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खात्मे की ओर मायावती की दलित राजनीति

(मोहन भुलानी, न्यूज़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया )

बसपा सुप्रीमों और उत्तर प्रदेश में चार बार मुख्यमंत्री रही मायावती को राज्यसभा में न बोलने दिया जाना लोकतंत्र की हत्या करने जैसा है। देश में बीजेपी सरकार एक तरफ तो समतामूलक समाज की स्थापना की बात करती है वहीं दूसरी तरफ वह उसी वर्ग से आए नेताओं को बोलने की अनुमति नहीं देती है। यह देश के इतिहास में पहली घटना है जिसमें किसी सांसद ने चेतावनी देकर इस्तीफ़ा दिया है। क्या राज्यसभा से मायावती का इस्तीफ़ा देना महज़ एक दिखावा है या फिर उनके द्वारा अपनी खोई हुई राजनीतिक पृष्ठभूमि को पाने की ओर पहला कदम? राष्ट्रपति चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस द्वारा दलितों को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाना इस बात का संकेत है कि यह पार्टियां अपने आप को ‘दलित हितैषी’ साबित करना चाहती हैं, जो बीएसपी का कोर वोट बैंक माना जाता है।

बीएसपी के लिए अपने पुराने जनाधार को वापस पाना आसान नही होगा, खासकर तब जब उसका दलित वोट बैंक भी दूसरी पार्टियों की तरफ झुक चुका है। 2017 के यू.पी. चुनाव में 22.2% वोट के साथ बीएसपी महज़ 19 सीटें ही जीत पाई और उसके राज्यसभा में भी केवल 6 सांसद ही हैं। बीएसपी जब पहली बार 1996 में सत्ता में आई थी तब वह ठीक से ना तो सत्ता सुख भोग पाई और ना ही विपक्ष में रह पाई थी। बावजूद इसके 2007 में बीएसपी ने पूर्ण बहुमत से सत्ता में आकर पूरे देश को चौंका दिया था, इसके बाद 2012 के चुनावों में उसको 289 सीटें गंवानी पड़ी वहीं 2017 में मोदी लहर के कारण पूरे उत्तर प्रदेश में महज 19 सीट्स पर ही सिमटकर रह गई। 2014 के लोकसभा चुनावों की करारी हार के बाद बीएसपी आज भी शायद देश की राजनीति को समझने में असमर्थ रही है।

जिस तरह से बीजेपी ने हिंदुत्व के नारे के साथ अपनी देशव्यापी पकड़ बनाई, खासकर कि हिंदी बेल्ट के प्रदेशों में और उसने पूरा ध्यान 23 फीसदी दलित वोट बैंक पर लगाया, जो बीएसपी का मूल जनाधार है। बीजेपी और आरआरएस ने जिस तरह से अम्बेडकर की विचारधारा को ‘अपनाने’ का काम किया, उसने कहीं न कहीं दलितों के लिए एक विकल्प तैयार किया। इसमें बीएसपी कहीं न कहीं चूक गयी। राष्ट्रपति चुनाव के लिए बीजेपी द्वारा दलित नेता रामनाथ कोविंद को उम्मीदवार बनाना यही कहने की कोशिश है कि वह दलितों की सबसे बड़ी हितैषी राजनीतिक पार्टी है। कांग्रेस ने भी दलित कार्ड के रूप में बाबू जगजीवन राम की पुत्री मीरा कुमार को मैदान में उतारा है। दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियों ने बीएसपी के दलित जनाधार को हथियाने की कोशिश की है।

बीएसपी के सामने दूसरी सबसे बड़ी चुनौती दलित युवा नेताओं का उभरना है, जिनमें जिग्नेश मेवानी और चंद्रशेखर प्रमुख हैं। ऊना दलित संघर्ष समिति के संयोजक जिग्नेश मेवानी गुजरात में हुए ऊना कांड से उभरकर सामने आए। भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर द्वारा सहारनपुर जातीय हिंसा के खिलाफ जंतर-मंतर में प्रदर्शन किया गया था, जिससे उनके प्रति दलित युवाओं में एक नयी उम्मीद की किरण दिखी है। इन दोनों ने ही, दलितों खासकर कि दलित युवाओं को मजबूती से प्रभावित किया है, जो उन्हें “जातीय गर्व” के साथ जोड़ते हैं, जैसा कि आज बीजेपी अन्य हिन्दू जातियों के साथ कर रही है। इससे बीएसपी के नेताओं के सामने एक नई समस्या खड़ी हो गई है, जो आने वाले समय में एक नई  चुनौती साबित हो सकती है।

