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“वर्चुअल” दुनिया के वास्तविक खतरे !

अपराध सभ्यता का अपरिहार्य हिस्सा है। जहाँ भी सभ्यता हस्ताक्षर करती है, वहाँ अपराध अपनी काली स्याही जरूर गिरा देता है। दुनिया के बदलने से भी यह नियम नहीं टूटता। चाहे वह असल दुनिया यानी ‘रियल वर्ल्ड हो अथवा आभासी दुनिया यानी ‘वर्चुअल वर्ल्ड’। दरअसल इंसान के दखल के साथ ही उसकी फितरत का असर भी असल और आभासी दुनिया में देखा जा सकता है। तकनीकि जिस तेजी से हमारी जिंदगी के हर पहलू में दाख़िल हुई है, उसके बाद रियल और वर्चुअल वर्ल्ड एक-दूसरे के पूरक हो गए हैं। आज के तकनीकी युग में खासतौर पर युवा और बच्चे जितना रियल वर्ल्ड में नहीं रहते, उससे ज्यादा वर्चुअल या इमेजनरी (काल्पनिक) वर्ल्ड में वक़्त गुजारते हैं। और यह अवधि वक़्त से साथ बढ़ती जा रही है। व्यवस्था ने भी तकनीकि को अपना लिया है। सब कुछ इंटरनेट की तरंगों की सड़क पर दौड़ रहा है। लेकिन हर किस्म के विकास, प्रगति या खुशी का आधार सुरक्षा है। इसलिए यदि सुरक्षा नहीं तो कुछ भी नहीं। इंटरनेट पर हमारी निर्भरता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है और उसी अनुपात में इंटरनेट से जुड़े अपराध भी। जिस तरक्की से तकनीक ने जीवन में दखल देना शुरू किया है, उसी तेजी से जीवन के सफेद और स्याह रंग भी तकनीकी दुनिया में दाखिल हो रहे हैं। आदर्शों, मूल्यों और ज्ञान-विज्ञान की अथाह पूंजी के साथ-साथ मानवीय कुंठाएं और आपराधिक व्यवहार भी यहाँ गति पकड़ रहे हैं और जाहिर तौर पर इसका सबसे ज्यादा शिकार हो रही है आधी आबादी, बच्चे और वृद्ध। लेकिन मजबूरी है कि आज यदि आपको जमाने के हिसाब से कदमताल करना है, तो आपको इंटरनेट की जरूरत पड़ेगी ही, वह चाहे एकाउंट खोलना हो या पैसे निकालने हों या किसी फिल्म के टिकट लेने जैसा मामूली काम करना हो, हर जगह हम ऑनलाइन सुविधा खोजते हैं। पर, हर अवसर अपने साथ कुछ न कुछ चुनौती लाता है और कम-से-कम भारत में साइबर अपराध इंटरनेट के लिहाज से एक बड़ी चुनौती बन कर उभर रहा है। हेराफेरी, इंटरनेट बैंकिंग फ्राड, सूचना तकनीक से अश्लीलता फैलाने, ईमेल का दुरुपयोग कर ब्लैकमेल करने, फर्जी ईमेल और एसएमएस से प्रताडि़त करने के मामलों में भी साल दर साल बढ़ोतरी हो रही है।

एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था के शोध के अनुसार भारत में पिछले 10 वर्षों में (2005-15) साइबर अपराध के मामलों में 19 गुना बढ़ोतरी हुई है। इंटरनेट पर ‘दुर्भावनापूर्ण गतिविधियों के मामले में भारत का अमेरिका और चीन के बाद तीसरा स्थान है। वहीं, दुर्भावनापूर्ण कोड के निर्माण में भारत का स्थान दूसरा और वेब हमले और नेटवर्क हमले के मामले में क्रमश: चौथा और आठवां स्थान है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े के मुताबिक साइबर अपराधियों की गिरफ्तारी में नौ गुना बढ़ोतरी हुई है। वहीं, इस दौरान भारत में इंटरनेट प्रयोक्ताओं का आंकड़ा बढ़ कर लगभग 46.2 करोड़ तक पहुंच गया है। भारत में साइबर अपराधों में मुख्यत: अश्लीलता, धोखाधड़ी और यौन शोषण शामिल हैं। साइबर अपराध के आरोप में 2004-2014 के मध्य उत्तर प्रदेश से सबसे ज्यादा कुल 1,223 गिरफ्तारियां की गईं, जिसके बाद महाराष्ट्र (942), तेलंगाना (429), मध्य प्रदेश (386) और कर्नाटक (372) का नंबर है। वर्ष 2016 के पहले तीन महीनों में 8,000 से ज्यादा वेबसाइटों को हैक किया गया तथा 13,851 स्पैम उल्लंघन की जानकारी मिली है। राज्यसभा में एक प्रश्न के जवाब में यह जानकारी दी गई है। पिछले पांच सालों में फिशिंग, स्कैनिंग, दुर्भावनापूर्ण कोड का निर्माण जैसे साइबर सुरक्षा अपराधों में 76 फीसदी वृद्धि हुई है। वर्ष 2011 में 28,127 से बढ़ कर यह 2015 में 49,455 हो गया। राज्यसभा में एक प्रश्न के जवाब में दी गई जानकारी के मुताबिक एटीएम, क्रेडिट/डेबिट कार्ड और नेट बैंकिंग संबंधित धोखाधड़ी के 2014-15 में 13,083 मामले और 2015-16 (दिसंबर तक) में 11,997 मामले दर्ज किए गए। दिल्ली उच्च न्यायालय की एक समिति की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 2013 में कुल 24,630 करोड़ रुपये के साइबर अपराध दर्ज किए गए, जबकि विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में कुल 25,12,500 करोड़ रुपये के साइबर अपराध के मामले सामने आए। अपराध के यह आकंड़े कम-ज्यादा हो सकते हैं, लेकिन यह संख्या बता रही है कि आभासी दुनिया, जो कि हमारी सच्ची दुनिया का अहम् हिस्सा बन चुकी है, कतई सुरक्षित नहीं है, और यहाँ भी सबसे असुरक्षित है महिला।

यहाँ भी सबसे असुरक्षित हैं महिलाएं
सुरक्षा के सवाल को लेकर महिलाएं कहीं भी निश्चिंत नहीं हैं। न असल दुनिया में, न आभासी दुनिया में। अभद्र शब्दावली से लेकर दैहिक शोषण तक, किसी भी अनहोनी के होने की दहशत और आशंका यहाँ भी हर पल मौजूद है। गली-मुहल्ले, नुक्कड़, स्कूल-कॉलेज के आस-पास और दूसरे सार्वजनिक स्थानों पर मिलने वाले रोड-रोमियो यहाँ पर साइबर स्टॉकर (साइबर स्टॉकिंग का आशय है आभासी दुनिया में किसी व्यक्ति की निजता का अतिक्रमण करना, उसकी हर एक गतिविधि पर नजर रखना और अवैध रूप से सूचनाओं का प्रयोग करते हुए सम्बन्धित व्यक्ति का मानसिक उत्पीडऩ करना) बन कर उनका पीछा कर रहे हैं। ईमेल पर उन्हें अनचाहे मैसेज और प्रेम आमंत्रण मिल रहे हैं तो सोशल साइट्स पर अवांछित टिप्पणियां, भद्दे पोस्ट, पोर्नोग्राफिक चित्र और वीडियो जबरन चिपकाए जा रहे हैं। उनकी पहचान से जुड़े दस्तावेजों और सूचनाओं का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं और हैकर्स इंफॉर्मेशन सिस्टम में अनाधिकृत घुसपैठ करके डाटा से छेड़छाड़ कर रहे हैं।

