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देश में मेहनत करने वाली हर जाति ‘शूद्र’ क्यों मानी गई

बीसवीं सदी में शूद्र कौन थे – यह हम जैसे पिछली पीढ़ी के लोग देख चुके हैं। मेरे बचपन में घरों से मैला ढोने वाले लोग शूद्र थे, मोची शूद्र थे आदि। वे अछूत माने जाते थे। उनसे, विशेषकर मैला ढोने वालों से भिड़ जाने पर, मतलब छुए जाने से हम अशुद्ध माने जाते थे। तब या तो गंगा जल छिड़ककर या साधारण पानी को सोने (स्वर्ण धातु) से छुआ कर हम पवित्र हो जाते थे। महात्मा गाँधी के अछूतोद्धार आंदोलनों से दृष्टिकोण प्रभावित हो रहे थे, लेकिन प्रभावी नहीं। महात्मा गाँधी अपना शौचालय स्वयं साफ़ करते थे – तो यह एक उदाहरण मात्र था। आम लोगों को उस से कोई सरोकार नहीं था।

कई धारणाएं और मान्यताएं हैं कि शूद्र कौन थे, अछूत कैसे बने। कुछ कहते हैं शूद्र शब्द ऋग्वेद में बस एक बार आया है, लेकिन मनुस्मृति, कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अतिरिक्त कई धर्मशास्त्रों जानकारी मिलती है। डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने लिखा है कि शूद्र सूर्यवंशी आर्य हुआ करते थे।

यह तब की बात है जब केवल तीन वर्ण होते थे – ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य। क्षत्रिय (शूद्र) का कोई अलग वर्ण नहीं था। शूद्र नाम वाले क्षत्रियों और ब्राह्मणों के युद्ध में ब्राह्मणों पर भारी अत्याचार हुए। ब्राह्मणों ने उन का उपनयन बंद कर दिया। अंततः शूद्रों को समाज के तीसरे वर्ण से भी नीचे धकेल दिया गया।

वैदिक हिंदुत्व ने दक्षिण भारत को काफ़ी प्रभावित किया है। लेकिन वहां केवल दो वर्ण हैं – ब्राह्मण और अब्राह्मण (शूद्र)। कुछ अब्राह्मण अपने आप को सत शूद्र कहने लगे हैं।

रामायण के गुप्तवंशीय संस्करण में शूद्रक की कथा आती है। रामराज्य में शूद्रक के वेद पढ़ने से एक ब्राह्मण पुत्र की मृत्यु हो गई। राम ने दंड वश उस का वध कर दिया। स्पष्ट है कि तब तक शूद्रों को समाज में निम्नतम स्थान दिया जा चुका था। उनके लिए वेदोँ का पाठ वर्जित किया जा चुका था। आज अनेक राज्योँ में वैश्यों और कायस्थों को शूद्र माना जाता है।

आज के सामान्य जीवन में अजब हालत देखी जाती है। उच्च वर्णों के लोग सफ़ाई विभागों में उच्च अफ़सर हैं पर वे शूद्र नहीं माने जाते। अनेक तथाकथित शूद्र मूल के लोग आईएएस हैं। आरक्षण की कृपा से शूद्र मंत्रिमंडलों के सदस्य हैं। शूद्र डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने हमारे संविधान की रचना में सब से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इंडोनेशिया का बाली द्वीप मुख्यतः हिंदू है। वहां जो हिंदुत्व है वह लगभग दसवीं शताब्दी का उत्कलीय हिंदू समाज जैसा है। लेकिन वहां शूद्र मंदिरों में पुजारी हैं। पर वहां पुजारी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य भी हो सकते हैं।

जो भी हो वर्तमान भारत में शूद्रों, अतिशूद्रों के प्रति अपमान, अवहेलना का भाव भाषा में बेहद गहरे बसा है।

इस संदर्भ में इस लेख में मैं प्राचीन कोशो में शूद्र आदि का स्थान खोजने की कोशिश कर रहा हूँ। किसी भी साहित्यिक रचना या संदर्भ ग्रंथ की तरह हर कोश की रचना समकालीन समाज के लिए होती है, और वह उस का दर्पण होता है। आइए हम देखे।
कि ‘अमर कोश’ आदि प्राचीन कोशग्रंथों में समाज के निम्नतम वर्ग – शूद्र, अंत्यज, चांडाल, पंचजन आदि को ‘निघंटु’ और ‘निरुक्त’।

