दून की आर्थिक उन्नति को रीति-नीति बदलने की जरूरत

अर्थव्यवस्था विकास की धुरी होती है। बात जब शहरों के विकास की हो तो अर्थव्यवस्था का फलक और व्यापक हो जाता है। ‘माय सिटी माय प्राइड’ महाअभियान के तहत शनिवार को ‘दैनिक जागरण’ कार्यालय में आयोजित राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस में जब दून की अर्थव्यवस्था की बात की गई तो 18 वर्षों के सफर में गिनाने लायक बहुत कुछ था।

वर्ष 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड के गठन और दून के राजधानी के रूप में आकार लेने से यह सफर शुरू हुआ। चंद वर्षों के भीतर ही सेलाकुई और आईटी पार्क जैसे बड़े इंडस्ट्रियल एरिया का उदय हुआ। इसके अलावा कलस्टर स्तर के मोहब्बेवाला, लाल तप्पड़ व पटेलनगर इंडस्ट्रियल एरिया की उपलब्धि भी सामने रखी गई।

वहीं, दून के निरंतर बढ़ते बाजार और कारोबारी जरूरतों पर भी बात की गई। कॉन्फ्रेंस में इस बात पर खुशी व्यक्त की गई कि प्रदेश में 50 फीसद से अधिक हिस्सेदारी सेकेंडरी स्तर के विनिर्माण (उद्यम) क्षेत्र की है और इसमें भी 37 फीसद हिस्सा मैनुफैक्चरिंग सेक्टर का है।

हालांकि, इस उपलब्धि में दून से अधिक हिस्सेदारी हरिद्वार और उधमसिंहनगर की रही। ऐसे में दून की अर्थव्यवस्था को बूस्ट करने के लिए गहन मंथन हुआ, जिसमें कई चुनौतियां सामने आई और उनका समाधान भी सुझाया गया। खासकर शिक्षा से लेकर, कारोबार और सरकारी व्यवस्था की रीति-नीति में पेशेवर रुख के साथ आगे बढऩे पर जोर दिया गया।

आईटी पार्क में नहीं आया बूम
निदेशक उद्योग एससी नौटियाल ने कहा कि सेलाकुई इंडस्ट्रियल एरिया ने फिर भी काफी तरक्की की, लेकिन आईटी पार्क से जितनी उम्मीदें थीं, उतनी पूरी नहीं हो पाई। इसके लिए उन्होंने कनेक्टिविटी के अभाव को बड़ा कारण बताया। इसके अलावा उन्होंने कहा कि आईटी (इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी) की प्रभावी नीति के अभाव में भी यह सेक्टर अपेक्षित रफ्तार नहीं पकड़ पाया। हालांकि, पिछले कुछ समय में एयर कनेक्टिविटी बढ़ने से दून के आसपास हेल्थ एंड वेलनेस का सेक्टर बढ़ रहा है। यह दून की अर्थव्यवस्था के लिए नए दरवाजे खोल सकता है।

कुशल कामगारों का है अभाव
इंडस्ट्री एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड (आईएयू) के अध्यक्ष पंकज गुप्ता ने कहा कि दून में माइग्रेशन और रिवर्स माइग्रेशन दोनों हो रहे हैं। ए ग्रेड के कुशल कामगार यहां से निरंतर पलायन कर रहे हैं, जबकि सी ग्रेड के अकुशल और अर्ध कुशल कामगारों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। ऐसे में इंडस्ट्री सेक्टर की अपेक्षाएं पूरी नहीं हो पा रही। यह भी एक बड़ा कारण है कि बड़े इंडस्ट्री हाउस दून में निवेश से कतरा रहे हैं।

उन्होंने आंकड़े रखते हुए कहा कि प्रति हजार छात्रों के शिक्षण की बात करें तो पॉलीटेक्निक करने वाले छात्रों की संख्या 4.1 फीसद है। इसी तरह आइटीआइ में यह आंकड़ा 3.5 व इंजीनियरिंग में 3.9 फीसद रह गया है। पंकज गुप्ता ने बल देते हुए कहा कि फॉर्मल एजुकेशन से इतर तकनीकी शिक्षा की हिस्सेदारी बढ़ाए जाने की जरूरत है।