कुल मिला कर कहें तो साइबर स्पेस का यूज कर रही स्त्री को नहीं मालूम कि दोस्त समझ कर उसने कितने दुश्मनों की ‘रिक्वेस्ट’ को ‘कन्फर्म’ कर दिया है और दुनिया के किस कोने से कौन चेहरा उसकी हर एक गतिविधि पर नजर जमाए हुए है। जरूरी नहीं कि साइबर स्टॉकर उसका पड़ोसी हो, कॉलेज का सहपाठी हो, या कहीं भी, कभी भी, सरेराह टकरा जाने वाला जाना-पहचाना चेहरा… वह कोई भी हो सकता है— स्त्री या पुरुष। परिचित-अपरिचित। देशी-विदेशी। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि ये आपराधिक प्रवृत्तियां दरअसल अनेक प्रकार के सामाजिक द्वंदों से उपजी कुंठाएं हैं, जो स्वस्थ मनो-धरातल के अभाव में सामने आ रही हैं। एक अनुमान के अनुसार विश्व की लगभग ढाई अरब ऑनलाइन जनसंख्या में तकरीबन 63 हजार स्टॉकर मौजूद हैं। सूचना-संचार-तकनीकि ने उन्हें यह सुविधा दी है कि वे दुनिया के किसी भी कोने में बैठ कर छोटी सी स्क्रीन के माध्यम से अपनी मन:विकृतियों और कुंठाओं को पुष्ट कर सकें। किसी भी मसले पर महिलाओं के चरित्र हनन की कोशिश समाज में आम है। हाल ही में केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने गृह मंत्रालय को एक पत्र लिख कर ऑनलाइन अभद्रता की शिकार होने वाली महिलाओं को सुरक्षा देने के लिए कदम उठाने की बात कही है। मेनका गांधी ने कहा, ‘महिलाओं को कई बार इंटरनेट पर क्रूरता का सामना करना पड़ता है। पहले इंटरनेट प्रदाता हमसे इस बाबत बात करने को तैयार नहीं थे लेकिन बाद में उन्होंने संबंधित विस्तृत जानकारी देने की बात मान ली। गांधी ने गृह मंत्रालय से कहा है कि सोशल मीडिया पर महिलाओं के साथ होने वाले बर्ताव को लेकर संहिता बनाई जाए। वैसे भी सोशल मीडिया उन महिलाओं के लिए भी बेहद डरावनी जगह है, जो समाज में सशक्त मानी जाती है। अपनी बात रखने के एवज में उन्हें गंदी गालियों से नवाजा जाता है, साथ ही मार देने और बलात्कार कर देने तक की धमकियां दी जाती हैं। सोशल मीडिया पर अक्सर किसी महिला पत्रकार या नेता को विरोधस्वरूप हजारों की संख्या में गालियां दी जाती हैं।

बरखा दत्त, सागरिका घोष, राना अयूब, कविता कृष्णन, अलका लांबा, स्मृति ईरानी, अंगूरलता डेका, यशोदा बेन आदि महिलाएं इस अभद्रता की भुक्तभोगी हैं। जो लोग किसी की बात-विचार या व्यक्तित्व को नापसंद करते हैं तो वे लोग इसका विरोध गंदी गालियों या चरित्र-हनन के रूप में करते हैं। सागरिका घोष और उनकी बेटी का बलात्कार करने की धमकी दी गई। हाल ही में फेसबुक पर कविता कृष्णन ने कथित ‘फ्री सेक्स’ के बारे में विचार रखे तो उनके खिलाफ एक वरिष्ठ पत्रकार ने अभद्र टिप्पणी की। असम में नवनिर्वाचित भाजपा विधायक अंगूरलता डेका की फोटो शेयर करके अपमानजनक टिप्पणियां की गईं। अदाकारा अंगूरलता की इंटरनेट पर मौजूद उनकी एक्टिंग या मॉडलिंग से जुड़ी तस्वीरों को उनके चरित्र से जोड़ कर पेश किया गया। राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली दमदार अभिनेत्री कंगना रनौत भी सोशल मीडिया पर होने वाली अभद्रता का शिकार हुईं। दरअसल आभासी दुनिया इसी दुनिया का हिस्सा है। स्त्री के लिए जितना विरोध और घृणा बाहर है, उतनी ही यहाँ भी है। फ्री सेक्स का ही मामला नहीं है, औरत के लिए फ्री स्पीच और फ्री थिंकिंग को भी बर्दाश्त नहीं करता मर्दवादी समाज।

साइबर क्राइम विशेषज्ञों के मुताबिक ऑनलाइन हरेसमेंट (परेशान करना) की चपेट में अधिकतर वे महिलाएं आती हैं, जो सतही जानकारियों के साथ इस मायावी दुनिया में जी रही होती हैं। जो खुद को इस दुनिया का हिस्सा तो बना लेती हैं पर अपनी सुरक्षा के हिस्से का उपयोग करना नहीं सीख पातीं। यानी जो तकनीक और कानून द्वारा दी गई सुरक्षा सुविधाओं से वाक़िफ नहीं होतीं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह जरूरी नहीं कि हर मामले में पीड़िता को जाल में उलझाया ही गया हो, कई मामलों में भावुक, स्वप्नदर्शी और महत्वाकांक्षी स्त्रियां खुद ही इस जाल में उलझ जाती हैं। साइबर जगत से जुड़ी 70 प्रतिशत महिलाएं अश्लील मैसेज और पोर्नोग्राफिक सामग्री पर टैगिंग की गुपचुप शिकायतें करती हैं, लेकिन कानून की शरण में नहीं जातीं। निश्चित रूप से इस कारण स्टॉकर्स (परेशान करने वाले) को बढ़ावा मिलता है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि स्टॉकर्स को ट्रेस करना आसान नहीं होता क्योंकि अधिकतर वेबसाइट्स विदेशों से संचालित हैं, साइबर सेल इनवेस्टीगेटर इन्हें आईपी (इंटरनेट प्रोटोकोल एड्रेस) के जरिये ट्रैक करते हैं, लेकिन यदि इंटरनेट कैफे से आपराधिक गतिविधि संचालित हो रही हों तो ऐसे मामलों में क्रिमिनल ट्रैकिंग और मुश्किल हो जाती है।