भारत और संसार का सब से प्राचीन थिसारस ‘निघंटु’ माना जाता है। अनेक स्थानों पर इस के रचेता प्रजापति कश्यप कहे गए हैं। ‘निघंटु’ के व्याख्याकार महर्षि यास्क ने अपने महाग्रंथ ‘निरुक्त’ में इसे परंपरागत प्राप्त शब्द सूची कहा है। ‘निघंटु’ में विषयक्रम से संकलित अठारह सौ वैदिक शब्दो। की सूची है। कई बार एक शब्द पूरे एक वर्ग का द्योतक है। इसमें शूद्र शब्द नहीं है, लेकिन मनुष्यों में ‘पंचजन’ का उल्लेख है।

यास्क इसकी व्याख्या इस प्रकार करता है : एक वैदिक मंत्र में पंचजनाः (पाँच जातियाँ) शब्द प्रयुक्त हुआ है। (संदर्भवश उल्लेखनीय है कि कृष्ण के शंख का नाम पांजन्य है। हिंदी शब्दसागर के अनुसार पांचजन्य संज्ञा पुं। [सं। पाञ्चजन्य] १ कृष्ण के बजाने का शंख। विशेष— इसके विषय में यह प्रसिद्ध है कि यह शंख उन्हें पंचजन नामक दैत्य के पास उस समय मिला था जब वे गुरुदक्षिणा में अपने गुरु सांदीपन मुनि को उनका मृत पुत्र ला देने के लिए समुद्र में घुसे थे। कृष्ण ने पंचजन को मारकर अपने गुरु के पुत्र को भी छुड़ाया था और उसका शंख भी ले लिया था।)

यास्क के अनुसार– असुर वे हैं जो बुरे स्थानों पर आनंद लेते हैं, या वे स्थानों से बाहर निकाले जाते हैं (अस् माने फेंकना), अथवा असुः शब्द प्राणवायु का पर्यायवाची है; अंदर लिया गया वह शरीर में स्थित रहता है, अर्थात् इस से युक्त है (असुराः)।

यह जाना जाता है—उस ने देवताओं (सुरान्) को अच्छाई से उत्पन्न किया, यही देवताओं (सुरों) का देवत्व है, उस ने असुरों (असुरान्) को बुराई से उत्पन्न किया, यही असुरों का असुरत्व है। इस के एक दो वाक्यों के बाद आता है कि तुम पंचजनो, मेरे यज्ञ का सेवन करो (प्रीति रखो)। इस के अनुसार पंचजन हैं – गंघर्व, पितर, देवता, असुर तथा प्रेत। औपमन्यव कहता है, ‘वे पाँचवें निषाद के साथ चार जातियाँ हैं।’

हम पंचजन को शूद्रों का समकक्ष मान सकते हैं या नहीं – यह विवाद का विषय हो सकता है। यह भी कहा जाता है कि शूद्र चतुर्थ वर्ण थे, और पंचजन इन से इतर और नीची निषाद आदि पाँच जातियाँ थीँ। इन्हें पंचम वर्ण भी कहा जाता है। (इनका विस्तृत विवरण हमारे ऑनलाइन कोश अरविंद लैक्सिकन में उपलब्ध है।)

छठी-सातवीं सदी में रचित ‘अमर कोश’ में आठ हज़ार शब्दों को संदर्भ क्रम से संकलित किया गया है। इसे संसार का सबसे पहला बृहद थिसारस होने का गौरव प्राप्त है। लिखे जाने के तत्काल बाद यह तत्कालीन ज्ञात विश्व में चीन से लेकर अरब देशों तक प्रसिद्ध हो गया।

‘निघंटु केवल शब्दसूची के रूप में है। ‘अमर कोश’ छंदबद्ध है। छंदबद्ध इसलिए है कि छंदों को याद करना आसान होता है, जब कि गद्य के पैराग्राफ़ को जस का तस याद रखना लगभग असंभव है। ऐसी रचनाओं को कंठस्थ किया जा सकता था। इसका लाभ यह था कि जब किसी को कोई पर्याय चाहिए तो उसे बस उस शब्द का मन में ध्यान करना है, पूरा श्लोक ज़बान पर आ जाएगा।

जिस ज़माने में मुद्रित पुस्तकें नहीं होती थीं, तब साहित्य में काव्य रचना मुख्य विधा के तौर पर लोकप्रिय थी। यही कारण है कि अकसर पुरातन कोशों में शब्दक्रम तुकांत होता था – संस्कृत में ही नहीं, उर्दू में भी। ह में ‘अमर कोश’ के तीसरे कांड में तुकानुसार शब्दक्रम मिलता है। इसका कारण यह था कि तब साहित्य रचना कविता में होती थी।

