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कभी मांगनी पड़ी थी भीख, आज बदल रहे हैं सैकड़ों की किस्मत

जिस बच्चे की पढ़ाई 7 साल की उम्र में गरीबी और भूख ने छीन ली हो, पेट भरने के लिए उसने 13साल की उम्र से कोलकाता (Kolkata) में हाथ रिक्शा चलाना शुरू किया हो, वो आज सैकड़ों बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था कर रहा है। उस बच्चे ने अपनी छोटी सी उम्र में तय कर लिया था कि वो भले ना पढ़ पाया हो…लेकिन दूसरे गरीब और बेसहारा बच्चे पढ़ सकें इसके लिये वो कुछ ना कुछ जरूर करेगा। आज वो बच्चा 65 साल का बुजुर्ग बन गया है और सैकड़ों बच्चों को ना केवल मुफ्त में पढ़ाने का काम कर रहा है, बल्कि उनको आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश कर रहा है। आज उस शख्स की बदौलत ना केवल सैकड़ों लोग रोजगार से जुड़े हैं बल्कि बहुत से बच्चे उच्च शिक्षा तक ग्रहण कर चुके हैं। इस शख्स का नाम है गाजी जलालुद्दीन (Gazi Jalaluddin) जो रहते हैं बंगाल में।

गाजी जलालुद्दीन (Gazi Jalaluddin) के पिता सुंदरबन के ठाकुरचौक इलाके में रहते थे। उनकी आर्थिक हालत इतनी खराब थी कि वो अपने बच्चों को भरपेट खाना भी नहीं दे पाते थे। ऐसे में बच्चों की पढ़ाई का बोझ उठाना उनके बस में नहीं था। इसलिये वो परिवार के साथ कोलकाता (Kolkata) में आकर मेहनत मजदूरी करने लगे। उस समय गाजी गांव में दूसरी कक्षा में पढ़ते थे। कोलकाता (Kolkata) आने पर गाजी जलालुद्दीन (Gazi Jalaluddin) ने पेट भरने के लिए भीख मांगी और कई रात भूखे पेट सोये। 1972 में उन्होने 13 साल की उम्र में हाथ रिक्शा चलाना शुरू कर दिया। इसके बाद धीरे-धीरे अपने एक दोस्त की कार से उन्होने ड्राइविंग सीखी और कुछ समय बाद वो टैक्सी चलाने लगे। जिंदगी की गाड़ी रिक्शे की बजाय टैक्सी के जरिये चल रही थी लेकिन वो नहीं चाहते थे कि जो उनके साथ हुआ वैसा किसी दूसरे के साथ हो। इसलिये रिक्शा चलाने के दौरान ही फैसला कर लिया था कि वो अपने गांव के बच्चों और वहां के लोगों के विकास के लिए काम करेंगे।

मैंने सुन्दरबन ड्राइविंग समिति बनाई और अपने गांव के 10 लड़कों को इसका सदस्य बनाया। रोजगार से जोड़ने के लिए मैंने पहले उनको ड्राइविंग सीखाई और  उनसे वादा लिया कि जब वो सीख जायेंगे तो अपने जैसे 4 दूसरे लोगों को ड्राइविंग सीखाएंगे। साथ ही अपनी आमदनी से 5रुपये महीने गांव के विकास के लिए चंदे के तौर पर देने होंगे।

1980 में 10 लोगों को ड्राइविंग सीखाने से शुरू हुआ उनका ये सफर आज तक जारी है। जिसमें वो सुन्दरबन के करीब 500 लोगों को ड्राइविंग सीखा चुके हैं। उनमें से कुछ किराये की टैक्सी चलाते हैं जबकि काफी लोग ऐसे हैं जिन्होने अब खुद की टैक्सियां खरीद ली है। गाजी टैक्सी चलाने के दौरान सवारियों से उनको पुरानी किताबें, कपड़ा देने के लिए कहते थे। जिनको वो सुन्दरबन जाकर आर्थिक तौर से गरीब लोगों के बीच बांट देते थे। वहीं दूसरी ओर धीरे-धीरे करीब 20 सालों की मेहनत के बाद जब उन्होने अपनी आमदनी और लोगों को दान से थोड़ा पैसा बचा लिया तो साल 1998 में उन्होने अपने गांव में स्कूल बनाने के बारे में सोचा। इसके लिए उन्होने गांव वालों के घर घर जाकर उनसे स्कूल बनाने के लिए थोड़ा जमीन मांगी लेकिन कोई भी उनके इस काम में उन्हें सहयोग देने के लिए तैयार नहीं हुा। इसके बाद उन्होने अपने पिता की दी हुई छोटी सी जमीन पर एक कमरे से आईआई थ्री प्राइमरी स्कूल की शुरूआत की। 22 बच्चों के इस स्कूल में पढ़ाने के लिए दो टीचरों को नियुक्त किया गया। इसके बाद साल दर साल बच्चे पास होते जाते और हर साल उनकी अगली कक्षा के लिए एक कमरा बनाया जाता। 2006 तक उन्होने कुल 12 कमरे का स्कूल बना दिया था। आज इस स्कूल की कक्षा एक से 5वीं तक करीब 200 बच्चे पढ़ते हैं। जिनको 8 टीचर पढ़ाते हैं।

