दिवाली पर पटाखे और प्रदूषण अब गैस चैंबर की चिंता

(मोहन भुलानी )

कुछ समय की अपनी खुशी के लिए दूसरों को परेशानी देना या वातावरण को नुकसान पहुंचाना उचित नहीं। इस दिवाली पर पटाखे कम से कम या बिल्कुल न चलाने की आवाजें उठ रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसके लिए एक समय-सीमा तय कर दी है। कोर्ट के इस फैसले पर सबके अपने-अपने विचार हैं। मगर यह हमें जरूर समझना चाहिए कि दिवाली पर भारी मात्रा में इस्तेमाल किए जाने वाले पटाखे वायु प्रदूषण ही नहीं फैलाते, बहुत ज्यादा ध्वनि प्रदूषण भी करते हैं। और यह प्रदूषण भी कुछ लोगों, खासतौर से रोगियों के लिए मुसीबत बनता है। ध्वनि प्रदूषण इंसान को शारीरिक और मानसिक विकार तो देता ही है, जीव-जंतुओं पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है। बेशक दिवाली पर एक या दो दिन पटाखे न चलाने से ही वायु प्रदूषण या ध्वनि प्रदूषण खत्म होने वाला नहीं है, मगर इन पर नियंत्रण करने के लिए हमें वे तमाम प्रयास करने ही होंगे, जो किए जाने जरूरी हैं।

दिल्ली को दिल वालों की दिल्ली कहा जाता है, लेकिन आज इसका रूप ही बदल दिया गया है। पूरी दिल्ली अब गैस चैंबर में बदल गई है। यह चिंता की बात है। यहां प्रदूषण का स्तर दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। दिल्ली के लोगों की सुबह धुंध की मोटी चादर से हो रही है। छोटे बच्चों और बुजुर्गों पर इसका कुछ ज्यादा नकारात्मक असर पड़ रहा है। आशंका है कि दिवाली में इसकी मात्रा और बढ़ जाएगी। वैसे तो पूरे वर्ष दिल्ली में प्रदूषण का स्तर ऊंचा रहता है, मगर दिवाली के आसपास यह कहीं अधिक खतरनाक हो जाता है। इसके लिए दोषी निश्चित रूप से हम भी हैं, क्योंकि हमने अपने पर्यावरण का इतना दोहन कर दिया है कि उसका दुष्प्रभाव आने वाली पीढ़ी पर पड़ना तय है।

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