फूलों की खेती से किसान बन रहे हैं लखपति

इन दिनों उन किसानों की जिंदगियां पैसे की खुशबुओं से महमहा उठी हैं, जो फूलों की खेती से प्रति एकड़ लाख-लाख रुपए तक की कमाई कर रहे हैं। वह कोंडागांव की रेखा बाई, पद्मिनी, लच्छिनी, श्यामवती हों या मिहीपुरवा के सोमवर्धन पांडेय, ब्रह्मपुर के रामचंद्र महतो या सुखडेहरा के मिथिलेश। स्टार्टअप के तौर पर भी आज के युवाओं के लिए आधुनिक पद्धति की खेती-किसानी करियर और नए जमाने के प्रोफेशन के लिए रोज़गार का बेहतर विकल्प बन चुकी है।

खेती के अलावा आज कृषि विज्ञान भी युवाओं के करियर का बड़ा सक्सेज बनकर सामने आ रहा है। कृषि प्रधान देश होने के बावजूद प्रायः लोग कृषि विज्ञान के महत्व से अनजान हैं। युवाओं में आज भी परंपरागत विषयों पर आधारित करियर और अन्य प्रोफेशनल विषयों पर आधारित रोज़गार विकल्पों का क्रेज़ ज्यादा है।

नए जमाने की खेती-बाड़ी के ढर्रे और सोच बदल चुकी है। कुछ लोग रात-दिन रोजगार के लिए दर-दर भटक रहे हैं लेकिन छत्तीसगढ के मैनपुर गांव की चार आदिवासी महिलाएं गेंदा फूल की खेती कर मालामाल हो रही हैं। उन चारो महिलाओं के नाम हैं, पद्मिनी, लच्छिनी, श्यामवती, रेखा। वह पांच एकड़ में गेंदे के फूल की खेती कर एक-एक एकड़ से अस्सी-अस्सी हजार रुपए की कमाई कर रही हैं। बताते हैं कि कुछ ही वर्ष पूर्व वे एक दिन अपने गांव के माता मंदिर के पुजारी जयमन से मिलीं तो उन्हें फूलों की खेती की सीख मिल गई।

मंदिर की प्रतिमाओं पर चढ़े गेंदे के सूखे फूल वे अपने घर उठा लाईं और उसकी खेती में जुट गईं। तभी से वह आसपास के अलावा अपने उगाए फूल दंतेवाड़ा, जगदलपुर, कांकेर तक बेंच रही हैं। उनकी देखादेखी गांव और आसपास के कई और लोग फूलों की खेती करने लगे हैं। उद्यानिकी विभाग ऐसे होनहारों को समय समय पर प्रशिक्षित भी करने लगा। इसी तरह के हैं बहराइच (उ.प्र.) जिले में गांव मिहीपुरवा के सोमवर्धन पांडेय। उन्होंने कुछ साल पहले अपने दो बीघे खेत में रजनीगंधा की खेती शुरू कर दी। फिर कदम पीछे खींच लिया। मन तो फूलो की खेती बसा था सो अचानक एक दिन ग्लैडियोलस की खेती में जुट गए। तीन बीघे से शुरुआत की थी, आज 28 बीघे में इसकी खेती कर रहे हैं।

इतना ही नहीं, अब वह लगभग पंद्रह बीघे में गेंदे की भी खेती करने लगे हैं। अब उनकी प्रति एकड़ लाख-सवालाख तक की कमाई हो रही है। इस कामयाबी के लिए उन्हें जिला उद्यान विभाग ने सम्मानित भी किया है। इसी गांव के जयवर्धन और हर्षवर्धन भी फूलों की खेती से जीभर कमाई कर रहे हैं। इनकी कामयाबी से उत्साहित होकर सिसई हैदर के पप्पू खां, जब्दी के रामअवतार, गजपतिपुर की प्रमिला, टेंडवा बसंतपुर के सौरभ चंद्र, चांदपारा के जनार्दन आदि भी बड़े पैमाने पर गेंदे की खेती करने लगे हैं तो गजपतिपुर के सनेही, बहादुर, टेंडवा बसंतपुर के सरदार पंजाब सिंह आदि अपने खेतों में ग्लैडियोलस की किसानी कर अपनी तकदीर खुद बदल रहे हैं।

उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ की तरह झारखंड के गांव ब्रह्मपुर में रामचंद्र महतो फूलों की खेती से खुशहाल हो रहे हैं। प्रदेश के गिद्धौर प्रखंड में मंझगांवा पंचायत क्षेत्र में आता है ब्रह्मपुर (झारखंड)। यहां के किसान रामचंद्र ने लगभग एक दशक पूर्व बागवानी का प्रशिक्षण लिया था। वह गुलाब, गुलमेंहदी, उड़हुल, गलेडियस, गेंदा फूल की खेती के साथ ही साथ साथ मछली पालन, गाय पालन, मधुमक्खी पालन भी कर रहे हैं। उनके फूल इटखोरी, हजारीबाग तक बिक रहे हैं। वह खुद कहते हैं कि अब उनकी अच्छी कमाई होने लगी है। गाजीपुर (उ.प्र.) के गांव सुखडेहरा के हैं मिथिलेश राय। घर के पंद्रह लोगों की जीविका सिर्फ चार एकड़ पारंपरिक खेती-बाड़ी से नहीं चल पा रही थी। वह सब्जी की खेती करने लगे। अब अपने खेत के अलावा 51 बीघे बटाई पर लेकर उसमें भी पिछले कुछ साल से गेंदे की खेती कर रहे हैं। अब पूरा परिवार फूलों की खेती से महमहा उठा है।

फ्लोरिकल्चर विभाग, जम्मू के फील्ड असिस्टेंट परमदीप सिंह कहते हैं कि किसान गेंदे के फूलों की खेती से एक साल में चार फसलें लेकर मोटा मुनाफा कमा सकते हैं। उन्नत बीजों वाले गेंदे बारहो मास खेती की जा सकती है। हाईब्रीड गेंदा जनवरी में लगाकर तीन माह के भीतर मार्च से इससे कमाई होने लगती है, जो सिलसिला जून तक चलता रहता है। उसके बाद जुलाई में बरसाती देसी गेंदे की खेती शुरू की जा सकती है। यह गेंदा दीपावली तक अच्छी कमाई देने लगता है। उसके तुरंत बाद जनवरी तक छोटे गेंदे, गुट्टी के फूल की खेती शुरू की जा सकती है।

खेती के अलावा आज कृषि विज्ञान भी युवाओं के करियर का बड़ा सक्सेज बनकर सामने आ रहा है। कृषि प्रधान देश होने के बावजूद प्रायः लोग कृषि विज्ञान के महत्व से अनजान हैं। युवाओं में आज भी परंपरागत विषयों पर आधारित करियर और अन्य प्रोफेशनल विषयों पर आधारित रोज़गार विकल्पों का क्रेज़ ज्यादा है। भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद् और देश के प्रत्येक राज्य में स्थित प्रादेशिक कृषि अनुसन्धान परिषदों में प्रति वर्ष कृषि वैज्ञानिक के तौर पर हजारों की संख्या में नियुक्तियां की जाती हैं। इनके वेतन की शुरुआत राजपत्रित अधिकारी के वेतनमान से होती है और यह पदोन्नतियों के ज़रिये काफी उच्च स्तर तक पहुँच जाता है।

इसके साथ ही आकर्षक सुविधाएँ और भत्ते भी मिलते हैं। इस कृषि क्षेत्र से जुड़े विषय हैं – कृषि विज्ञान, पशु चिकित्सा विज्ञान एवं पशुपालन, बागवानी विज्ञान, सब्जी विज्ञान, फसल कीट विज्ञान, कृषि इंजीनियरिंग, डेयरी टेक्नोलोजी, सिल्क टेक्नोलोजी, कम्युनिटी साइंस, फिशरीज, एग्रो मार्केटिंग, बैंकिंग एंड को ऑपरेशन, फ़ूड टेक्नोलोजी, बायोटेक्नोलोजी आदि। इन सबका रोज़गार की दृष्टि से अपना विशिष्ट महत्व है। देश भर में केंद्र सरकार और राज्य सरकारों द्वारा संचालित सैकड़ों कृषि विश्वविद्यालयों का जाल बिछा हुआ है और इनसे हजारों कृषि कॉलेज जुड़े हुए हैं।

