विकास वर्सेज विकास की दो जुदा कथाएं

(द्वारा – भास्कर उप्रेती, संसाधन शोधार्थी, अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन )

डाकपत्थर में यमुना का चौड़ा पाट है. संकरी घाटियों से गुजरने के बाद उसे पहली बार यहीं पर फैलने का मौका मिलता है, यहाँ भी दोनों ओर पहाड़ हैं मगर थोड़ा रास्ता छोड़ते हुए से. थोड़ा ही आगे पोंटा साहिब को पवित्र करते हुए यमुना नदी यमुनानगर के रास्ते हरियाणा चली जाती है. हालाँकि इस समय पानी कम हो गया है तो यमुना का बड़ा हिस्सा यमुना कैनाल जबकि एक पतली रेखा ही मुख्य नदी में रहती है. अच्छा ही है हरियाणा के किसान यमुना का फायदा लेते हैं. नेताओं के पतली धारा ही काफी है. मथुरा और दिल्ली की सड़ांध में तो यह धारा भी शायद अपना अस्तित्व नहीं जतलाना चाहे.
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खैर बात मैं यहाँ विकास के दो मॉडलों की कर रहा हूँ. हममें से कईयों ने कभी न कभी डाकपत्थर का पार्क देखा होगा. यह पार्क उत्तराखंड सिंचाई विभाग की संपत्ति है. आपने देखा होगा तो इसे काफी चित्ताकर्षक और मनमोहक पाया होगा. जब मैंने इसे पहली बार देखा था तो यह विस्मित करने वाला था. मगर, आज जब इसे बच्चों को दिखाने ले गए तो यह उल्टी करने को विवश कर रहा था. जगह-जगह शराब और बीयर की बोतलों के ढेर लगे थे. और नमकीन, कुरकुरे, स्लाइस आदि तो परिव्याप्त थी. मोदी के स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत के सपने को चरितार्थ करती हुई. सीमेंट की बनी यमुना की मूर्ति सामने उदित हो चुके यमराज के मंदिर को ताक रही थी. मुझे उठा लो यमराज!
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मगर, प्रदेश के सबसे सुन्दर पार्कों में से एक पार्क की यह स्थिति बनी कैसे? इसे सिंचाई विभाग ने बनाया और अपनी अकल के हिसाब से काफी सुंदर बनाया था. इसमें बतखों और खरगोशों के लिए बनाये गए हट्स अभी भी हैं, और उनमें कुछ खरगोश और बतखें यूँ ही समय बिताने के लिए आ भी जाती हैं. शायद उनको भी अच्छे दिन आयेंगे ये भरोसा है. पर्यटकों ने भी सुना होता है या गूगल में पढ़ा होता है तो वे भी आ ही रहे हैं. एक बेचारा बुजुर्ग ऊँट भी टहलता रहता है. प्रकृति का दिया यहाँ बहुत कुछ है, लेकिन बर्बादी वहां से शुरू होती है जब इसे निजी हाथों में देकर अधिक कमाने का प्रयोग शुरू होता है. जाहिर है कुछ साल पहले तक यहाँ प्रवेश का शुल्क होता था और यह पार्क पर्यटकों से लकदक भरा भी मिलता था. ठेकेदारों के लिए यह वैसी ही कमाई का जरिया हो गया था जैसा यमुना का रेता-बजरी. मगर यह बंद हो गया. क्यूंकि उदारीकरण की नव-संस्कृति यानी सरकारी संपदा से माल पैसा काटो इसने कई अडानी खड़े कर दिए. अडानियों और उनके उपकृत नेताओं के आपसी संघर्ष में इसका टेंडर हो ही नहीं पाया. और हाथ पर हाथ धरे बैठे सिंचाई विभाग को अब क्यों पब्लिक वेलफेयर के लिए क्यों कोई कौड़ी खर्च करनी थी. सो, पार्क जार-जार रो रहा है और उसके नमकीन आंसू यमुना के पानी को खारा ही बना रहे हैं.
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अब दूसरी तस्वीर. दूसरी तस्वीर पार्क से सटे यमुना पुल के उस पार हिमाचल के सिंचाई विभाग की है. यहाँ खोदरी में एक विशाल सोलर प्लांट लगा है, जिसकी क्षमता 4.4 मेगावाट विद्युत् पैदा करने की है. कुदरत ने उत्तराखंड वाले हिस्से में काफी चौड़ा पाट दिया है, जबकि हिमाचल को बहुत कम चौड़ा. मगर, हिमाचल के नीति नियंताओं ने यहाँ कायाकल्प कर डाला. हमारे यहाँ तो इतनी बिजली के लिए हाइड्रो पॉवर की परियोजनाएं लगाकर कई गांवों को डुबाने वाली भतेरी परियोजनाएं हैं. मगर, हिमाचल ने नदी किनारे की तैल घाम वाली जगह में विवेक की मिसाल पेश कर दी.
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यहाँ विकास वर्सेज विकास की दो जुदा कथाएं हैं. सरकारी बनाम गैर-सरकारी की दो जुदा कथाएं हैं. मेरे दोनों वैज्ञानिक दोस्त दुनिया-जहाँ घूम चुके लोग हैं. वो अनुमान लगा रहे थे कि यदि हम सरकारी संसाधनों का सही नियोजन करते और एकाउंटेबिलिटी का कोई ऐसा उपक्रम करते तो सरकार यानी जनता को कितनी आय होती. निजी क्षेत्र में तो ऐसी मारकाट है कि मुकेश अंबानी का रक्त-पिपाशु जियो-मुँह अपने ही भाई अनिल अंबानी की रिलायंस टेली-कॉम्मुनिकेसंस को निगल जाता है. मित्तल भारती और टाटा जैसे भी जहाँपनाह सरकार की बेशर्मी पर शिकायत करने लगते हैं. मेरे वैज्ञानिक दोस्त शंकर ने मुझे बताया कि किस तरह स्विट्जरलैंड की सरकार ढेरों रोप-वे चलाकर ढेरों कमाती है. हालाँकि, कमाने पर वहां इतना जोर नहीं होता, सही नियोजन पर अधिक ध्यान रहता है. जब नियोजन सही हो तो उससे बहुसंख्यकों का लाभान्वित होना लाजिमी है.

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