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हरीश रावत का राजनीतिक भविष्य चौपट, अपने ही दे रहे धोखा !

अपने ही बने हरीश रावत के दुश्मन
हरीश रावत के बारे में कहा जाता है कि जब से वो सक्रिय राजनीति में आये हैं तब से उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वैसे तो सत्ता में रहते हुए हरीश रावत के विपक्षी दल राजनीतिक दुश्मन रहे हों लेकिन आज समय ऐसा है कि उनकी अपनी पार्टी के ही नेता उनके पीछे पड़ गए हैं। इसकी सबसे पहले बानगी देखने को मिली पिछले दिनों विधानसभा सत्र के दौरान, जब सत्र के समय ही विपक्ष की नेता इंदिरा हृदयेश ने हरीश रावत के कार्यकाल और उनकी सरकार के खिलाफ ही हल्ला बोल दिया था।

खुलकर गिनायी गईं कमियां

सरकार के तमाम विधायक और मंत्री सामने बैठे थे और इंदिरा एक-एक कर हरीश रावत के कमियों को अपने शब्दों की माला में पिरोने का काम कर रही थीं। जिसके बाद हरीश रावत ने भी खुलकर इंदिरा के बयान की ना केवल निंदा की थी बल्कि कई बयान जारी कर अपना बचाव भी किया था।

इस घटना के बाद सरकार के नेताओं ने दोनों की कहासुनी को खूब चटकारे लेकर उत्तराखंड की राजनीतिक फिजाओं में बहाने का काम किया।

किशोर उपाध्याय तो पहले से ही हैं खिलाफ
ऐसा नहीं कि सिर्फ इंदिरा ही हरीश रावत के खिलाफ खड़ी हुई हैं। इससे पहले सरकार में रहते हुए पार्टी के पूर्व अध्यक्ष किशोर उपाध्याय भी हरीश रावत के कामों की खुलेआम आलोचना कर चुके हैं। कहा जाता है कि हरीश रावत ने ही किशोर की परंपरागत सीट टिहरी से उठाकर विधानसभा सहसपुर में भेज दिया था। जिसका परिमाण ये हुआ कि उपाध्याय को बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा। आलम ये हुआ कि हार के बाद से अबतक हरीश रावत के किसी भी कार्यक्रम में किशोर दिखाई तक नहीं दिए।

ये सभी जानते हैं कि किशोर की सीधे आलाकमान से अच्छी खासी पकड़ है। लिहाजा किशोर हारे तो लेकिन अध्यक्ष पद से हटने के बाद तुरंत उन्हें राहुल और सोनिया ने नई जिम्मेदारी दे दी जबकि हरीश हार के बाद केवल अपने घर तक ही सीमित रह गए।

ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी ने भी मुंह मोड़ा
हरीश रावत के खिलाफ खड़े होने में तीसरा नाम अगर किसी का हाल ही में आया है तो वो कोई और नहीं बल्कि उत्तराखंड कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी हैं। संत समाज के बड़े चहरे माने जाने वाले ब्रह्मचारी को विधानसभा में हरीश रावत ने जितवाने के लिए हरिद्वार के खूब चक्कर काटे लेकिन हरीश रावत की राजनीतिक हालत को देखकर ब्रह्मचारी ने भी उनसे मुंह मोड़ लिया है और शायद यही कारण है कि उन्होंने हाल ही में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को एक पत्र लिखकर ये कहा है कि हर की पौड़ी पर किसी तरह की राजनीतिक गतिविधियां ना करवायी जाएं।

त्रिवेंद्र को लिख डाली चिट्ठी
उन्होंने अपने पत्र में कहा है कि हर की पौड़ी में सरकार किसी को भी उपवास और धरने के लिए इजाजत ना दे। ये बात किसी से छिपी नहीं है कि सत्ता से बेदखल होने के बाद हरीश रावत कितनी बार गंगा किनारे उपवास और प्रदर्शन कर चुके हैं। इस पत्र के माध्यम से ब्रह्मचारी ने बता दिया कि वो हरीश रावत के साथ बिलकुल नहीं हैं।

प्रीतम ने भी दिया ब्रह्मचारी का साथ
ब्रह्मचारी ने हरीश पर पत्र से हमला किया तो कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष प्रीतम सिंह ने भी ब्रह्मचारी की बात का समर्थन कर दिया। प्रीतम सिंह ने भी कहा कि हर की पौड़ी जैसे धार्मिक क्षेत्र में किसी को भी उपवास और धरने की इजाजत देना गलत है।

हरीश रावत में भविष्य का नेता नहीं दिखता
पार्टी के तमाम नेताओं को ये मालूम हो गया है कि कांग्रेस के भविष्य के नेता अगर कोई हैं तो वो हरीश रावत नहीं बल्कि प्रीतम सिंह और किशोर उपाध्याय ही हैं। लिहाजा हरीश जब सत्ता में थे और उनके साथ जो लोग हमेशा साथ रहते थे वो भी अब प्रीतम के ही साथ दिखाई देने लगे हैं। हरीश रावत द्वारा लगातार कार्यक्रम और जनता के बीच जाना शायद उन कांग्रेसियों को अच्छा नहीं लग रहा जो भविष्य की कांग्रेस के चेहरे हैं और शायद यही कारण है की उनके सभी कार्यक्रमों से वो नदारद रहते हैं।

हरीश को टाटा कहने की तैयारी?
राजनीति में नेता उसी दिशा चलते हैं जहां उन्हें प्रवाह दिखाई देता है और प्रदेश कांग्रेस के नेता ये समझ गए हैं कि अब समय प्रीतम का है और 2019  के साथ-साथ 2022 का भी चुनाव प्रीतम की अगुवाई में ही होगा। उम्र ज्यादा होने की वजह से हरीश, इंदिरा और कुंजवाल जैसे नेता शायद ही भविष्य में कांग्रेस की अगुवाई करें।

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