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जनरल रावत की सच्ची, अच्छी बेबाकी!

सेना प्रमुख जनरल रावत ने सही कहा। पते की बात कही और यदि इस बात को समस्या खत्म कराने की रणनीति के नाते केंद्र सरकार भी अपना ले तो 70 साल पुराने सड़े घाव की सर्जरी सचमुच संभव है। बात कश्मीर की है। पाकिस्तान और उसकी इस्लामी जिद्द की है। उस जिद्द के परिपेक्ष्य में सेना प्रमुख की यह बात सटीक है कि किसी भी देश में लोगों में सेना का भय खत्म होने पर देश का विनाश हो जाता है। विरोधियों को आपसे डरना चाहिए और आपके लोगों में भी आपका भय होना चाहिए। हमारी सेना मित्रतापूर्ण व्यवहार रखने वाली है लेकिन कानून-व्यवस्था बहाल करने से जुड़ा सवाल आने पर लोगों में हमारा भय होना चाहिए। कश्मीर में जो छद्म युद्ध चल रहा है वह बहुत गंदे तरीके से लड़ा जाता है। इसमें जीतने के लिए नए तरीके आजमाने होंगे। लोग हम पर पथराव कर रहे हैं, पेट्रोल बम फेंक रहे हैं। ऐसे में जब मेरे जवान मुझसे पूछते हैं कि हम क्या करें तो क्या मुझे यह कहना चाहिए कि बस इंतजार करिए और जान दे दीजिए? मैं राष्ट्रीय ध्वज के साथ एक अच्छा ताबूत लेकर आऊंगा और सम्मान के साथ शव को आपके घर भेजूंगा। प्रमुख के तौर पर क्या मुझे यह कहना चाहिए? मुझे वहां तैनात सैनिकों को मनोबल बनाए रखना है।

यही राष्ट्र-राज्य की रक्षा में सुरक्षा बलों की भूमिका का सत्व-तत्व है। भारत में इस सत्य को कहने में भी सरकार को, समाज को, सिविल सोसायटी को और खुद सुरक्षा प्रमुखों को हिचक होती है। तभी आश्चर्य नहीं कि कश्मीर घाटी में एक पत्थरबाज को मानव ढाल के तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले अफसर मेजर नितिन गोगोई ने जब नए तरीके का इस्तेमाल किया तो सभी की पहली तात्कालिक प्रतिक्रिया नाराजगी भर थी। तुरंत जम्मू-कश्मीर सरकार ने जांच बैठाई, एफआईआर दर्ज हुई तो भारत सरकार और सेना रक्षात्मकता में जांच करने-कराने के तब बयान दे रही थी।

अपना पहले भी तर्क था और अब भी है कि जम्मू-कश्मीर का मसला मलहम-पट्टी के पुराने तरीके से, कभी गरम-कभी नरम और अलगाववादियों- उग्रवादियों के प्रति लिहाज के उन तौर-तरीकों से नहीं खत्म हो सकता है जो 70 साल से चले आ रहे हंै। जैसे पाकिस्तान के लिए जम्मू-कश्मीर जिद्द है। उसके अस्तित्व का मिशन है तो भारत राष्ट्र-राज्य के लिए भी जम्मू-कश्मीर वह मसला है जो धर्मनिरपेक्षता और देश की एकता-अखंडता दोनों के अस्तित्व में आर-पार की लड़ाई है। यदि भारत कश्मीर घाटी के अलगाववादियों, पाकिस्तान के छद्म युद्व के आगे लुटता-पीटता रहता है , हारता है तो फिर वह बाकि भारत को कैसे संभाले रख सकता है? पाकिस्तान की इस्लामी लड़ाई के आगे यदि भारत पस्त हो जाए तो क्या पाकिस्तान की उस थीसिस को फिर हम हिंदू प्रमाणित नहीं कर बैठेंगे कि वे रूलिंग मास्टर है और हम उनकी प्रजा!

