगरी हेड कृष्णा राव बताते हैं कि 1929 में जब कंपनी शुरू हुई थी तो यहां सिर्फ ऑरेंज कैंडियां और किसमी टॉफी बनती थीं। कंपनी ने 75000 रुपयों में एक फैक्ट्री खरीदी और जर्मनी से मशीनें मंगाकर बिस्किट का उत्पादन शुरू कर दिया। 1939 से इस कंपनी ने बिस्किट बनाने की शुरुआत की। और तब इन्हें पार्ले ग्लूको बिस्किट का नाम दिया गया।

उन दिनों कम आपूर्ति की वजह से शुरुआत में बिस्किट गेहूं के बजाय जौ से बनाया जाता था और इसे वैक्स में डुबोए गए अखबार में लपेटा जाता था। कंपनी ने बिस्कुट की बेकिंग और पैकेजिंग के लिए अपनी मशीन बनाई थी। वक्त के साथ कंपनी के बिस्कुट का नाम ग्लूको से पारले-जी हो गया। 1996 से 2006 तक यानी लगभग एक दशक तक इस कंपनी ने अपनी कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया। जबकि इसके रॉ मैटेरियल्स जैसे आटा, चीनी, दूध आदि की कीमतें लगभग 150 परसेंट तक बढ़ीं। 2013 में पारले- जी 5000 करोड़ की बिक्री करने वाला पहला FMCG प्रोडक्ट बन गया।

लेकिन अब जीएसटी लागू होने के बाद कंपनी पार्ले बिस्किट का उत्पादन घटाने के बारे में सोच रही है। क्योंकि अब कॉन्फेक्शनरी पर 18 पर्सेंट का टैक्स लगाया जा रहा है जो इसे पहले 12 से 14 पर्सेंट तक था। अपने फ्यूचर प्लान के बारे में बताते हुए कृष्णा कहते हैं कि कॉन्फेक्शनरी का कारोबार 1,000 करोड़ के आस-पास का है और यह 12 पर्सेंट की ग्रोथ के साथ आगे बढ़ रहा है। इसके 20 प्रतिशत बढ़ोत्तरी होने की उम्मीद है।

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