लोकतंत्र हमारा, मीडिया तुम्हारा!

(भूपेश पंत)

देश में अगले आम चुनाव के लिये सियासी ऊंट करवटें लेने की तैयारी कर रहा है और लोकतंत्र के चौथे खंभे यानी मीडिया ने हर दल का अपने अपने तरीके से सियासी मूल्यांकन करना भी शुरू कर दिया है। उनकी गिद्ध दृष्टि केंद्र और विपक्ष के सियासी नफा नुकसान के लिहाज़ से ज़मीन पर रेंग रहे मुद्दों पर झपट्टा मारने के लिये बेताब है। लेकिन मुझे कोई ये बताये कि ये कैसा लोकतंत्र है जहां किसी संभावित गठबंधन की आलोचना मीडिया के एक हिस्से में इस बात के लिये हो रही है कि उसका नेता अभी तय क्यों नहीं है। भारतीय लोकतंत्र किसी भी राजनीतिक पद के लिये सबको समान अवसर की भावना को स्थापित करता है लेकिन सच तो ये है कि देश की ज्यादातर पार्टियों का आंतरिक लोकतंत्र इस भावना से कोसों दूर नजर आता है। कहीं पार्टी के उच्च पदों पर एक ही परिवार का कब्जा है तो कहीं एक परिवार से जुड़े व्यक्ति पर ही पूरी पार्टी की चुनावी नैया पार लगाने का दारोमदार है।

ऐसे में राजनीतिक पार्टियों की इस लोकतंत्र विरोधी मानसिकता का समान रूप से विरोध करने की बजाय जब मीडिया का एक तबका सियासी हाथों में खेलते हुए एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर ही सवाल उठाने लगता है तो हैरानी होती है। आखिर क्यों आज ही ये तय हो जाना चाहिये कि अमुक गठबंधन के जीतने पर कौन किस पद पर आसीन होगा। मीडिया को ये जानने में क्यों दिलचस्पी है कि भानुमती के कुनबे की भानुमती कौन होगी। आखिर इसके जरिये देश के मतदाताओं को मीडिया का ये तबका कौन सा संदेश देने की कोशिश कर रहा है। क्या वो अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिये चुनाव से पहले किसी मुद्दे को स्थापित करने की फिराक में हैं भले ही इसके लिये लोकतांत्रिक व्यवस्था को ताक पर क्यों ना रखा जाये या फिर किसी के सियासी फायदे के लिये खुद को हथियार बनाने की कोशिश है। नफा नुकसान के भंवर में फंसे मीडिया का ये तबका शायद कामयाबी के शॉर्टकट का सफ़र तय कर रहा है लेकिन ऐसा करके क्या वो कहीं ना कहीं देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को खोखला नहीं कर रहा है।

कोई भी सियासी दल किसी भी चुनाव में अपने विरोधियों पर तरह तरह के राजनीतिक आरोप लगाता है जो कभी साबित नहीं होते। सियासी जंग में जुमलों का इस्तेमाल भी अब कोई नयी बात तो नहीं है। लेकिन चुनावी राजनीति में कोई भी दल अपनी संवैधानिक और लोकतांत्रिक मर्यादा को पार ना करे ये तय करने की जिम्मेदारी मीडिया की भी है। ऐसे में अगर मीडिया का कोई हिस्सा जाने अनजाने इस लोकतंत्र विरोधी सियासी मुद्दे को चटखारे ले लेकर आगे बढ़ाता है तो वो पत्रकारिता के ही नहीं लोकतांत्रिक मूल्यों के पतन में भी बराबर का हिस्सेदार है।

मेरा मानना है कि निष्पक्ष होना बेहद मुश्किल है। इस प्रक्रिया में अकसर खून के आंसू रोने पड़ते हैं और जहर के घूँट पीने पड़ते हैं। कभी कभी तो अंतरात्मा की आवाज़ को भी अनसुना करना पड़ता है। ज़ाहिर है ऐसे में निष्पक्षता का दावा करने वाले तथाकथित मीडिया को किस दर्द से गुजरना पड़ता होगा ये मैं कुछ हद तक समझ सकता हूँ। लेकिन इस दर्द से आराम पाना चाहें तो वो इस देश के संविधान, लोकतांत्रिक सिद्धांतों, जनता के हितों और सच के पक्ष में खड़े होकर पा सकते हैं। वर्ना हो सकता है उनकी वजह से पूरी मीडिया बिरादरी ही आने वाले समय में ये विकल्प पूरी तरह से खो दे।

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