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युवा अतुल पासवान बने देश के पहले दलित IT करोड़पति

सफलता रातों रात नहीं मिला करती मंजिल तक पहुँचने के लिए संघर्षों के कई दौर से गुजरना पड़ता है। सफल होने का सपना तो हर कोई देखता है और चाहता है कि वो सपना जल्दी से पूरा भी हो जाए लेकिन सपनों को हक़ीक़त में बदलने के लिए रातों की नींद खोनी पड़ती है, काँटों भरे रास्तों पर चलना होता है क्योंकि बिना मेहनत और जज़्बे के सफलता के शिखर को छूना नामुमकिन है। सफलता होने के सपने को साकार करने के लिए की गई कुछ ऐसी ही मेहनत और जज्बे की कहानी है बिहार के सिवान जिले के रहने वाले अतुल पासवान की।

वैसे तो अतुल ने बचपन से ही सपना तो डॉक्टर बनने का देखा था लेकिन उनकी क़िस्मत में कुछ और ही लिखा था। हुआ कुछ यूँ की अतुल तो डॉक्टर बनना चाहते थे पर यह नहीं जानते थे कि डॉक्टरी सीखने के लिए चीर फाड़ भी करनी पड़ती है। इसलिए तो जब पहली बार अतुल ने लैब में साथी विद्यार्थियों को मेंढक की चीर फाड़ करते देखा तो ग़श खाकर गिर पड़े और बेहोश हो गये। इस घटना से अतुल  को समझ आ गया कि डॉक्टर बनना इतना आसान काम नहीं है तभी से ही अतुल ने डॉक्टर बनने का इरादा छोड़ दिया। लेकिन अपने मन में सफल बनने के जज़्बे को कम नहीं होने दिया और उनके उसी जज़्बे की बदौलत आज अतुल पासवान भारत में आई.टी कंपनी शुरू करने वाले पहले दलित युवा उधमियों में से एक है। अतुल ने केवल भारत ही नहीं टेक्नोलॉजी के देश माने जाने वाले जापान जैसे विकसित देश में सफलता के झंडे गाड़े हैं और साथ ही भारत की तकनीकी क्षमता का और भारतीय प्रतिभा का लोहा मनवाया है। अतुल की कहानी उन सभी के लिए प्रेरणा है जो जीवन में सफलता का स्वाद चखना चाहते है।

बिहार के छोटे से कस्बे से निकले एक दलित व्यक्ति का इस ऊँचाई तक पहुंचने के सफर में कई उतार–चढ़ाव आये। अतुल अपने अनुभवों को साझा करते हुए बताते है कि “दलित वर्ग का होने से उन्हें जापान में तो कोई नुकसान नहीं हुआ लेकिन एक बार अपने ही देश भारत की एक कंपनी ने उन्हें काम देने से मना कर दिया था। हालांकि अतुल इसे कोई बहुत बड़ा मुद्दा नहीं मानते हैं, क्योंकि  उनकी काबिलियत और क्षमताओं ने उन्हें सफल होने के कई अवसर दिए।“ अतुल ने जब डॉक्टर बनने के विचार को त्याग दिया तो इसी दौरान उनके एक दोस्त ने उन्हें बताया कि दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में फॉरेन लैंग्वेज में डिग्री कोर्स चलता है। इस कोर्स को यदि वे करते है तो विदेश जाने का अवसर मिल सकता है। अतुल को दोस्त का सुझाव अच्छा लगा और उन्होंने जापानी भाषा में ग्रेजुएशन के लिए प्रवेश परीक्षा दी और सफल भी रहे। लेकिन हमेशा से ही उनकी पढ़ाई का माध्यम हिंदी रहा था और अंग्रेजी के बारे में उन्हें अधिक जानकारी भी नहीं थी।