इनके द्वारा संचालित कृषि पाठ्यक्रमों में बड़ी संख्या में सीटें उपलब्ध हैं जिनमें चयन परीक्षा के आधार पर दाखिले दिए जाते हैं। ऐसे पोस्ट ग्रेजुएट डिग्रीधारक, नेट परीक्षा उत्तीर्ण युवाओं को कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि महाविद्यालयों में भी बतौर असिस्टेंट प्रोफ़ेसर जॉब के अवसर मिल रहे हैं। एग्रो नर्सरी ,फलोत्पादन,चाय-कॉफ़ी-मसाला उत्पादक कम्पनियाँ,बीज तैयार करने वाली कम्पनियाँ भी ऐसे युवाओं को रोजगार दे रही हैं।

कार्यक्षेत्र के तौर पर खेती-बाड़ी के साथ कई एक विपरीत स्थितियां भी जुड़ी हैं, जिन्हें जान-समझ लेना उपयोगी रहेगा ताकि इसके लिए कदम बढ़ाते समय उल्लिखित बातें गौरतलब होनी चाहिए। कृषि प्रसंस्करण और पैकेटबंद खाद्य उत्पाद तैयार करने के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आने से खेती बाड़ी और कृषि मार्केटिंग में बहुत से बदलाव हो रहे हैं। इन्हीं में से एक है कांट्रेक्ट फार्मिंग। इसमें फसल की बुआई के समय ही कम्पनियां किसानों से अनुबंध कर लेती हैं कि किस दर पर उनकी उपज को खरीदा जाएगा। इसके लिए किसानों को कंपनियों द्वारा नियुक्त कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों के अनुसार समस्त खेती के कार्यकलाप करने की शर्तों का पालन करना होता है।

आने वाले समय में देश में इस तरह की कांट्रेक्ट फार्मिंग के तेज़ी से बढ़ने की संभावना है। सरकारी तौर पर भी इससे सम्बंधित नियम तैयार किये जा रहे हैं लेकिन एनुअल स्टेटस एजुकेशन रिपोर्ट (एएसईआर) की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि ग्रामीण 1.2 फीसदी युवा ही किसान बनना चाह रहे हैं। यह सर्वेक्षण देश के अट्ठाईस प्रदेशों में लगभग तीस हजार युवाओं पर केंद्रित किया था। निष्कर्ष में बताया गया है कि 14 से 18 साल के करीब 42 प्रतिशत छात्र पढ़ाई के साथ छोटे-मोटे काम भी करते हैं। इनमें से 79 प्रतिशत छात्र खेती के कामों में हाथ बंटाते हैं लेकिन कुल सिर्फ 1.2 प्रतिशत छात्र ही किसान बनना चाहते हैं।

उनका मानना है कि खेती में कुछ बचता नहीं है, चाहे जितना पैसा लगा दिया जाए। नेशनल सैंपल सर्वे (राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण) की रिपोर्ट के मुताबिक हमारे देश में एक किसान औसतन छह हजार रुपए प्रतिमाह की कमाई कर पाता है। खेती से उसे लगभग 3078 रुपए, मवेशियों से 765 रुपए, मजदूरी से 2069 रुपए और अन्य स्रोतों से 514 रुपए तक की कमाई हो पाती है। जबकि पचास-साठ हजार रुपए लगाकर एक ठेले वाला रोजाना तीन-चार सौ रुपए कमा लेता है, यहां तक कि रिक्शा चलाने वाले की भी दस-बारह हजार तक की मासिक कमाई हो जाती है। यदि इन्हीं स्थितियों के बीच से निकल कर, मामूली समझदारी लगाकर उन्नत खेती करने वाले अनेक किसानों के बैंक खाते उनके घर-परिवार खुशहाल किए हुए हैं।

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