Templates by BIGtheme NET

सोशल मीडिया को अपनाने और झुठलाने का दौर

किसी मीडिया प्रतिष्‍ठान के भीतर हिंदी भाषा के न्‍यूज़रूम में काम करने के लिए पत्रकारों की भर्ती के दौरान पूछे जाने वाले सवालों की औसत प्रकृति में आए बदलाव पर अगर कभी कोई अध्‍ययन हो, तो कुछ दिलचस्‍प नज़ारे सामने आ सकते हैं। कुछ उदाहरणों से बात को रखना बेहतर होगा। आज से पंद्रह साल पहले 2002 में हिंदी के अखबारों और नए-नवेले समाचार चैनलों में पत्रकारों के इम्तिहान का औसत पैटर्न कुछ यूं होता था: कुछ वस्‍तुनिष्‍ठ प्रश्‍न, प्रेस विज्ञप्ति या अंग्रेज़ी के समाचार के अनुवाद पर आधारित समाचार निर्माण, किसी घटनाक्रम के खण्‍डों को जोड़कर समाचार की एक कॉपी/स्क्रिप्‍ट तैयार करना, समसामयिक विषय पर हजार-पांच सौ शब्‍दों में एक टिप्‍पणी।

पांच साल बाद दृश्‍य बदलता है। 2007 का एक औसत परचा या साक्षात्‍कार कुछ यूं होता है जिसमें सब्‍जेक्टिव प्रश्‍नों के माध्‍यम से अभ्‍यर्थी के राजनीतिक रुझान का पता लगाने की कोशिश की जाती है। तथ्‍यों को लेकर उससे तटस्‍थ रहने की उम्‍मीद की जाती है। पांच साल ओर आगे बढि़ए। 2012 में सवाल कुछ यूं होते हैं जिनमें तटस्‍थता के आग्रह की ज़रूरत ही नहीं रह जाती, मसलन एक टीवी संस्‍थान समाचार संपादक स्‍तर के अभ्‍यर्थी को एक कहानी बताता है और उस पर प्राइम टाइम की स्क्रिप्‍ट लिखने को कहता है। कहानी में एक भालू होता है जो कुएं में गिर जाता है और कुछ गांववाले होते हैं जो उसे जिंदा बचाकर निकाल लाते हैं।

पांच साल बाद यानी आज 2017 में पाला बदल गया है- 2012 में सवाल पूछने वाला शख्‍स कॉपी लिखने के लिए जो आइडिया अभ्‍यर्थी को देता था, आज वही उससे साक्षात्‍कार में पहला सवाल पूछता है, ”कोई आइडिया बताइए।” समाचार आइडिया तक आ चुका है। आइडिया कहां से आएगा? गली-चौक-चौराहे से। पत्रकारों ने गली-चौक-चौराहों पर निकलना बंद कर दिया है। अब वर्चुअल चौराहे आइडिया के जनक हैं। वर्चुअल में पैदा हुआ आइडिया रीयल न्‍यूज़रूम में वायरल ख़बर बन रहा है। प्रेस विज्ञप्ति, अंग्रेज़ी की कॉपी, घटनाक्रम की रिपोर्टिंग और ‘वस्तुनिष्‍ठता’ अतीत की अप्रासंगिक बात हो चली है।

एक अदद ‘क्रांतिकारी’ आइडिया

2017 का वर्ष हिंदी पत्रकारिता में न्‍यूज़रूम के ‘क्रांतिकारी’ कायांतरण के लिए याद रखा जा सकता है। यह ‘क्रांतिकारी’ शब्‍द अपने अर्थ और गंभीरता से पूरी तरह च्‍युत एक प्रहसन में तब्‍दील कर दिया गया है। इसके लिए अंग्रेज़ी में एक सटीक शब्‍द है ”न्‍यूसेंस वैल्‍यू” यानी खुराफ़ात। किसी खुराफ़ाती दिमाग का ही आइडिया रहा होगा कि ‘क्रांतिकारी’-युक्‍त जिस लीक हुई ऑफ-दि-रिकॉर्ड टिप्‍पणी पर आज से कुछ साल पहले ‘आजतक’ पर पुण्‍य प्रसून वाजपेयी की इतनी भद्द पिटी थी और जिसके हवाले से वे लगातार ट्विटर पर ट्रोल होते रहते हैं, आज वही टिप्‍पणी शाम को चैनल पर प्रसारित होने वाले एक नियमित शो का नाम बन चुकी है- ”क्रांतिकारी, बहुत क्रांतिकारी”।