रोजगार की गारंटी नहीं दे रहा एजुकेशन हब
एसजीआरआर पीजी कॉलेज के प्राचार्य प्रो. वीए बौड़ाई ने कहा कि राज्य गठन से लेकर अब तक दून को एजुकेशन हब का खिताब तो मिला है, लेकिन उच्च शिक्षा हासिल कर रहे छात्रों को इंडस्ट्री और कमर्शियल सेक्टर बेहतर रोजगार की गारंटी नहीं दे पा रहा। उन्होंने सवाल खड़ा किया कि यहां सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर चोटी के संस्थान हैं, जबकि उनमें रोजगार की स्थिति देखी जाए तो स्थानीय हिस्सेदारी काफी कम है। उन्होंने कौशल विकास कार्यक्रम व समय-समय पर आयोजित किए जाने वाले रोजगार मेलों पर भी सवाल खड़े किए। सुझाव दिया गया कि इंडस्ट्री व एजुकेशन सेक्टर को मिलकर इस दिशा में गंभीर मंथन करना चाहिए।

सोसायटी बदले अपना माइंडसेट
मशरूम और कृत्रिम कीड़ाजड़ी के उत्पादन में स्टार्ट-अप का नायाब उदाहरण पेश करने वाली युवा उद्यमी दिव्या रावत (मशरूम गर्ल) ने कहा कि यदि सोसाइटी अपना माइंडसेट बदले तो कोई भी व्यक्ति कुछ भी कर सकता है। आज के अधिकतर युवा नौकरी की तरफ भाग रहे हैं और सोसाइटी का माइंडसेट ऐसा है कि कुछ भी काम शुरू करने से पहले उन पर उसका नकारात्मक पक्ष हावी हो जाता है।

दिव्या ने बताया कि जब वह सौम्या फूड प्रा. लि. से अपना स्टार्ट-अप शुरू कर रही थी तो उन्हें भी सोसाइटी के इसी नकारात्मक पक्ष का सामना करना पड़ा, जबकि वह आज इससे उबर चुकी हैं और प्रतिदिन 2000 किलो मशरूम का उत्पादन उनकी इकाई और कलस्टर के माध्यम से हो रहा है।

उद्योगों को स्थानीय स्तर से नहीं मिल रहा कच्चा माल
पीएचडी चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के क्षेत्रीय निदेशक अनिल तनेजा ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि उद्योगों को स्थानीय स्तर से रॉ मैटीरियल (कच्चा माल) नहीं मिल पा रहा है। इसके लिए इंडस्ट्री सेक्टर को बाहरी फार्मिंग पर निर्भर होना पड़ रहा है। यदि यही माल स्थानीय स्तर पर मिलने लगे तो इससे दून की अर्थव्यवस्था समग्र विकास की तरफ बढ़ सकती है। साथ ही उन्होंने आईटी पार्क की नाकामी पीछे का कारण बताते हुए कहा कि राज्य की आइटी पॉलिसी में ही खामी है। यह सिर्फ एक थीसिस (निबंध) से अधिक कुछ नहीं।

इंडस्ट्री सेक्टर के लिए बढ़े लैंड बैंक
उत्तराखंड इंडस्ट्रियल वेलफेयर एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष अनिल ने कहा कि शहरीकरण और बाजारीकरण में दून ने बेशक काफी तरक्की की है, लेकिन इंडस्ट्री सेक्टर की बात की जाए तो सेलाकुई और आइटी पार्क के बाद हम कोई नया इंडस्ट्रियल एरिया विकसित नहीं कर पाए हैं। सरकार को चाहिए कि इंडस्ट्री सेक्टर के लिए कम से कम 100 एकड़ का लैंड बैंक बनाया जाए।

अर्थव्यवस्था सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं
स्टेट लेवल बैंकर्स कमेटी (एसएलबीसी) के पूर्व मुख्य प्रबंधक ज्योतिष घिल्डियाल ने कहा कि ज्यादातर मामलों में विकास सिर्फ आंकड़ों में नजर आता है। सुनकर अच्छा लगता है कि प्रति व्यक्ति आय में दून का प्रदेश में दूसरा स्थान है, जबकि यह भी सोचना चाहिए कि औसत आय के अनुसार कितने लोगों को आय प्राप्त हो रही है।