जापानी भाषा के कोर्स के दौरान उनके आगे सबसे बड़ी समस्या अंग्रेजी सीखना था क्योंकि जापानी भाषा के पाठ्यक्रम को समझने के लिए अंग्रेजी आना एक अनिवार्य आवश्यकता थी। पर कहते हैं ना जब कुछ करने का जुनून हो तो रास्ते अपने आप मिलने लगते है। अतुल ने जे.एन.यू में पढ़ते समय दक्षिण भारतीय विद्यार्थियों से अंग्रेज़ी सीखना शुरू किया और इसी प्रकार अंग्रेजी सीखते हुए जापानी भाषा की पढ़ाई पूरी की। साल1997 में जब अतुल का ग्रेजुएशन पूरा हुआ तो इसके साथ ही उन्हें यह एहसास होने लगा था कि केवल एक विदेशी भाषा के ज्ञान से प्रतिस्पर्धा के युग में उनका कैरियर आजीवन सुरक्षित नहीं रह सकता। इसलिए उन्होंने एम.बी.ए करने का निश्चय किया और पॉन्डिचेरी यूनिवर्सिटी में दाखिला ले लिया।

पॉण्डिचेरी में एम.बी.ए की पढ़ाई के दौरान ही उन्हें सॉफ्टवेयर की दुनिया को बहुत करीब से समझने का मौका मिला और साथ ही आई.टी इंडस्ट्री में कर्मचारियों को मिलने वाली मोटी तनख़्वाह ने भी अतुल को अपनी ओर आकर्षित किया। लेकिन इंजीनियरिंग की डिग्री के बिना आई.टी क्षेत्र में प्रवेश मिलना आसान नहीं था। पर अतुल के विदेशी भाषा के ज्ञान और एम.बी.ए की डिग्री ने इस कमी को भी पूरा कर दिया और उन्हें जापान की एक बहुत बड़ी आई.टी. कंपनी फुजित्सु में नौकरी मिल गई। जापान में नौकरी करते हुए अतुल ने अनुभव किया कि भारत की बड़ी–बड़ी आई.टी कंपनियाँ जापान में इसलिए बिज़नेस जमा पाई क्योंकि उन्हें जापानी भाषा बोलने वाले इंजीनियर्स नहीं मिल पा रहे थे। यही कारण है भारत का सॉफ्टवेयर उद्योग अधिकतर अमेरिका और यूरोप जैसे देशों में सक्रिय है इस क्षेत्र में अंग्रेजी भाषा का ज्ञान पर्याप्त है।

साथ ही अतुल ने अनुभव किया कि जापान का‘राष्ट्रवाद’ कुछ इस तरह का है कि वहां के लोग और वहां की ज्यादातर कम्पनियां विदेशी आयात में यकीन नहीं करती है। इस तरह जापान के बाज़ार को अच्छे से समझने के बाद अतुल ने तय किया कि वे जापान के बाज़ार की प्रतिस्पर्धा में टिकने वाली अपनी आई.टी कंपनी शुरू करेंगे। और इसी फैसले के साथ साल 2005 के अंत में उन्होंने अपनी कंपनी ‘ इंडो सकुरा’ की स्थापना की।‘इंडो सकुरा’ एक खूबसूरत जापानी फूल “सुकरा” की एक किस्म का नाम है। अतुल के लिए सबसे बड़ा प्लस पॉइंट था कि जापान में अतुल की प्रतिस्पर्धा में उस समय कोई नहीं था यही वज़ह रही कि उनका कारोबार चल निकला।

जापान में सफलता की सीढियां चढ़ते हुए अतुल ने साल2006 में भारत की आई.टी राजधानी बैंगलोर में अपना लोकल ऑफिस खोला। लेकिन यहाँ उनके लिए मुख्य समस्या थी जापानी भाषा के जानकार इंजीनियर्स का मिलना। अतुल ने इस समस्या का भी समाधान जल्दी ही खोज निकाला और अपने इंजीनियर्स को जापानी भाषा में पारंगत करने के लिए एक ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरू किया। इस प्रोग्राम के अंतर्गत उन्होंने एक जापानी कंपनी ओमरान के साथ टाई–अप किया। इसके तहत ओमरान कुछ चयनित इंजीनियर्स को जापानी भाषा की बेस्ट ट्रेनिंग देती थी और ट्रेन्ड इंजीनियर्स को दोनों कंपनियां आधे–आधे बाँट लिया करती थी। अब अतुल का काम भारत में आसान होने लगा था। लेकिन अतुल की सोच से परे मुश्किलें अगले ही मोड़ पर मानो ताक लगाकर बैठी थी।