यह प्रतिशोध है। प्रतिशोध सब्‍जेक्टिव है। कोई संपादक अगर किसी कनिष्‍ठ पत्रकार को ‘क्रांतिकारी’ कह कर बुलाता है, तो उसे समझ लेना चाहिए कि उसकी नौकरी तो अब लगने से रही। नौकरी लगने की दो शर्तें हैं। पहली- आप आइडिया के जनक हों। दूसरी- आप सोशल मीडिया पर सक्रिय हों। एक एजेंसी ने सर्वे किया है कि 2017 में नियोक्‍ताओं द्वारा भर्ती का एक अहम पैमाना सोशल मीडिया पर अभ्‍यर्थी की सक्रियता रहा और 59 फीसदी उन लोगों को नौकरी दी गई जिनका सोशल मीडिया फुटप्रिंट तगड़ा हो। हां, यह बात अलग है कि कुछ मीडिया संस्‍थानों ने अपने पत्रकारों के सोशल मीडिया खाते की स्‍वायत्‍तता तक छीन ली और उसे अपने संस्‍थागत बौद्धिक संपदा के अधीन कर डाला। टाइम्‍स ऑफ इंडिया हमेशा की तरह यह एजेंडा सेट करने में अव्‍वल रहा। बाद में ज़ी न्‍यूज़ ने इस हद तक अपना लिया कि पत्रकारों के मोबाइल फोन न्‍यूज़रूम के बाहर रखवाए जाने लगे।

फर्ज़ करिए कि आपके पास मोबाइल फोन नहीं है। एक कंप्‍यूटर स्‍क्रीन है। उस पर इंटरनेट है। आपसे खबर का आइडिया मांगा जा रहा है। ध्‍यान रहे- ख़बर नहीं, आइडिया। दैनिक भास्‍कर डॉट कॉम में पोर्न संपादक की छवि बना चुके विजय झा ने केवल आइडिया के नाम पर जनसत्‍ता डॉट कॉम को साल भर में जबरदस्‍त ऊंचाई पर पहुंचा दिया। खबरों का सबसे ज्‍यादा आविष्‍कार करने वाले जनसत्‍ता डॉट कॉम के पत्रकारों में कल्‍पना की अश्‍लील उड़ान का अंदाजा केवल एक खबर से लगाया जा सकता है जो 9 अगस्‍त 2016 को लीड छपी थी जिसका शीर्षक था, ”आधी रात में ट्रेन में घुसे तीन बदमाश, पिस्‍तौल दिखा कर पुरुष यात्री से की गलत हरकत, स्‍पर्म लूट कर हो गए फरार”। यह खबर अब तक 1300 बार शेयर हो चुकी है। ख़बर विशुद्ध आइडिया है जिसके बारे में कहा गया है कि कथित पीडि़त ने कथित घटना की जानकारी जनसत्‍ता डॉट कॉम को एसएमएस से दी और उसकी पहचान उजागर नहीं की जा रही है।

