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केले के तने से बिजली बनाने वाला गरीब लड़का

11वीं क्लास में जिस छात्र को कई स्कूलों ने सिर्फ इसलिए दाखिला देने से इनकार कर दिया था क्योंकि उसका रूझान पढ़ाई की जगह रिसर्च पर था, आज उसी छात्र की गई रिसर्च को हासिल करने के लिए कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियों में घमासान छिड़ा हुआ है। उसके पिता छोटे से किसान हैं जो केले की फसल उगाते हैं, लेकिन उस छात्र को ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जैसी नामी गिरामी संस्थान अपने यहां रिसर्च के लिए बुलाना चाहते हैं। 17 साल के इस नौजवान ने केले के तनों से बिजली  बनाने की खोज की है। खास बात ये है कि बिहार के भागलपुर  का रहने वाले इस नौजवान को अपनी इस खोज के लिए पेटेंट भी मिल गया है। 12वीं में 75 प्रतिशत अंक हासिल करने वाला ये छात्र फिलहाल अहमदाबाद के नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन में अपनी की गई खोजों के ऊपर रिसर्च कर रहा है। गोपालजी नाम का ये लड़का पिछले 5 सालों के दौरान कई नई नई खोज कर चुका है, जिनके पेटेंट के लिए उसने आवेदन किया हुआ है।

गोपालजी  को ये नाम उसके पिता प्रेम रंजन कुमार ने दिया था। गोपालजी से अक्सर उसके टीचर कहा करते थे कि क्या उनको नाम के साथ जी भी लगाना होगा? तो गोपालजी नाम का ये छात्र अक्सर शरमा जाता था, लेकिन आज उसी छात्र ने अपने नाम के मुताबिक वो काम कर दिखाया है जिसका वो हकदार है। गोपालजी आज केंद्र सरकार की मदद से ‘नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन’ में अपनी की गई खोजों पर रिसर्च कर रहा है। बचपन से ही गोपालजी का रूझान नई-नई खोजों की ओर रहता था। किसान परिवार का बेटा गोपालजी अब तक 7 अलग-अलग तरह की खोज कर चुका है। इनमें सबसे बड़ी खोज है केले के तने से बिजली  पैदा करने का तरीका। इसके लिए गोपालजी ने पेटेंट भी हासिल कर लिया है। इसके अलावा उन्होने अलॉय वाटर एनर्जी और ब्लूटूथ कंट्रोलर भी ईजाद किया है। जबकि तीन दूसरी चीजों पर उनकी रिसर्च चल रही है। जिनका वो अगले साल 24 मई को दिल्ली के प्रगति मैदान में प्रदर्शन करेंगे। केले के तने का बेहतर इस्तेमाल कैसे किया जाए इसका आइडिया उनको 2008 में आया जब वो केवल 8 साल के थे। उस समय भागलपुर जिले में आई बाढ़ के कारण केले की फसल खराब हो गई थी। गोपालजी ने ‘News Trust of India को बताया कि

उन दिनों मैं भी अपने पिता के साथ केले के खेतों में जाया करता था। हमारी आजीविका भी उसी से चलती थी। पूरी तरह से बर्बाद खेतों के देखकर मैंने फैसला किया कि एक दिन इस वेस्ट से मैं कुछ ना कुछ जरूर बनाऊंगा।

इसके बाद जब वो 8वीं क्लास में पहुंचे तो एक दिन अपने पिता के साथ केले के खेतों में गये। जहां पर केले के तने का रस उनके शरीर पर लग गया। काफी कोशिश के बाद भी जब वो नहीं छूटा तो उन्होने केले के रस से फाइबर बनाने के बारे में सोचना शुरू किया। जब वो 9वीं क्लास में थे तो  एक दिन स्कूल की साइंस लैब में प्रैक्टिकल के दौरान उनके एक दोस्त के ऊपर एसिड गिर गया जो काफी कोशिश करने पर भी नहीं छूट रहा था। गोपालजी ने कहीं पढ़ा था कि एसिड को इलेक्ट्रोलाइसिस करने से वो चार्ज हो जाता है। गोपालजी के मुताबिक

यहीं से उनको आइडिया आया कि अगर मैं यहीं प्रकिया केले के तने के साथ करूं तो शायद मुझे चार्ज मिल जाये। मैं बाजार गया और वहां से दो इलेक्ट्रोलाइसिस और एक मल्टी मीटर खरीद कर लाया जिनकी कीमत 50रुपये थी। करीब 2 साल की मेहनत के बाद 2015 में मैंने केले के तने से बिजली पैदा कर दी।

