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कितने दिन सत्ता सुख भोग पाएंगे नीतीश कुमार?

(मोहन भुलानी, न्यूज़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया )

राज्य के हाईकोर्ट तथा सभी सरकारी और गैर-सरकारी दफ्तरों के दरवाज़े खुलने के ऐन पहले ही  नीतीश कुमार ने छठे मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण करके एक नया इतिहास रच दिया। शपथ-ग्रहण में उनके साथ उप-मुख्यमंत्री के रूप में सुशील मोदी ने भी शपथ ली। यह वही मोदी हैं जिनके राष्ट्रीय नेता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत बीजेपी के लगभग सभी आला नेताओं के हाथ से एक तरह से भोजन की थाली छीनकर नीतीश जी ने इसी बिहार में अतिथि-अपमान का अभूतपूर्व इतिहास भी रचा था।

मगर विडंबना यह है कि ज़ीरो-टौलरेंस के नाम पर नीतीश जी ने बिहार की राजनीति में यह जो दांव खेला है, इसके लिए श्रेय इस बार उन्हें देने की बजाय लोग आमतौर पर इसे नरेंद्र मोदी और बीजेपी की चिर-प्रतीक्षित रणनीति का परिणाम अधिक बता रहे हैं। इसका खुला प्रदर्शन स्वयं नरेंद्र मोदी ने ही कर दिखाया जब बिहार के गवर्नर को इस्तीफ़ा सौंपते ही उन्होंने नीतीश जी की पीठ अपने दो-दो ट्वीट के माध्यम से थपथपाने में थोड़ी भी देरी ना की।

इधर, बिहार बीजेपी पार्टी ने भी कल रात में ही अपनी विधानमंडल समिति की बैठक आनन-फानन में बुलाकर थाली छिनने के हाल के अपने गहरे अपमान के बावजूद नीतीश जी के लिए जिस आकुलता के साथ समर्थन की थाली परोसने का प्रस्ताव लेकर सामने आई, वह भी इसी बात की तस्दीक है। बिना चुनावों में उतरे राज्यों में गैर-बीजेपी सरकारों को अपने में समाहित करने की खुली कूटनीति का यह डंका बिहार में बजाकर बीजेपी ने साबित कर ही दिया कि राजनीति के चाणक्य समझे जाने वाले नीतीश, संघ संचालित बीजेपी के आगे अभी कितने बौने हैं।

आम तौर पर समझ यह थी कि बीजेपी के समर्थन से नीतीश जी के नेतृत्व में बनने वाली इस अगली पारी की सरकार का शपथ-ग्रहण समारोह दूसरे दिन यानि आज गुरुवार की शाम को संपन्न होगा। मगर, एक तरह से कहिए तो सनसनी ही फैल गई जब यह खबर आई कि समारोह का समय सुबह 10 बजे तय किया गया है।

राजनीतिक हलकों में नीतीश जी की इस हड़बड़ी के पीछे जो डर बताए जा रहे हैं, वह भी कम दिलचस्प नहीं है। पहला है, सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद राज्यपाल द्वारा राजद को बुलावा ना देने के ख़िलाफ़ लालू के लोगों द्वारा हाईकोर्ट के खुलते ही शपथ-ग्रहण समारोह के स्थगन के लिए रिट याचिका दायर करने की खबर। दूसरा यह कि शाम होते-होते, नीतीश जी को अपनी ही पार्टी के भीतर टूट-फूट की भरपूर आशंका का भान होना। इस टूट-फूट के अभियान में (जैसा कि चर्चा में है) जब शरद यादव जैसा कद्दावर नेता लगा हो तो नीतीश जी के डर को सहज ही समझा जा सकता है।

अब नीतीश कुमार ने यहां जो दांव खेला उसे चाणक्य-नीति के समतुल्य तो कहा ही जा सकता है, भले ही वह इस बार बीजेपी के दांव के आगे बौना साबित क्यों ना हुए हो। उन्होंने अपने शपथ-ग्रहण समारोह पर भारी ग्रहण लगने के इन दो ख़तरनाक बिंदुओं को निर्मूल करने के लिए शाम के समय ही राज्यपाल पर दबाव डालकर इन्हें गतलखाते में डलवा दिया।

हाईकोर्ट के खुलने के पहले शपथ-ग्रहण संपन्न करवा लेने से जहां कोर्ट के स्टे ऑर्डर के ख़तरे की गुंजाइश नहीं रह जाती है, वहीं शाम तक का समय ना देकर पार्टी के विधायकों को तोड़ने के कैसे भी अभियान पर पूर्ण विराम लगाना भी संभव हो जायेगा। वैसे भी रातभर अपने सभी विधायकों को कहीं सुरक्षित जगह पर रोके रहना अब तो बांयें हाथ का खेल हो गया है।

यह दांव निश्चित रूप से अचूक साबित हुआ। पार्टी के भीतर विद्रोही गुट और लालू प्रसाद का राजद दोनों ही नीतीश जी के इस अचूक दांव से यदि सच कहा जाए तो, सीधे औंधे मुंह गिरे हैं।

लेकिन, नीतीश जी भले ही चार साल के बाद बीजेपी के साथ एक बार पुनः सत्ता में आने में सफल हो गए हो और जाने यह सरकार कब तक चले। मगर, यह उन्हें यह अच्छी तरह मालूम है कि जो डर उन्हें शपथ-ग्रहण के पूर्व डरा रहा था, वह उनका पीछा आसानी से छोड़ने वाला नहीं। अब तो एक तीसरा डर भी उन्हें सोते-जागते सताये रहेगा, वह है सत्ता में सहभागी रहने के बावजूद थाली छिनने के अपने नेता और पार्टी के भारी अपमान का बदला चुकाने की बीजेपी द्वारा मौक़े की अनवरत ताक। अब देखना यह है कि कई डरों के साये में रहकर वह अपनी इस छठी पारी के सत्ता-सुख को कितनी देर और दूर तक भोग पाते हैं?

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