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स्लम के हजारों बच्चों का स्कूल ‘उमंग फाउंडेशन’

पढ़ेगा इंडिया, तभी तो बढ़ेगा इंडिया। ये सोच है उस शख्स की जो करीब 9 साल पहले ग्वालियर से मुंबई (Mumbai) इस इरादे के साथ आया था कि अच्छी नौकरी कर वो अपनी ज़िदगी में किसी भी चीज की कमी नहीं होने देगा। इसके लिये उसने बड़े-बड़े सपने देखे। उसके ये सपने आज भी वैसे ही हैं लेकिन उन सपनों की कीमत पर वो अब तक करीब 30 हजार बच्चों के पढ़ने की हसरत पूरी कर चुका है। ‘उमंग फाउंडेशन’ (Umang Foundation) के संस्थापक आशीष गोयल (Ashish Goyal) अपने इस संगठन के जरिये मुंबई (Mumbai) और उसके आसपास स्लम इलाकों (slum areas) में रहने वाले गरीब बच्चों की पढ़ाई का बोझ उठाते हैं, ऐसे बच्चों का स्कूलों में दाखिला कराते हैं जो पढ़ाई की जगह काम धंधे में अपने माता पिता का हाथ बंटाते हैं। इतना ही नहीं बच्चे ठीक से पढ़ाई कर सकें इसके लिये उनका ये फाउंडेशन बच्चों को एक खास तरह की किट देता है। जिसमें कापी किताब के अलावा स्टेशनरी का दूसरा समान भी होता है।

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34 साल के आईटी प्रोफेशनल आशीष गोयल (Ashish Goyal) 2006 में ग्वालियर से मुंबई आये। नौकरी के दौरान वो हर सप्ताह के अंत में अपना कुछ वक्त सामाजिक कामों को देने लगे। इस दौरान उनको गरीब और स्लम में रहने वाले लोगों की दिक्कतों को करीब से समझने का मौका मिला। उन्होने महसूस किया कि स्लम में रहने वाले इन लोगों की जरूरतें काफी कम होती हैं लेकिन जागरूकता की कमी के कारण वो उनको पूरा नहीं कर पाते। यही नहीं स्लम में रहने वाले ज्यादातर लोग अपने बच्चों को स्कूल तक नहीं भेजते थे और जो बच्चे स्कूल जाते भी थे तो वो थोड़े ही वक्त में स्कूल छोड़ देते थे। जब आशीष ने इसका कारण जानना चाहा तो उनको पता चला कि स्लम में रहने वाले कई बच्चों के पास कॉपी किताबें और पढ़ाई का दूसरा सामान नहीं होता था। इस वजह से ये बच्चे स्कूल जाने से कतराते थे। यही वजह थी कि जब इन बच्चों से पूछा जाता कि वो क्या बनना चाहते हैं तो वो वही जवाब देते थे जो वो अपने आसपास देखते थे। इन बच्चों के सपने अपनी बस्ती तक सिमट कर रह गये थे। तब आशीष ने इन बच्चों और स्लम बस्तियों की दूसरी समस्याओं को दूर करने के लिये 2008 में ‘उमंग फाउंडेशन’ (Umang Foundation) नाम से एक संगठन की स्थापना की। संगठन का उद्देश्य बच्चों को प्रोत्साहित कर उनको भविष्य के लिए तैयार करना है। इसके लिए ये संगठन बच्चों की बेसिक जरूरतों को पूरा कर उनको आगे बढ़ने में मदद करता है। जिससे ये बच्चे शिक्षा और उद्योग के क्षेत्र में आगे बढ़ सके।

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ये बच्चे स्कूल ना छोड़े इसके लिए ‘उमंग फाउंडेशन’ (Umang Foundation) अकादमिक ईयर​ शुरू होते ही स्टेशनरी का सारा सामान इनको दे देती है। संगठन की ओर से दी जाने वाली इस किट की कीमत करीब 4 सौ रुपये है। इस किट में कापी, किताबों के अलावा स्टेशनरी का दूसरा सामान, पानी की बोतल, लंच बॉक्स शामिल रहता है। ‘उमंग फाउंडेशन’ स्लम में रहने वाले बच्चों को स्टेशनरी अपने ‘प्रमोट एजुकेशन’ प्रोग्राम (‘Promote Education’ program) के जरिये देता है। इस प्रोग्राम के जरिये बालवाड़ी से 10वीं तक के बच्चों को ये किट दी जाती है। आशीष ने बताया कि

स्टेशनरी (stationery) से जुड़ी किट देने बाद स्लम में रहने वाले बच्चों की स्कूलों में उपस्थिति बढ़ गई है। साथ ही इसका असर स्कूलों में होने वाले दाखिले पर भी पड़ा है। अब पहले के मुकाबले ज्यादा बच्चे स्कूल में दाखिला ले रहे हैं। इस काम से हमें भी अहसास हुआ है की एक छोटी सी मदद से कहीं ना कहीं इन बच्चों का भविष्य बन रहा है।