आइडिया से आइडियोलॉजी तक

आइडिया अगर बिक्री बढ़ाने के लिए है, तो वह मार्केटिंग आइडिया कहा जाएगा, जैसा जनसत्‍ता डॉट कॉम की उपर्युक्‍त ख़बर में दिखता है। वही आइडिया यदि किसी राजनीतिक उद्देश्‍य की सेवा में हो, तो उसे प्रोपगेंडा यानी दुष्‍प्रचार कहा जाएगा। दुष्‍प्रचार इसलिए क्‍योंकि आइडिया में दिए गए नैरेटिव की तथ्‍यात्‍मकता या तथ्‍य की शुचिता की चिंता नहीं की जाती है। आइडिया तब तक पावन है जब तक वह अपना इस्‍तेमाल करने वाले की आइडियोलॉजी को सूट कर रहा है। यहां सच एक कैजुअल्‍टी है। जो भी सच बच रहा है, वह परोसने वाले का अपना सच है। आइए, इसके भयावह परिणाम देखें: अमेरिकी राष्‍ट्रपति के चुनाव के बाद हुई सीनेट कमेटी की सुनवाई में फेसबुक ने स्‍वीकार किया कि चुनाव से पहले यानी जनवरी 2015 से लेकर चुनाव परिणाम आने तक 146 मिलियन ग्राहकों ने उसके प्‍लेटफॉर्म पर रूसी दुष्‍प्रचार की खबरें देखी होंगी। गूगल के यूट्यूब ने माना कि रूस से जुड़े दुष्‍प्रचार के 1108 वीडियो चलाए गए। ट्विटर ने माना कि रूसी प्रोपेगेंडा से जुड़े उसके कुल 36,746 खाते मौजूद थे। रूस से लेकर दक्षिण अफ्रीका और स्‍पेन तक की राजनीति को न्‍यूज़रूम के बाहर से आ रहे ‘आइडिया’ ने प्रदूषित कर दिया है। यह केवल असत्‍य के प्रसार का मसला नहीं है, बल्कि मतदाताओं के विवेक को सुनियोजित रूप से अपहृत करने का एक बडा खेल है जहां खतरे में सीधे लोकशाही आती है, और कुछ नहीं।

भारत में बीता एक साल इस लिहाज से बेहद अहम इसलिए रहा है क्‍योंकि 2016 के अंत में टेलीकॉम के बाजार में मुकेश अम्‍बानी की जियो सेवाओं के उतरने के बाद से हर हाथ में ज़रूरत से ज्‍यादा मुफ्त डेटा आ गया है। इस डेटा का इस्‍तेमाल वीडियो देखने के लिए और संदेश प्रसारित करने में हो रहा है। यही वीडियो और संदेश न्‍यूज़रूम के लिए कच्‍चे माल का काम कर रहा है। किसी ने वॉट्सएप पर किसी देश के जंगल से एक पेड़ का वीडियो बिहार का बताकर लगा दिया जिसके पीछे से पानी बह रहा था। टेलीविजन चैनलों ने आधा घंटा इस बात की जांच करने में बिता दिया कि पानी देने वाला पेड़ कहां से बिहार में पैदा हो गया। इस ‘वायरल वीडियो के सच’ को उजागर करने के क्रम में प्रबुद्ध पत्रकार प्राथमिक कक्षाओं के एक बुनियादी सबक से चूक गया कि पेड़-पौधों के भीतर भी पानी होता है। अतिरिक्‍त आत्‍मविश्‍वास और उत्‍साह से लबरेज़ उस पत्रकार ने अपने पीटीसी में जिज्ञासा की पराकाष्‍ठा पर खड़े होकर विवेक की कन्‍नी यह कहते हुए काट दी कि ”आखिर पेड़ में पानी कैसे आया?”

इस पत्रकार की जिज्ञासा को मूर्खता कह कर दरकिनार नहीं किया जा सकता क्‍योंकि सहज विवेक के अपहरण ने बीते दो साल में दुनिया में सत्‍ताओं को बदल डाला है। माइक्रोसॉफ्ट की एक रिसर्च टीम ने फेक न्‍यूज़ की वेबसाइटों के ट्रैफिक का आकलन किया था और निष्‍कर्ष निकाला था कि ”वे प्रांत या काउंटी जो फेक न्‍यूज़ का अनुभव ज्‍यादा मात्रा में कर रहे हैं वहां डोनाल्‍ड ट्रम्‍प को ज्‍यादा जनमत मिल रहा है।”

About News Trust of India

News Trust of India is an eminent news agency

Leave a Reply

Your email address will not be published.

error: Content is protected !!

ăn dặm kiểu NhậtResponsive WordPress Themenhà cấp 4 nông thônthời trang trẻ emgiày cao gótshop giày nữdownload wordpress pluginsmẫu biệt thự đẹpepichouseáo sơ mi nữhouse beautiful