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उत्तराखंड में फर्जी पौधरोपण के सरकारी कारनामे

देहरादून, [केदार दत्त]: हर साल डेढ़ से दो करोड़ पौधों का रोपण। गुजरे 16 साल से यह सिलसिला चल रहा है। बावजूद इसके फॉरेस्ट कवर (वनावरण) 46 फीसद से आगे नहीं बढ़ पाया है। यह है 71 फीसद वन भूभाग वाले उत्तराखंड का सूरतेहाल। जिस हिसाब से राज्यभर में वर्षाकाल में पौधरोपण हो रहा है, उसमें से 50 फीसद भी जीवित नहीं रह पा रहे। साफ है कि सिस्टम की नीति और नीयत में कहीं न कहीं खोट है। यदि ऐसा नहीं होता तो कागजों की जगह धरातल में जंगल खूब पनपे होते।

जाहिर है कि इस सबका असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था के साथ ही यहां पर्यावरण पर भी पड़ रहा है। विशेषज्ञों की मानें तो शासन व वन महकमे को ठोस कार्ययोजना तैयार कर स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप पौधों का रोपण करना चाहिए। साथ ही कम से कम 10 साल तक इनकी देखभाल सुनिश्चित करनी होगी। तब जाकर ही कुछ सकारात्मक नतीजे सामने आ पाएंगे। राज्य में गुजरे तीन सालों के आंकड़े ही देखें तो हर साल औसतन 1.83 करोड़ पौधों का रोपण किया गया। इनमें से कितने जीवित हैं, इसका महकमे के पास कोई जवाब नहीं है।

यह स्थिति तब है, जबकि वन क्षेत्रों में रोपित पौधों की तीन साल तक देखभाल का प्रावधान है। बावजूद इसके न तो महकमा खुद पौधों को बचा पा रहा और न ग्रामीणों को इसके लिए प्रेरित कर पा रहा। हर साल, बस किसी तरह लक्ष्य पूरा करने और बजट को खपाने की होड़ सी नजर आती है। अब पौधों के जिंदा न रह पाने के पीछे विभाग के तर्कों पर भी नजर डालते हैं। अफसरों के मुताबिक वन्यजीवों के साथ ही भूक्षरण, जंगल की आग, अवैध कटान जैसे कारणों से 30 से 40 फीसद पौधे जिंदा नहीं रह पाते। जानकारों की मानें तो यहां ये आंकड़ा 50 से 60 फीसद तक है और कहीं-कहीं तो 70 फीसद तक। ऐसे में विभाग की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगना लाजिमी है।

यह है कमजोर कड़ी

दरअसल, पौधरोपण के कार्यक्रम में सबसे बड़ी खामी है नियोजन की। विषम भूगोल वाले उत्तराखंड में शायद ही कभी स्थानीय जलवायु के अनुरूप पौधरोपण के लिए प्रजातियों का चयन होता हो। यह पौधों के न पनप पाने का सबसे बड़ा कारण है। पर्यावरणविद् एवं पाणी राखो आंदोलन के प्रणेता सच्चिदानंद भारती कहते हैं कि इसके लिए शासन और विभाग में बैठे लोगों को नियोजन का ढर्रा बदलने की जरूरत है।  वह कहते हैं कि मौजूदा स्थिति में पौधरोपण को तो हम उद्वेलित दिखते हैं, मगर किस तरह के पेड़ लगा रहे हैं, इसकी ठीक से प्लानिंग अथवा तैयारी कभी नहीं होती। एक रोपित पौधे की तब तक उचित देखभाल होनी चाहिए, जब तक कि वह 10 साल की आयु पूरी न कर ले। कहने का आशय से वन समूह से जुड़े प्रत्येक अंग को मजबूत करना होगा, तब जाकर ही पौधरोपण सफल हो सकता है।

ये हैं तथ्य

-53683 वर्ग किमी है उत्तराखंड का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल।