यही इतिसाह की सनातनी ग्रंथी है जिससे पाकिस्तान बना और उसके बाद उसने, उससे शह पाए जम्मू-कश्मीर के मुस्लिम उग्रवादियों ने यह जिद्द बनाई हुई है की यदि वे बहुसंख्या में है तो हिंदू के साथ सह-अस्तित्व में नहीं रह सकते। वे खास है। रूलिंग याकि सत्ता चलाने वाला प्रभु वर्ग है। उनकी इस बात को पंडित नेहरू से ले कर आज तक यह कहते हुए पाला पोसा गया कि हां, आप लोग खास हंै इसलिए हमने आपने लिए धारा 370 का दर्जा बनाया है। एक देश में दो संविधान मान रहे है और आप भले देश के दूसरे कोने में जा कर बस जाए मगर आपके यहां भारत का कोई नागरिक आ कर नहीं बसेगा।

सोचें कितनी बेहूदी व्यवस्था, बेहूदा ईलाज भारत राष्ट्र-राज्य ने 70 साल से अपना रखा है। विंडबना की मई 2014 में नरेंद्र मोदी और भाजपा के सत्ता में आने के बाद भी उसी धारा 370 में भारत ने अपने आपको बांधे रखा हुआ है जो अलगाव, कश्मीर घाटी के उग्रवादियों के अलग-खास होने की जिद्द का संवैधानिक तर्क है। शेख अब्दुला, फारूख अब्दुला, उमर अब्दुला और मुफ्ती मोहम्मद, मेहबूबा मुफ्ती सब यही तो स्टेंड लिए हुए थे या लिए हुए हैं कि हम खास है इसलिए हमसे खास तरह का व्यवहार हो। कोई पूछे कि आप कैसे खास है? क्या अल्लाह ताला ने आपको भारत के दूसरे मुसलमानों के मुकाबले अलग तरह से गढ़ा है? जैसे शेष भारत में हिंदू-मुसलमान साथ रहते हंै, एक देश- एक संविधान के कायदे में रह रहे है और 1947 में पाकिस्तान नहीं जा कर भारत की मिट्टी को मादरे वतन माना है तो आप क्यों नहीं मानेंगे?

पर भारत राष्ट्र-राज्य ने सीधी-खरी बात की बजाय कश्मीर घाटी के चार जिलों के कुछ लाख लोगों को सिर पर बैठाया और उन्हे वह हर गुंडागर्दी करने दी जिससे बच्चे-बुढ़े सब बेखौफ हो गए। पूरी आबादी ही पत्थरबाज हो गई। इसलिए सेना प्रमुख रावत की यह बेबाकी सुखद आश्चर्य है कि लोगों में सेना का भय खत्म होने पर देश का विनाश हो जाता है और इस छद्म युद्ध को जीतने के लिए नए तरीके आजमाने होंगे।

उम्मीद है इस बात को नरेंद्र मोदी, अमित शाह और केंद्र सरकार के तमाम वे रणनीतिकार समझेंगे जो अभी भी धारा 370 में जम्मू-कश्मीर समस्या का समाधान मानते है। हिसाब से धारा 370 ही है जिसने कश्मीर घाटी के उग्रवादियों में पत्थरों से भारत राष्ट्र-राज्य को झुकाने की गलतफहमी पाली है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का अपनी जगह यह तर्क ठिक है कि समस्या कुल मिलाकर घाटी के ढ़ाई जिलों की है। पर आपने ढ़ाई जिलों की खास हैसियत क्यों मानी हुई है? घाटी को यदि शेष भारत से जोड़ दे और बिहार, ओडिसा, यूपी के लोगों की आवाजाही शुरू हो जाए तो ढाई जिलों का मतलब अपने आप खत्म होगा।

क्या इस बुनियादी नए तरीके की जरूरत नहीं है? सेना और सेना प्रमुख अपना काम कर रहे हंै पर राजनैतिक नेतृत्व, नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार भी तो कुछ नया सोचें!

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