उत्तराखंड की कितनी परेशानियां हल होंगी इस बजट से !

(मोहन भुलानी, न्यूज़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया)

केंद्रीय बजट के सागर से वादों की किश्ती किनारे ढूंढती है, लेकिन इरादों की बूंदें पर्वतीय आवरण पर कम पड़ जाती हैं। गांव और किसान की माटी का तिलक लगाकर वित्त मंत्री अरुण जेटली काफी संवेदनशील दिखाई देते हैं, बजट का शृंगार भी काबिले तारीफ है, लेकिन मध्यमवर्ग का भंवर जिस गंगा में अपने पाप धोने की आशा लगाए बैठा था, वह पोखर हो गया। जनता के निवाले गिने गए और नमक को हलाल बनाए रखने की तरकीवें भी समाहित हैं, इसलिए जब आयकर के हिसाब की चीरफाड़ होगी तो वार्षिक आय नींबू सी निचुड़ी दिखाई देगी।

वित्त मंत्री ने वेतनभोगी समाज को आदर भरी निगाहों से देखा, तो उत्तराखंड का सरकारी तंत्र खुश हुआ होगा। आयकर छूट की खुशहाली परखने के लिए चालीस हजार की सीमा पर सीना फूल जाता है, मगर जिस तरह चिकित्सा व परिवहन की छूट लूट ली उससे पुनः नौकरी पेशा लोगों का सांस फूला रहेगा। इतना ही नहीं, शिक्षा के लिए एकत्रित हो रहा उपकर भी एक फीसदी बढ़ कर नौकरी पेशा आयकर दाताओं की जेब से पता नहीं कितना ले जाएगा। यह दीगर है कि उत्तराखंडी किसान और बागबान को भी मुस्कराने का अवसर मिल रहा है।

क्लस्टर के रूप में विशेष कृषि उत्पादों की शिनाख्त होती है, तो उत्तराखंड में ऑफ सीजन सब्जियों को आपरेशन ग्रीन का भरपूर लाभ मिलेगा। इसी तरह कृषि बाजार तथा मेगा फूड पार्क खोलने के प्रस्तावों में उत्तराखंड अपनी हिस्सेदारी खोज सकता है। जड़ी-बूटियों, शहद, मत्स्य पालन तथा आलू की पैदावार में केंद्र सरकार द्वारा दिए गए आश्वासन उत्तराखंड के नीति नियंताओं को फिर से संवरने का मौका दे रहे हैं। उत्तराखंड के कृषि बाजार में नकदी फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए यह सुनहरा अवसर हो सकता और अगर सरकार हर्बल नीति लाने में सफल हो जाती है, तो एक अलग से ब्रांड उत्तराखंड सशक्त होगा।

उत्तराखंड में वन औषधियों के अपार भंडार हैं और इसी तरह कुछ प्राकृतिक खाद्य पदार्थ भी जंगल देता है। ऐसे में जो अड़चनें वन संरक्षण अधिनियम की तरफ से हैं, उन्हें रेखांकित करके उत्पादकता की जमीन सुधारी जा सकती है। पहाड़ों के लिहाज से सामाजिक क्षेत्र में हो रही हर मेहरबानी का रूपांतरण प्रदेश के बजट में होगा। इसलिए जहां भी आशा की किरण दिखाई देती है, राज्य अपने लाभ की खिड़कियां खोल पाएगा। अधोसंरचना, चिकित्सा व शिक्षा के क्षेत्र में मोदी बजट के कितने कतरे उत्तराखंड को मिलते हैं, इस पर बहस हो सकती है, लेकिन कनेक्टिविटी के क्षेत्र में कुछ तो उजाले होंगे। यह दीगर है कि रेल विस्तार के बंद पन्नों की कल्पना में उत्तराखंड का शरीक होना या ऋषिकेश -कर्णप्रयाग जैसे रेल मार्ग का हकीकत में आना, अभी राष्ट्रीय परियोजना का आधार नहीं बन रहा।

सैन्य साजो सामान के उत्पादन में, औद्योगिक पहल की करवटें अगर उत्तराखंड तक पहुंचती हैं तो इस कदम से वर्षों का इंतजार मिट सकता है, वरना बजट का निन्यानवे फीसदी हिस्सा प्रदेश के लिए हमेशा की तरह कोरा कागज ही बना रहेगा। आल वेदर रोड़ का जिक्र सैन्य रणनीति का अहम पात्र बन जाता है और इस हिसाब से सरहद को जोड़ती सड़कों के छोर पर्वतीय पृष्ठभूमि को सुदृढ़ करेंगे।

देश के विकासशील चेहरे को आकार देते अमृत और स्मार्ट शहरों का ताल्लुक उत्तराखंड से भी है और अगर हमारा भविष्य सुनिश्चित करना है, तो विकास के हर मील पत्थर का नब्बे फीसदी खर्च केंद्र को उठाना होगा। धरोहर शहरों व पर्यटन की नई मंजिल में राज्य कितना करीब आता है, इसे समझाने के लिए हमें अपने सांसदों से पूछना पड़ेगा, लेकिन प्रदेश की आरजू पूरा करने के लिए केंद्रीय वित्त पोषण की दर 90:10 नहीं होती, तो सारा माजरा और मंजर खराब ही निकलेगा। पर्वतीय पीड़ा का एहसास इस बजट में कितना है, यह आने वाला वक्त ही बताएगा।

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