साल 2008 अतुल के लिए एक बड़ी मुसीबत लेकर आया, एक कंपनी के लिए सॉफ्टवेयर बनाने में भाषा की विविधता के कारण इंडो सकुरा के इंजीनियर्स से बड़ी गलती हो गई। उनकी कम्पनी द्वारा बनाया गया सॉफ्टवेयर क्लाईंट की मांग के अनुरूप नहीं था और साथ ही क्लाईंट का काफी समय और पैसा उस सॉफ्टवेयर को बनवाने में व्यय हो चुका था। जो सॉफ्टवेयर बनकर तैयार हुआ उससे क्लाइंट को कोई फायदा नहीं था। इसलिए क्लाईंट ने अतुल को कोर्ट में घसीटने की धमकी दे दी। अतुल जानते थे कानून के पचड़े में फंसने पर हर्जाने की बहुत बड़ी रकम देनी पड़ सकती है और साथ ही कंपनी की छवि पर प्रश्नचिन्ह लग सकता है जो उनके लिये बिल्कुल सही नहीं था। फिर किसी तरह एक समझौता हुआ जिसके अंतर्गत अतुल को अपना प्रॉफ़िट छोडना पड़ा। उन्हें भारी नुकसान का सामना करना पड़ा और इतना बड़ा नुकसान अतुल के लिए किसी सदमें से कम नहीं था। उस समय अतुल के मन में कई नकारात्मक विचार भी आए लेकिन उनकी इच्छा शक्ति और मेहनत के जज़्बे ने उन्हें हावी नहीं होने दिया।

अतुल बताते हैं कि “उस समय मैने सोचा कि इस नुकसान से बेहतर तो मैं कोई और नौकरी कर लेता, कम से कम वेतन तो मिलता रहता। लेकिन मैंने इस निराशा को खुद पर
हावी नहीं होने दिया और सोचा कि यदि ऐसी ही गलती नौकरी में हुई होती तो नौकरी से हाथ धोना पड़ता जिसके बाद तो मेरा संघर्ष और अधिक कठिन हो जाता।” अतुल ने अपने आप को संभाला और दोबारा अपने काम में जी जान लगाकर जुट गए। अतुल की मेहनत रंग लाई और कंपनी को फिर खड़ा करने का फैसला सही साबित हुआ। साल 2011-12 में अतुल की कम्पनी का टर्नओवर 20 करोड़ रूपये तक पहुँच गया।

लेकिन अब भी संघर्षों का दौर रुकने का नाम नहीं ले रहा था। एक और मुसीबत ने जल्दी ही अतुल के दरवाज़े पर दस्तक दी जिसने उन्हें झकझोर कर रख दिया। साल 2011 में आई सुनामी ने पूरे जापान को हिला कर रख दिया और इससे उनकी कंपनी की टर्नओवर पर अच्छा-खासा प्रभाव पड़ा। उनकी कंपनी का सालाना टर्नओवर आधा हो चुका था।

आय सुचारू रूप से चलती रहे इसके लिए उन्होंने सॉफ्टवेयर कंपनी के भरोसे ही रहना मुनासिब नहीं समझा। इसी सोच के साथ उन्होंने हेल्थ केयर कंसल्टेंसी शुरू की। इसके तहत वे भारत में काम कर रहीं लगभग 1500 जापानी कंपनियों के तकरीबन 50 हजार जापानी कार्मिकों को हेल्थ सर्विस उपलब्ध करवाने का कार्य करने लगे। अब अतुल केवल एक फोन पर उन्हें मेडिकल सुविधा उपलब्ध करवाते हैं। और उनके व्यवसाय के कुल टर्नओवर का लगभग 10 फीसदी इसी हेल्थ केयर कंसल्टेंसी से आता है।

आज अतुल की इंडो सकुरा का सालाना टर्नओवर लगभग 15 करोड़ तक पहुँच गया है। और निरंतर प्रगति कर रहा है। अतुल पासवान ने यह सिद्ध कर दिया कि लाख मुसीबतें आने पर भी जो व्यक्ति अपने लक्ष्य तक पहुँचने के दृढ़ संकल्प को लेकर चलते हैं , उन्हें सफलता के शिखर पर जाने से कोई रोक नहीं सकता।

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