जिसके बाद गोपालजी ने इसी तरह से बिजली बनाकर अपनी 11वीं और 12वीं की पढ़ाई पूरी की। गोपालजी के इसी पेटेंट को हासिल करने के लिए अमेरिका और चीन की कई नामी कंपनियों ने उनको मुंह मांगी रकम देने को तैयार थी, लेकिन राष्ट्रभक्त गोपालजी इसके लिए तैयार नहीं हुए। गोपालजी अपनी इस खोज के बाद यही नहीं रुके उन्होने पेपर बायोसेल से बिजली बनाने का तरीका निकाला। इस प्रक्रिया में वो पेपर को पानी में डालते हैं और उसमें ग्लूकोज डालकर उसका इलेक्ट्रोलाइसिस करके उससे बिजली तैयार करते हैं। पेपर बायोसेल से बिजली बनाने के लिए उन्होंने पेटेंट का आवेदन दिया हुआ है। इसके अलावा उन्होने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जिसके इस्तेमाल से इंसान 4 हजार डिग्री का तापमान भी आसानी से सहन कर सकता है और उसके शरीर को जरा भी खरोंच नहीं आती। इसका सबसे ज्यादा फायदा अग्निशमन कर्मचारी (Fire Fighter) को आग बुझाने में मिलेगा। आज गोपालजी को भले ही एक पहचान और सरकार से मदद मिल रही हो, लेकिन यहां तक पहुंचना उनके लिए किसी सपने से कम नहीं है। रिसर्च के प्रति उनके जूनुन को देखकर उनके टीचर, रिश्तेदार और गांव वाले उनका मजाक उड़ाते थे। वो कहते कि क्यों इन चीजों पर पैसा खर्च कर रहे हो, पढ़ाई करो तभी कोई नौकरी मिलेगी। गोपालजी बताते हैं कि

पैसे की तंगी के बावजूद मेरे पिता प्रेम रंजन कुमार और मेरे ट्यूशन टीचर चंदन कुमार ठाकुर ने मेरी हर संभव मदद दी। आज मैं जो कुछ हूं अपने परिवार और ट्यूशन टीचर की वजह से हूं। बचपन से हम बच्चे को मशीन की तरह बनाते हैं। उसे कुछ सोचने की आजादी नहीं देते। हमारे आस-पास का माहौल भी ऐसा होता है जो हमें नौकरी करने और पैसा कमाने के अलावा दूसरी चीजों को सोचने नहीं देता।

गोपालजी  अपनी रिसर्च के लिए पढ़ाई के साथ-साथ इंटरनेट पर विज्ञान से जुड़े वीडियो देखते थे। इसके अलावा डिस्कवरी चैनल और हॉलीवुड फिल्में देखना उनका खूब पसंद है। हर नई खोज से पहले गोपालजी भी कई बार फेल भी हुए लेकिन वो निराश होने की बजाय दोगुने उत्साह से उस काम में डूब जाते थे। एक बार दिल्ली  में उनको अपने बनाये बायोसेल का प्रदर्शन करना था। इसके लिए उन्होने खूब तैयारी भी की थी, लेकिन दिल्ली जाने से एक दिन पहले ही बायोसेल के इस प्रोजेक्ट ने काम करना बंद कर दिया था। ये देख उनके पिता भी काफी परेशान हुए, लेकिन गोपालजी  ने हिम्मत नहीं हारी और सारी रात वो उस गलती को सुधारने में लग गए और सुबह होने तक वो बैटरी को चार्ज करने में कामयाब हो गये। गोपालजी का मानना है कि आज तक सिर्फ वो ही देश तरक्की कर पाये हैं जिनके यहां पर नये-नये अविष्कार हुए हैं। हर नई खोज अपने साथ रोजगार भी लेकर आती है। यही कारण है कि जिस देश ने अपनी आने वाली  पीढ़ी को पूरी आजादी दी वो आज तरक्की कर गये हैं। गोपालजी  अपने साथी युवाओं से कहते हैं कि अपनी पढ़ाई के साथ साथ हफ्ते में एक दिन प्रकृति के बारे में भी सोचे और अपनी उस सोच पर रिसर्च करें। कोई भी इंसान मरने से कुछ समय पहले भी अविष्कारक बन सकता है, इसके लिए कोई उम्र नहीं होती है।

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