‘उमंग फाउंडेशन’ (Umang Foundation) ने 2008 में 30 बच्चों को स्टेशनरी देने से अपने काम की शुरूआत की और उसी साल ये संख्या 500 तक पहुंच गई थी। जबकि इस साल ‘उमंग फाउंडेशन’ की योजना करीब 50 हजार बच्चों तक किट पहुंचाने की है। बच्चों को किट देने के अलावा ‘उमंग फाउंडेशन’ (Umang Foundation) के करीब 30 दूसरे कार्यक्रम भी चल रहे हैं। जिसमें बच्चों को शहर और शहर के बाहर घूमने फिरने ले जाया जाता है, ताकि ये बच्चे बाहरी दुनिया को भी जान सकें। वहीं ब्लड डोनेशन कैंप (Blood Donation Camp), उमंग स्कॉलरशिप प्रोग्राम (Umang Scholarship Program), और मॉनिटरिंग प्रोग्राम ऐसे कई दूसरे कार्यक्रम हैं जो समय-समय पर चलाये जाते हैं। इसके अलावा ‘उमंग फाउंडेशन’ स्कूलों में स्वच्छ पानी के लिए भी काम कर रहा है। अब तक ये संगठन करीब 700 स्कूलों में वाटर प्यूरीफायर बांट चुका है। यही नहीं उमंग गुरूकुल प्रोग्राम के तहत ठाणे के जिला परिषद स्कूल में 150 बच्चों को अंग्रेजी, गणित और कम्प्यूटर सीखाने का भी ये संगठन काम कर रहा है। ‘उमंग फाउंडेशन’ ने मुंबई (Mumbai) के 70 स्कूलों में 1हजार से 2हजार किताबों की लाइब्रेरी बनवाई हैं और करीब 100 स्कूलों में 5 कम्प्यूटर के साथ लैब भी बनवाई है। इस वक्त ‘उमंग फाउंडेशन’ महाराष्ट्र (Maharashtra) के करीब 1 हजार सरकारी स्कूलों के साथ मिलकर काम कर रहा है। ‘उमंग फाउंडेशन’ के ये सभी प्रोग्राम मुंबई (Mumbai) के कल्याण, उल्लासनगर के अलावा आसपास के 100 किलोमीटर के दायरे में चल रहे हैं।

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आज ‘उमंग फाउंडेशन’ (Umang Foundation) के साथ करीब 10 हजार वालंटियर जुड़ चुके हैं। इनमें काफी संख्या घरेलू महिलाओं से लेकर, आईटी प्रोफेशन, कॉरपोरेट में काम करने वाले लोग और सीनियर सिटीजन शामिल हैं। खुद आशीष भी नौकरी करते हैं और हर सप्ताह अपना कुछ वक्त ‘उमंग फाउंडेशन’ को देते हैं। ‘उमंग फाउंडेशन’ में कोई भी कर्मचारी नहीं है।वालंटियर के तौर पर जुड़ने वाले लोग हर दिन 1 से 2 घंटे इस काम को देते हैं, जबकि सप्ताह के अंत में पूरा वक्त ‘उमंग फाउंडेशन’ की आगे की योजना, मीटिंग और वर्कशॉप के लिये देते हैं। हर साल उमंग फाउंडेशन एक वार्षिक उत्सव (Annual Event) का भी आयोजन करता है इसमें करीब 5 हजार बच्चे हिस्सा लेते हैं।

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‘उमंग फाउंडेशन’ (Umang Foundation) की इस समय 25 लोगों की एक टीम है जो अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित करती है। ‘उमंग फाउंडेशन’ के साथ आशीष की पत्नी पूजा अग्रवाल गोयल 2009 से जुड़ी हैं। जिसके बाद इस संगठन ने दोगनी रफ्तार से काम करना शुरू किया है। पूजा पेशे से आईटी प्रोफेशनल हैं और एक विदेशी बैंक में काम करती हैं। खास बात ये है कि ‘उमंग फाउंडेशन’ बिना सरकारी मदद के काम कर रहा है और इसके साथ जुड़े वालंटियर अपने स्तर पर फंड इकट्ठा करते हैं। आज भले ही ‘उमंग फाउंडेशन’ करीब 50 हजार बच्चों तक पढ़ाई की किट पहुंचाने की योजना बना रहा हो, लेकिन उनके पास डिमांड करीब डेढ़ लाख बच्चों तक किट पहुंचाने की है, लेकिन फंड की कमी के कारण वो ये डिमांड पूरी नहीं कर पा रहे हैं। बावजूद आशीष का सपना है कि वो 2020 तक 5लाख बच्चों तक ये किट पहुंचा सकें।

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