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उग्र हिंदुत्व और वैकल्पिक राजनीति के अभाव में अटका देश

(By अजय गुदावर्ती)

संघ परिवार की रणनीति में भारी विरोभास है. एक तरफ वे आधुनिकता के सिरे से पूंजीवादी व्यवस्था जिसमें बुलेट ट्रेन और विकास की अवधारणा को प्रतीक के तौर पर पेश किया जाता है और दूसरी तरफ खुद ही पूंजीवादी विकास बनाने के लिए जरूरी समाजिक समरसता के माहौल को बर्बाद करते हैं. यही विरोधाभास भारत में दक्षिणपंथियों का राजनीतिक भविष्य तय करेगा.

एक लिहाज से इस बढ़ते विरोधाभास का कारण समझा जा सकता है कि भाजपा के नेतृत्व में दक्षिणपंथी तबका दोनों ही पैमानों पर खरा उतरने की कोशिश कर रहा है. दूसरे शब्दों में, वे वैश्विकरण के तेजी से हो रहे विस्तार और नवउदारवादी सुधारों का समर्थन और साथ ही इसके खिलाफ बढ़ रहे रोष को भी हवा देते हैं. यह विश्वस्तर पर जो हो रहा है उसी की बानगी है, जैसा अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के चुने जाने के बाद दिखा. वह देश में बीते दो दशकों से जारी नवउदारवादी सुधारों के फलस्वरूप ग्रामीण इलाकों में पैदा हुई श्वेत श्रेष्ठता की भावना को हवा देने वाले पहले श्वेत राष्ट्रपति सिद्ध हुए. शायद यही कारण है कि नव उदारवादी पूंजीवादी नीतियों से जितना असंतोष पैदा हुआ, जनता उतना ही ज्यादा कॉरपोरेट समर्थक सरकारों को चुनना शुरू किया.

भारत में भी, कांग्रेस नीत यूपीए द्वारा शुरू की गई नरेगा जैसी कल्याणकारी नीतियों के लचर क्रियान्वयन से लोग असंतुष्ट हुए. लेकिन इसकी प्रतिक्रिया में जनता ने एक ऐसी सरकार चुनी जिसने कल्याणकारी नीतियों का अनुदान और भी कम कर दिया. आज हमारे पास एक दक्षिणपंथी राजनीति है जो वैश्विकरण का विस्तार भी करे, उसके पास विकास की अवधारणा को लेकर पर्याप्त जुमलेबाजी है, लेकिन इसके साथ ही उससे जुड़े ऐसे फ्रिंज ग्रुप भी हैं जो इस पूंजीवादी विकास के लिए जरूरी आधुनिक सोच और प्रगतिशीलता के खिलाफ ज़हर उगलें. ये समूह पूंजीवादी विकास के लिए जरूरी आधुनिकता जिसमें कानून के सिद्धांतों- सिविल और स्वतंत्रताएं, निजता और सम्मान के अधिकार, विविधताएं और दोस्ताना सामाजिक रिश्ते- इन सबका विरोध करते हैं. जबकि ये ही वे सिद्धांत हैं जो संकीर्ण सामुदायिक बावनाओं को चुनौती देते हैं, उसे कुंद करने का काम करते हैं.

पूंजी अपने ही तर्कों से व्यक्तियों और सामुदायों को विस्थापित कर देती है. इसके अपने व्यक्तिवाद और उपभोक्तावाद की प्रक्रियाएं होती हैं. भीड़ द्वारा हत्या, पद्मावती जैसी फिल्मों पर बढ़ते विरोध, राजपूताना गर्व, लव जिहाद, मैरिटल रेप को गुनाह मानने के खिलाफ विरोध करना व अन्य सामुदायिक संवेदनाओं को असुरक्षा का एहसास कराती हैं. ट्रिपल तलाक, पसमांदा मुसलमानों की समस्या और कश्मीर में हिंसा को हवा देकर बहुसंख्यक समाज द्वारा धार्मिक अल्पसंख्यकों की भावनाओं को आहत कर बहुसंख्यकवाद का आभास किया जाता है. मुसलमानों को हाशिये पर ढकेलने और धार्मिक अल्पसंख्यकों की मान्यताओं में अवरोध पैदा करना अपने आप में बहुसंख्यकों को सशक्त होने का अवसर दे देगा.

इसलिए दक्षिणपंथ बीफ या गाय जैसे मुद्दे उछालता है और उसे आम जीवन का हिस्सा बना देना चाहता है जिससे की देश में हिंदू समाज के दायरे का विस्तार हो. इसके साथ ही इसकी दूसरे धार्मिक अल्पसंख्यकों से दूरी बढ़ेगी.

आधुनिक पूंजीवादी रणनीति और एकीकृत सामुदायिक हिंदुत्व का विरोधाभास भारत की छवि और वैश्विक निवेश को लेकर उत्साहित अभिजात्य उदारवादी समाज की चिंताओं में झलक जाता है. नतीजतन प्रधानमंत्री को गौरक्षकों को नसीहत देने की जरूरत तो पड़ती है लेकिन इसके आगे कोई ठोस कारवाई नहीं की जाती.