ऋण-जमा अनुपात में हो रहा सुधार
उत्तरांचल बैंक इंप्लाइज यूनियन के महामंत्री जगमोहन मेंदीरत्ता ने इस बात पर संतोष व्यक्त किया कि दून में ऋण-जमा अनुपात की स्थिति में सुधार हो रहा है। हालांकि, इसे अर्थव्यवस्था में सुधार की अपेक्षा अधिक बेहतर बनाने पर भी उन्होंने बल दिया। मेंदीरत्ता ने कहा कि इंडस्ट्री और कमर्शियल सेक्टर को जितना अधिक ऋण मिलेगा, अर्थव्यवस्था में भी उसी अनुपात में इजाफा हो पाएगा।

स्कूली स्तर पर मिले तकनीकी ज्ञान
केंद्रीय विद्यालय (केवी) हाथीबड़कला-एक के प्राचार्य डॉ. इंद्रजीत सिंह ने कहा कि केवी संगठन के विद्यालयों में सामान्य शिक्षा से हटकर भी बच्चों को तकनीकी ज्ञान भी दिया जाता है। हालांकि, यह पेशेवरों के मार्गदर्शन के अभाव में सिर्फ औपचारिकता साबित हो रहा है। उन्होंने कहा कि इंडस्ट्री सेक्टर यदि सहयोग करें तो कम उम्र से ही बच्चों को अपनी जरूरत के मुताबिक विकसित कर सकते हैं।

नोटबुक से बाहर भी मिले अर्थव्यवस्था का ज्ञान
डीबीएस पीजी कॉलेज में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर डॉ. अल्का सूरी ने कहा कि उनका पहला पाठ उद्यमिता को लेकर ही है और किताबी रूप में शिक्षण संस्थान अपने बच्चों को बेहतर ढंग से पूरी अर्थव्यवस्था के बारे में बताते हैं। हालांकि, उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि क्लासरूम के साथ-साथ बच्चों को पढ़ी गई बातों को धरातल पर उतारने का प्रशिक्षण नहीं मिल पाता। जब तक क्लासरूम की अर्थव्यवस्था और असल अर्थव्यवस्था पर साथ-साथ काम नहीं होगा, तब तक बेहतर परिणाम मिलने की उम्मीद कम ही है।

आईएयू ने लिया बच्चों को दक्ष बनाने का जिम्मा
जिस मकसद के साथ यह राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई थी, उसके आशाजनक परिणाम त्वरित रूप में भी नजर आ गए। केवी के प्राचार्य डॉ. इंद्रजीत सिंह और डीबीएस कॉलेज की प्रोफेसर डॉ. अल्का सूरी के सुझाव का स्वागत करते हुए आईएयू के अध्यक्ष पंकज गुप्ता ने कहा कि वह बच्चों को उद्यमिता का व्यावहारिक ज्ञान देने को तैयार हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षण संस्थान उनके पास प्रस्ताव लेकर आएं और वह इंडस्ट्री सेक्टर के पेशवरों को उन तक लेकर आएंगे। उन्होंने कहा कि बच्चों को शुरुआती स्तर से लेकर उच्च शिक्षा के स्तर पर तक वह हरसंभव व्यवहारिक ज्ञान देने को तैयार हैं।

वहीं, निदेशक उद्योग एससी नौटियाल ने पीएचडी चैंबर्स के क्षेत्रीय निदेशक की ओर से आइटी पॉलिसी पर खड़े किए गए सवाल को स्वीकार करते हुए कहा कि वह इसमें संशोधन को लेकर शासन के समक्ष सुझाव रखेंगे। उन्होंने कहा कि इस दिशा में पहले से भी काम चल रहा है। सितंबर में होने वाली इन्वेस्टर्स समिट में इसका असर भी सामने होगा।