वैसे अपने देश में स्त्री सुरक्षा के लिए बने कानूनों की एक लंबी फेहरिस्त मौजूद है। आईपीसी की धारा-292, 293, 294, 500, 506 और 509 के अलावा आईटी एक्ट 2000 और 2008 तक फिर भी विडंबनापूर्ण तथ्य यह है कि ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों ही स्थितियों में पीड़िताएं कानूनी सहायता लेने में हिचकती हैं। उन्हें लगता है कि यहाँ कानूनी मदद से राहत पाने तक का सफर जितना लंबा और आफत भरा है, उससे बेहतर है कि व्यक्तिगत स्तर पर ही कोई प्राथमिक उपचार तलाश लिया जाए। नतीजतन, वे व्यक्ति विशेष को अनफ्रेंड या ब्लॉक करने से लेकर फेक आईडी के जरिये आभासी दुनिया में ‘सुरक्षित’ बने रहने तक के तमाम चतुराई भरे फंडे आजमाती हैं। और कुछ हमेशा के लिए इस दुनिया को बाय-बाय कह कर ‘सुरक्षित’ निकल लेती हैं। हालात यह हैं कि दुरुपयोग होने के भय से महिलाएं सोशल साइट्स पर अपने फोटो अपलोड करने से कतराती हैं और पर्सनल प्रोफाइल में जानबूझ कर गलत जानकारियां शामिल करती हैं। जिस तकनीकी दुनिया से जुड़ कर स्त्री आज खुद को ज्यादा अभिव्यक्तिपूर्ण, ज्यादा आजाद और ज्यादा प्रगतिशील महसूस कर रही है, वहाँ उसकी अभिव्यक्ति, आजादी और प्रगतिशीलता की एक बड़ी कसौटी यह भी है कि वह किसी भी अवांछित गतिविधि से न डरे, न ही उसे नजरअंदाज करे।

पिछले दिनों महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने सोशल मीडिया पर महिलाओं के साथ होने वाली ट्रोलिंग को रोकने के लिए ‘एंटी ट्रोलिंग’ की घोषणा की, जो कि महिलाओं के ऑनलाइन प्रताडऩा के मामलों पर निगरानी रखेगी। इसके तहत एक इकाई केवल प्रभावित महिलाओं द्वारा ईमेल के जरिये की गई शिकायतों पर कार्यवाही करेगी। जिसमें गाली गलौज वाले व्यवहार, प्रताडऩा, नफरत भरे आचरण के बारे में शिकायत मिलेगी। इस कार्य की जिम्मेदारी किसी एक जिम्मेदार व्यक्ति की होगी जिससे मंत्रालय ट्विटर पर ट्रोलिंग की शिकायतों पर सीधे बात कर सके। इसके लिए दिल्ली महिला आयोग ने भी मेनका का समर्थन कर उनकी प्रशंसा की है। हालांकि मेनका ने यह भी साफ कर दिया है कि ‘एंटी ट्रोलिंग’ का मतलब साइबर निगरानी करना कतई नहीं है। हाल ही में ही गृह मंत्रालय इससे पहले साइबर क्राइम निवारण योजना भी विशेष रूप से महिलाओं व बच्चों के साथ होने वाले साइबर अपराधों को रोकने के लिए तैयार की है। इसमें साइबर विशेषज्ञों की टीम अश्लील मैसेज व पोर्न वीडियो भेजना, अश्लील ई-मेल या छवि खराब करने के उद्देश्य से महिलाओं, बच्चियों के मूल फोटो में परिवर्तित कर पोर्नोग्राफी विषय-वस्तु तैयार करने जैसे मामलों को देखेगी। जिसमें कम से कम समय में आरोपियों तक पहुंचने की बात की गई थी।

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