प्रधानमंत्री ने प्रेस की आजादी के समर्थन में भी वक्तव्य दिया लेकिन उनके पार्टी के लोग ही आए दिन कलाकारों, पत्रकारों, छात्रों, अकादमिकों या सरकार के आलोचकों को खुली धमकी देते हैं. आलोचकों की विश्वसनीयता तय करने का एक अलग मानक बन गया है राष्ट्रवाद जहां पार्टी और उसके नेता को ही राष्ट्र मान लिया गया है. इसके बाद अगर कुछ बचता है तो आलोचक को भ्रष्टाचार के खिलाफ होने का आरोप लगा दिया जाता है. भ्रष्टाचार और राष्ट्रवाद इस दोपरतीय रणनीति की दो खोखले हथियार हैं, जो रणनीति रूप से इस्तेमाल हो रहे हैं.

कितने वक्त तक दो विरोधाभासी रणनीतियां टिक पाएंगी? पिछले दिनों दक्षिणपंथ के इस मॉडल की खामी उभर कर सामने आई. जहां तक आर्थिकी का प्रश्न हैं- बहुचर्चित नोटबंदी के फैसले से जीडीपी में भारी गिरावट, विकास की अवधारणा के संदर्भ में बेरोजगारी और जीएसटी को लेकर व्यापारियों की चिंताएं. ये सारे उदाहरण पूंजीवाद के अपने सीमित दायरे के भीतर ही है. हालांकि, सामुदायिक चिंताएं उठी हैं तो समुदायों के भीतर विभिन्न तरह के विरोध उभरे हैं, लोगों को लामबंद किया गया है. यह न सिर्फ संस्कृति, पहचान और सम्मान बल्कि सामाजिक पिछड़ेपन और आर्थिक अवसरों के मुद्दों में झलकता है. पाटीदारों, जाटों, माराठों का आरक्षण को लेकर विरोध हो या उत्तर प्रदेश में भीम आर्मी का उभार हो या जिग्नेश मेवानी के नेतृत्व में गुजरात में भू-अधिकारों का आंदोलन हो- सब इसी के उदाहरण हैं.

इन आंदोलनों को कुचलने, धमकाने, लोगों को गिरफ्तार करने या झूठे मुकदमे लादने या राजनीतिक आंदोलनों का नेतृत्व करने वालों की सीडी जारी करने के अलावा दक्षिणपंथ के पास मांगों को पूर्ण करने की कोई प्रभावी रणनीति नहीं है. स्थिति बहुत अलग नहीं होगी अगर राजपूत अपने शान की जगह पर सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रताओं के मुद्दे पर बात करने लगे.

दक्षिणपंथी सामुदायिक व सांस्कृतिक कुलबुलाहटों को बखूबी जानते हैं और बहुत सुरक्षात्मक तरीके से उसे हिंसा की शक्ल में ढाल देते हैं. सड़कों पर बवाल और हिंसा दक्षिणपंथ की पुरानी और लंबी चली आ रही रणनीति का हिस्सा है जिसमें वे ऐतिहासिक या सामाजिक बैचेनियां- जिनका उनके पास कोई तर्क नहीं होता बल्कि वे स्मृतियों व कल्पनाओं का हिस्सा होती हैं, लेकिन ये रणनीति ठोस और समाजिक व आर्थिक स्वतंत्रा के मुद्दों पर प्रभावहीन हो जाती है. सामाजिक-आर्थिक विषयों पर न दक्षिणपंथ के पास कोई रचनात्मक कल्पनाशीलता है बल्कि वे इन मौकों पर औसत से भी नीचे सिद्ध होते हैं.

यह विरोधाभासी रणनीति कबतक जारी रहेगी ये विपक्षी दलों के काउंटर नैरेटिव पर भी निर्भर करता है? कांग्रेस “इंतजार करो और देखो” की नीति पर चल रही है. उनकी कल्पना और रणनीति इस विश्ववास पर निर्भर है कि वे राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ विपक्ष की भूमिका में हैं. वे इसलिए काउंटर नैरेटिव देने की किसी जल्दबाजी में नहीं हैं. उन्हें मालूम है विवाधताओं से पूर्ण देश में सामाजिक और आर्थिक असमानताएं विरोध की ज़मीन खुद ब खुद तैयार हो जाएगी और तब कांग्रेसी विकल्प के तौर पर दिखने लगेंगे. क्षेत्रीय दल भी सामूहिक तौर पर तोल-मोल का खेल खेल रहे हैं चुंकि उनकी अपनी प्रतिबद्धताएं हैं. जहां नीतीश कुमार के मामले में, जिनका कोई भी स्वतंत्र सामाजिक आधार नहीं है, वे क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा में पाले बदलते रहते हैं और ममता बनर्जी वामपंथियों को किनारे लगाने के लिए भाजपा को जगह दे रही हैं. ममता समझतीं हैं कि भाजपा को बढ़ने में वक्त लगेगा लेकिन इसी बीच वामपंथियों का पतन होता चला जाएगा. पर इंतजार और सामूहिक तोलमोल के इस खेल में, काउंटर नैरेटिव पर कोई ठोस जोर नहीं दिया जा रहा है.

भारतीय राजनीति में सामाजिक लोकतंत्र के ढहने के साथ विमर्शों के स्थान भी बेहद कम होते जा रहे हैं. जब तक कुछ राजनीतिक आंदोलन अपने यथार्थ स्वरूप के इतर काम करना शुरू करते हैं तभी वे क्षेत्रीय व राष्ट्रीय दलों पर काउंटर नैरेटिव बनाने का दबाव बना पाते हैं. पर इसके लिए दूरगामी सोच और सकारात्मक विश्वास की जरूरत होती है.

 

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