दलित चिंतक कंवल भारती कहते हैं कि विगत 10 सालों से बीएसपी का दलित जनाधार घटता जा रहा है, गैर-जाटव जातियां दूसरी पार्टियों जैसे बीजेपी और कांग्रेस से जुड़ चुकी हैं। वो कहते हैं कि कांशीराम के समय बीएसपी देश में आन्दोलन के रूप में स्थापित हई, लेकिन आज यही पार्टी अपने उसी मूलजनाधार से नाता तोड़ चुकी है और अमीरों की पार्टी बन चुकी है। मायावती ने अपने आपको दिल्ली या कार्यालय तक ही सीमित कर लिया है और पार्टी में अभी तक कोई दूसरा चर्चित चेहरा नहीं है जो दलितों को प्रभावित कर सके, यह भी एक कारण है।

शुरुआत में बीएसपी एक कैडर पार्टी थी, जो अपने सदस्यों से बनी थी और आज उनमे नीरसता का भाव है। दलित और बीएसपी का जो सम्बन्ध था, वह आज कमज़ोर पड़ चुका है। इसके कई कारण हैं, बीएसपी की आतंरिक कार्यशैली भी इसके लिए ज़िम्मेदार है जिसके कारण पार्टी कार्यकर्ता का रिश्ता अब वोटर में बदल चुका है। इससे कार्यकर्ताओं में भी हीनभावना साफतौर पर देखी जा सकती है, यही कारण है कि अब उनमें पार्टी सेवाभाव की भावना कम हो गई है।

आज बीएसपी के मुकाबले उससे कहीं ज़्यादा युवा और उर्जावान दलित लीडरशिप खड़ी है जो आगे आकर उस युवा को आकर्षित कर रही है, जो आज के वैश्विक दौर में पहले से कहीं ज्यादा प्रगतिशील तथा महत्वाकांक्षी है।

वो आर्थिक रूप से मजबूत तथा नए विचारों वाला है, जो कहीं न कहीं मोदी स्टाइल से प्रभावित है। वह सोशल मीडिया में सक्रिय रूप से उपस्थिति दर्ज कराता है, वो राजनीतिक कैम्पेन का हिस्सा है। बीएसपी को अब अपनी पुरानी “कास्ट पॉलिटिक्स” से बाहर आकर नए चुनावी तरीकों को भी अपनाना होगा, जिससे वह इस युवा वर्ग को आकर्षित कर सके। कहीं न कहीं बीते सालों में बीएसपी नेताओं के स्कैंडल, भ्रष्टाचार, अथॉरिटी का सेंट्रलाइजेशन, विचारधारा में कमी और बड़े नेताओं के पार्टी छोड़कर जाने से भी पार्टी की साख को नुकसान पंहुचा है।

बीएसपी का राजनीतिक भविष्य आने वाले कुछ महीनों में मायावती द्वारा लिए जाने वाले फैसलों पर निर्भर करेगा। क्या वह विपक्ष के साथ महागठबंधन में शामिल होंगी और उनके सहयोग से (राजद–बिहार) राज्यसभा में पुनः वापसी करेगी? क्या इस वर्ष उत्तर प्रदेश में होने वाले लोकसभा उपचुनाओं में वह गोरखपुर सीट (आदित्यनाथ से रिक्त) या फूलपुर सीट (केशव प्रसाद मौर्या से रिक्त) से चुनाव लड़ेंगी और बीजेपी के बड़े नेताओं के सामने मैदान में जाएंगी? क्या वो कांशीराम का रास्ता अपनाकर इन चुनावों में युवा और वैचारिक रूप से मज़बूत नेताओं को मैदान में उतारेंगी?

क्या वो स्वयं पूरे प्रदेश में यात्रा करके, दलित बस्तियों में जाकर उनकी समस्याओं को सुनेंगी? देखने वाली बात ये भी होगी कि क्या मायावती अपनी खोई हुई वैचारिक शक्ति को वापस पाकर युवा नेताओं के लिए ज़मीन तैयार करेंगी, जो आने वाले समय में पार्टी विरासत को आगे बढ़ा सकेंगे।

80 और 90 के दशक में कांशीराम ने दलित राजनीती में जो किया था, क्या आज मायावाती वैसा ही कर पाएंगी? मायावती के सामने प्रत्यक्ष और स्पष्ट चुनौती है– उन्हें समाज के हित के लिए अपना व्यक्तिगत हित छोड़ना ही पड़ेगा!

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