Gazi Jalaluddin school children

इसके बाद 2009 में उन्होने कोलकाता के दो दानदाताओं की मदद से जमीन लेकर गांव में ही अपना दूसरा स्कूल ‘सुन्दरबन शिक्षातन’ खोला है। ये स्कूल उनके पहले स्कूल से करीब दो किलोमीटर दूर है। यहां के लिए जमीन अलमारी, कुर्सी, मेज दानदाताओं ने दी है। ये भी प्राइमरी स्कूल है और यहां पर भी इस समय करीब 200 बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। इसी साल उन्होने गांव में ही गरीब अनाथ बच्चों के लिए सुन्दरबन अनाथ मिशन (Sundarban Orphanage Mission) नाम से एक स्कूल खोला है। जो छठी से 10तक का स्कूल है। इन तीनों स्कूलों में  21टीचर बच्चों को पढ़ाने का काम कर रहे हैं जबकि सहायक का काम करने के लिए उन्होने 4लोगों को नियुक्त किया है। इन तीनों स्कूलों में बच्चों को दोपहर का खाना, किताबें, स्कूल से जुड़ा दूसरा समाना सब कुछ मुफ्त में दिया जाता है। इन तीनों स्कूलों पर हर महीने करीब 2लाख रुपये खर्च होते हैं। गाजी को अपने इस काम में कोई सरकारी मदद नहीं मिल रही है। वो टैक्सी चलाकर और लोगों से दान इकट्ठा कर जैसे तैसे इन स्कूलों को चला रहे हैं। जब कभी पैसा कम पड़ जाता है तो उनको उधार लेना पड़ जाता है। उनके इस काम में उनका बड़ा बेटा इस्माइल गाजी (Ismail Ghazi) भी मदद करता है। वो भी कोलकाता (Kolkata) में टैक्सी चलाते हैं। उनकी पत्नी तस्लीमा बीबी आज भी बच्चों के लिए दोपहर का खाना बनाने में मदद करती हैं।

gazi jalaluddin children are eating the food of the day.

गाजी बताते हैं कि

मेरी आदत है कि मैं दानदाताओं द्वारा भेजे गये पैसे का इस्तेमाल उसी काम के लिए करता हूं जिसके लिए वो मुझे देते हैं। जैसे जो दान किताबों के लिए मिलता है वो मैं किताबें खरीदने में करता हूं और जो खाने के लिए देता है वो खाने में और जो सैलरी के लिए देता है वो मैं सैलरी में ही खर्च करता हूं।

पैसे की तंगी के कारण गाजी अपने स्कूल की टीचरों को सैलरी भी बहुत कम देते हैं। जबकि ये शिक्षक आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आती हैं। इन 19 सालों में कई बार ऐसे मौके आये जब पैसे की कमी के कारण उन्हें लगा कि अब उन्हें ये स्कूल बंद करना पड़ेगा लेकिन तभी ऊपर वाले की कृपा से उन्हें दानदाताओं से पैसे मिल गये और वो स्कूल चल सका। गाजी पिछले 19 साल से स्कूल चला रहे हैं। जिसमें पढ़ चुके कई बच्चे बीए, एमए तक की पढ़ाई पूरी कर चुके हैं। कई लोग तो बाहर जाकर रोजगार भी पा चुके हैं। उनके स्कूल से पढ़ चुकी कुछ लड़कियां अब उसी स्कूल में टीचर का काम कर रही हैं। अपनी दिक्कतों में बारे में गाजी बताते हैं कि सुन्दरबन इलाके में डेढ़ हजार फीट की गहराई में पानी मिलता है। इस कारण यहां पर पीने के पानी की बहुत परेशानी है। इसके अलावा उनके स्कूलों की इमारत भी ज्यादा अच्छी नहीं है और वो खराब हालत में है। जबकि इस साल खोले गये स्कूल में तो उन्होने अब तक बाउंड्री भी नहीं बनवाई है। बावजूद तमाम परेशानियों को किनारे रख गाजी जलालुद्दीन​ (Gazi Jalaluddin) बच्चों को पढ़ाने के मिशन में लगे हुए हैं।

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