निदेशक ने यह भी कहा कि अन्य कई नीतियों में भी सुधार किया जा रहा है। ऐसे प्रशिक्षित लोगों की कमी नहीं है, जो वापस आकर दून में उद्यम स्थापित करना चाहते हैं। एक बेहतर नीति जल्द ऐसे लोगों का स्वागत करेगी। वहीं, राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस का हिस्सा बने विशेषज्ञों ने एक स्वर में कहा कि इसके लिए शिक्षण संस्थान, इंडस्ट्री सेक्टर और सरकार को एक मंच पर लाने के प्रयास किए जाएंगे।

पैनलिस्ट की राय
प्रदेश का फोकस अब उद्यमियों को प्रोत्साहित करने पर है। उम्मीद है कि इस दिशा में सितंबर में होने वाली इन्वेस्टर्स मीट मील का पत्थर साबित होगी।
– एससी नौटियाल, निदेशक (उद्योग)

सरकार बेहतर संसाधन मुहैया कराए तो बिना किसी रियायत में भी उद्योगपति काम करने को तैयार हैं। साथ ही उद्यमियों के सुझावों पर त्वरित अमल होना चाहिए।
– पंकज गुप्ता, अध्यक्ष, इंडस्ट्रीज एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड

स्वरोजगार को बढ़ावा दिए जाने की जरूरत है। खासकर बैंकों को इस दिशा में अग्रणी भूमिका के रूप में काम करना होगा। हालांकि, इस सब में सरकारी की इच्छाशक्ति भी बहुत मायने रखती है।
– ‘मशरूम गर्ल’ दिव्या रावत, युवा उद्यमी

स्टार्ट-अप योजनाओं पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। पीएचडी चैंबर्स के माध्यम से प्रयास तेज किए जाएंगे। कुछ कर गुजरने की हिम्मत रखने वाले युवाओं का स्वागत है।
– अनिल तनेजा, क्षेत्रीय निदेशक, पीएचडी चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री

योग्यता के अनुसार रोजगार मुहैया कराने के प्रयास होने चाहिए। वर्तमान में केंद्र की ऐसी तमाम योजनाएं संचालित की जा रही हैं। इन्हें धरातल पर उतारने की जरूरत है।
– प्रो. वीए बौड़ाई, प्राचार्य, एसजीआरआर पीजी कॉलेज

एक्सपर्ट की राय
वर्ष 1989 के दून वैली नोटिफिकेशन की समीक्षा किए जाने की जरूरत है। आज हालात बदल चुके हैं और शहर की जरूरत भी। इंडस्ट्री सेक्टर को बढ़ावा देने के लिए हर दिशा में सोचा जाना चाहिए।
– अनिल मारवाह, अध्यक्ष, उत्तराखंड इंडस्ट्रियल वेलफेयर एसोसिएशन

जो भी उद्यमी ऋण के लिए आवेदन कर रहे हैं, उन्हें होमवर्क पूरा करना चाहिए। ऋण के 90 फीसद मामलों में प्रोजेक्ट रिपोर्ट दुरुस्त नहीं होती है।
– जगमोहन मेंदीरत्ता, महामंत्री, उत्तरांचल बैंक इंप्लाइज यूनियन

दून की अर्थव्यवस्था में अभी बड़ा योगदान वेतनभोगी लोगों का है। इसे बदलने की जरूरत है, क्योंकि वेतनभोगी तबके के लिहाज से दून की क्षमता सीमित होती जा रही है। स्वरोजगार को बढ़ावा देकर इस ट्रेंड को बदला जा सकता है।
– ज्योतिष घिल्डियाल, पूर्व मुख्य प्रबंधक, एसएलबीसी

दून की शिक्षा व्यवस्था को प्रशिक्षण से जोड़ने की जरूरत है। हमें युवाओं को शिक्षित करने के साथ ही उन्हें प्रशिक्षित भी बनाना होगा। शिक्षण संस्थान इसके लिए तैयार हैं, सरकार और इंडस्ट्री सेक्टर को भी इस जिम्मेदारी को समझना होगा।
– डॉ. अल्का सूरी, प्रोफेसर, डीबीएस पीजी कॉलेज

स्कूली स्तर पर ही वोकेशनल कोर्स की तरफ भी ध्यान देना होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी यही चाहते हैं। उद्यमिता के गुण अल्पायु से ही विकसित करने होंगे।

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