-37999.6 वर्ग किलोमीटर है वनों का क्षेत्रफल।

-2.35 लाख घन मीटर प्रतिवर्ष औसतन प्रकाष्ठ का उत्पादन।

-10 हजार हेक्टेयर वन भूमि है अतिक्रमण की जद में।

-1619 मामले औसतन हर साल आते पकड़ में।

-106.96 लाख पौधे इस साल लगाने का रखा गया है लक्ष्य।

: हर साल डेढ़ से दो करोड़ पौधों का रोपण। गुजरे 16 साल से यह सिलसिला चल रहा है। बावजूद इसके फॉरेस्ट कवर (वनावरण) 46 फीसद से आगे नहीं बढ़ पाया है। यह है 71 फीसद वन भूभाग वाले उत्तराखंड का सूरतेहाल। जिस हिसाब से राज्यभर में वर्षाकाल में पौधरोपण हो रहा है, उसमें से 50 फीसद भी जीवित नहीं रह पा रहे। साफ है कि सिस्टम की नीति और नीयत में कहीं न कहीं खोट है। यदि ऐसा नहीं होता तो कागजों की जगह धरातल में जंगल खूब पनपे होते।

जाहिर है कि इस सबका असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था के साथ ही यहां पर्यावरण पर भी पड़ रहा है। विशेषज्ञों की मानें तो शासन व वन महकमे को ठोस कार्ययोजना तैयार कर स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप पौधों का रोपण करना चाहिए। साथ ही कम से कम 10 साल तक इनकी देखभाल सुनिश्चित करनी होगी। तब जाकर ही कुछ सकारात्मक नतीजे सामने आ पाएंगे। राज्य में गुजरे तीन सालों के आंकड़े ही देखें तो हर साल औसतन 1.83 करोड़ पौधों का रोपण किया गया। इनमें से कितने जीवित हैं, इसका महकमे के पास कोई जवाब नहीं है।

यह स्थिति तब है, जबकि वन क्षेत्रों में रोपित पौधों की तीन साल तक देखभाल का प्रावधान है। बावजूद इसके न तो महकमा खुद पौधों को बचा पा रहा और न ग्रामीणों को इसके लिए प्रेरित कर पा रहा। हर साल, बस किसी तरह लक्ष्य पूरा करने और बजट को खपाने की होड़ सी नजर आती है। अब पौधों के जिंदा न रह पाने के पीछे विभाग के तर्कों पर भी नजर डालते हैं। अफसरों के मुताबिक वन्यजीवों के साथ ही भूक्षरण, जंगल की आग, अवैध कटान जैसे कारणों से 30 से 40 फीसद पौधे जिंदा नहीं रह पाते। जानकारों की मानें तो यहां ये आंकड़ा 50 से 60 फीसद तक है और कहीं-कहीं तो 70 फीसद तक। ऐसे में विभाग की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगना लाजिमी है।

यह है कमजोर कड़ी

दरअसल, पौधरोपण के कार्यक्रम में सबसे बड़ी खामी है नियोजन की। विषम भूगोल वाले उत्तराखंड में शायद ही कभी स्थानीय जलवायु के अनुरूप पौधरोपण के लिए प्रजातियों का चयन होता हो। यह पौधों के न पनप पाने का सबसे बड़ा कारण है। पर्यावरणविद् एवं पाणी राखो आंदोलन के प्रणेता सच्चिदानंद भारती कहते हैं कि इसके लिए शासन और विभाग में बैठे लोगों को नियोजन का ढर्रा बदलने की जरूरत है। वह कहते हैं कि मौजूदा स्थिति में पौधरोपण को तो हम उद्वेलित दिखते हैं, मगर किस तरह के पेड़ लगा रहे हैं, इसकी ठीक से प्लानिंग अथवा तैयारी कभी नहीं होती। एक रोपित पौधे की तब तक उचित देखभाल होनी चाहिए, जब तक कि वह 10 साल की आयु पूरी न कर ले। कहने का आशय से वन समूह से जुड़े प्रत्येक अंग को मजबूत करना होगा, तब जाकर ही पौधरोपण सफल हो सकता है।

ये हैं तथ्य

-53683 वर्ग किमी है उत्तराखंड का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल।

-37999.6 वर्ग किलोमीटर है वनों का क्षेत्रफल।

-2.35 लाख घन मीटर प्रतिवर्ष औसतन प्रकाष्ठ का उत्पादन।

-10 हजार हेक्टेयर वन भूमि है अतिक्रमण की जद में।

-1619 मामले औसतन हर साल आते पकड़ में।

-106.96 लाख पौधे इस साल लगाने का रखा गया है लक्ष्य।

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