‘अमर कोश’ का पूरा नाम है ‘अमर कोश – नामलिंगानुशासन’। इसमें हर शब्द का लिंग भी बताया गया है। इस का एक और प्रचलित नाम है ‘त्रिकांड’ क्योँकि इस में तीन कांड हैं।

इसकी रचना के काल तक तक वर्ण व्यवस्था अपने निकृष्टतम और शोषणात्मक रूप तक पहुँच कर सुदृढ़ हो चुकी थी। इसके प्रथम कांड के पहले ‘स्वर्ग वर्ग’ में ब्रह्मा से भी पहले गौतम बुद्ध के सर्वज्ञ, सुगत, धर्मराज, तथागत, भगवान आदि 18 नाम दिए गए हैं। इसलिए अमर सिंह को बौद्ध माना जाता है।

‘स्वर्ग वर्ग’ से शुरू हो कर यह ‘व्योम’, ‘दिशा’, ‘काल’, ‘धी’, ‘शब्द’, ‘नाट्य’, ‘पाताल’, ‘नरक’, ‘वारि’ वर्गोँ की यात्रा कराता हुआ, द्वितीय कांड में ‘भूमि’, ‘पुर’, ‘शैल’, ‘वनौषधि’, ‘सिंहादि’ वर्गोँ से गुज़रता ‘मनुष्य’, ‘ब्रह्म’, ‘क्षत्रिय’, ‘वैश्य’ वर्ग से मिलाता ह में ‘शूद्र’ वर्ग तक ले जाता है।

किसी भी अच्छे कोश की तरह ‘अमर कोश’ भी अपने समय का सच्चा आईना है। निम्न वर्गों के प्रति तत्कालीन समाज के दृष्टिकोण का एक ज्वलंत उदाहरण ‘संगीत’ और ‘संगीतकार’ का है। ‘संगीत’ की गणना ‘नैसर्गिक’ गतिविधियों में की गई। एक और ‘नैसर्गिक’ गतिविधि है ‘देवन’ (जुआ) जो देवताओं का मनोरंजन है। ‘संगीतकार’ को ‘नट’ आदि शूद्रों के साथ गिना गया है।

(प्रसंगवश ‘ईश्वर’ का मुख्य अर्थ है ‘शिव’, ‘विष्णु’ का ‘कृष्ण’। ‘राम’ का उल्लेख केवल तीन रामोँ में से एक के तौर पर है – ‘बलराम’, ‘परशुराम’, ‘दाशरथि राम’। यह भी बताया गया है कि ‘राम’ शब्द नीले रंग का भी पर्याय है। ‘राम’ को ‘धनुर्धरों’ में भी याद किया गया है। जहाँ तक ‘पंचजन’ शब्द का संबंध है, अमर सिंह ने उसे ‘पुरुष’ का पर्याय गिनाया है।

शूद्र कौन थे, क्या करते थे?
अब मैं कुछ शूद्रों के और शूद्रोचित गतिविधियों तथा वस्तु/जीवों के नाम गिनाना चाहता हूँ, ताकि यह बात साफ़ हो जाए कि शूद्रों से अमर सिंह का मतलब क्या था। सूची लंबी है, केवल कुछ धंधों के नाम लिख रहा हूं : वर्णसंकर जातियाँ, चांडाल, कारीगर, शिल्पी, माली, कुम्हार, राजमिस्तरी, जुलाहा, दर्ज़ी, रंगरेज़, चमार, लुहार, सुनार, चुड़िहार, जादूगर, नट, भरत, चारण, कुशीलक, कत्थक, मृदंगिए, जीवांतक, बहेलिए, चिड़ीमार, क़साई, मज़दूर, काँवर ढोने वाले, कुली, किरात, शबर, पुलिंद, चोर, कुएं से पानी निकालने वाले, जुलाहे, पत्थर तोड़ने वाले, लकड़ी चीरने वाले, शिल्पी, मदिरा बनाने वाले, जुआ खिलाने वाले, आदि।

यह सूची दर्शाती है कि सभी कारीगर, मज़दूर आदि शूद्र हैं। आजकल जो दलित, महादलित कहलाते हैं वे सभी अमर कोश के अनुसार सम्राट हर्ष के ज़माने से शूद्र वर्ग में हैं।

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