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देश में क्यों बढ़ रही है नफ़रत!

भूपेश पंत

देश में विभिन्न समुदायों के बीच नफ़रत का ग्राफ पिछले तीन सालों से लगातार बढ़ रहा है. 2014 से अब तक नफ़रत से होने वाले अपराधों में 41 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी है. तीन सौ गुना बढ़ोत्तरी के साथ यूपी पहले नंबर पर है जबकि उत्तराखंड जैसे शांत प्रदेश में भी ऐसे मामले कई गुना बढ़े हैं. संसद में एक सवाल के जवाब में केंद्र सरकार की ओर से मंगलवार को पेश ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं.

यूपी में 300 गुना बढ़े नफ़रत की हिंसा के मामले

केंद्र में मोदी सरकार के सत्तारूढ़ होने के बाद से नफ़रत जनित हिंसा का बढ़ना विपक्ष के लिये भले ही एक सियासी मुद्दा हो, लेकिन मौजूदा हालात में ये एक बड़ा सामाजिक मुद्दा बनता दिख रहा है. राजनीति में धर्म और जाति के दुरुपयोग और उसके अपराधीकरण को लेकर कोई भी दल दूध का धुला नहीं है. केंद्र सरकार की ओर से दी गयी जानकारी के मुताबिक 2014 से भारत में नफरत वाले अपराधों यानी हेट क्राइम में 41 फीसदी की वृद्दि हुई है. इस मामले में यूपी सबसे ऊपर है जहां तीन सौ फीसदी से ज्‍यादा की वृद्दि दर्ज हुई है. यूपी के बाद पश्चिम बंगाल में 2014 और 2016 के बीच सामुदायिक हिंसा में लगभग 200 फीसदी वृद्धि देखी गई है.

देशभर में गौरक्षा के नाम पर और भीड़ की शक्ल में हुई हिंसा की घटनाओं के बारे में पूछे गए एक सवाल के जवाब में गृह राज्‍य मंत्री हंसराज अहीर ने मंगलवार को ये आंकड़े दिए. सांसद प्रसून बनर्जी और केसी वेणुगोपालन ने ये सवाल पूछा था. उन्होंने सरकार से यह भी पूछा था कि क्‍या भीड़ की हिंसा के खिलाफ कोई सख्‍त कानून बनाने का प्रस्‍ताव है. जवाब में अहीर ने भीड़ द्वारा मारे जाने के खिलाफ कोई और कानून बनाने के प्रस्ताव पर विचार से इंकार किया. अहीर ने स्पष्ट किया कि सरकार गौरक्षकों द्वारा हिंसा की घटनाओं का अलग ब्‍योरा नहीं रखती. ये उपलब्ध आंकड़े धर्म, जाति, जन्‍म स्‍थान आदि के आधार पर विभिन्‍न समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देने वाले अपराधों के हैं.

यूपी में 2014 में नफरत फैलाने वाले अपराध सिर्फ 26 थे. इस मामले में वो केरल (65), कर्नाटक (46) और राजस्थान (39) से भी  पीछे था. लेकिन यूपी में 2015 में ऐसे अपराध बहुत तेजी से बढ़े और ऐसे 60 मामले दर्ज किए गये. जबकि 2016 में यह संख्‍या बढ़कर 116 हो गई. पश्‍चिम बंगाल में 2014 में सिर्फ 20 ऐसे मामले थे, जो 2016 में बढ़कर 53 हो गए. उत्तराखंड में भी ऐसे अपराधों में वृद्धि देखी गयी है. 2014 में यहाँ चार मामलों से बढ़कर 2016 में 22 केस दर्ज किए गए. मध्‍य प्रदेश में 5 से बढ़कर 26 मामले हो गए. हरियाणा में 2016 में ऐसे 16 केस दर्ज किए गए जबकि 2014 में सिर्फ तीन मामले ही थे. तेलंगाना में 18 से बढ़कर 33 ऐसे मामले सामने आए. बिहार में 2014 में एक भी ऐसा केस नहीं आया था, जबकि 2016 में आठ केस दर्ज हुए. तमिलनाडु में 16 मामले थे जो बढ़कर 33 हो गए. कुल मिलाकर अधिकांश राज्‍यों में नफरत फैलाने वाले अपराधों में वृद्दि हुई है.

वहीं सुकून की बात है कि छत्‍तीसगढ़, गोवा, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम, नगालैंड, सिक्‍किम, पंजाब और चंडीगढ़ में इस दौरान नफरत वाले अपराधों का कोई केस नहीं हुआ. गृह राज्‍य मंत्री ने संसद को बताया कि कानून, व्‍यवस्‍था बनाए रखने और सभी समुदायों की जान-माल की रक्षा का दायित्‍व मुख्‍य रूप से राज्‍य सरकारों का है.

आभासी दुनिया में धार्मिक और जातीय समुदायों के बीच साफ नजर आ रही रही ये नफ़रत कितनी वास्तविक है, इसका अंदाज़ा केंद्र सरकार के आंकड़ों से हो जाता है.

जानकारों के मुताबिक कानून व्यवस्था भले ही राज्य सरकारों का मामला हो लेकिन केंद्र में बीजेपी की अगुवाई वाली मोदी सरकार के हिंदुत्ववादी तेवरों ने इस आक्रामकता को और बढ़ाया है. गौरक्षा के लिये हिंदू संगठनों से जुड़े कथित गौरक्षकों की हिंसा में संलिप्तता को लेकर सरकार के रुख पर सवाल भी उठे. यही वजह रही कि प्रधानमंत्री को कई बार सार्वजनिक रूप से इसकी आलोचना करनी पड़ी. हालांकि पीएम से लेकर यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के बयानों का भी ऐसी हिंसा पर कोई खास असर देखने को नहीं मिला. आभासी दुनिया में धार्मिक और जातीय समुदायों के बीच साफ नजर आ रही रही ये नफ़रत कितनी वास्तविक है, इसका अंदाज़ा केंद्र सरकार के आंकड़ों से हो जाता है. अमनपसंद लोगों के लिये ये चिंता का विषय होना चाहिये क्योंकि इसका राजनौतिक और सामजिक समाधान भी समय रहते उन्हें ही तलाशना होगा.

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