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यहां दलित न मूंछें रख सकता है न गरबा खेल सकता है

गुजरात के भदरनिया गांव में रहने वाला 21 साल का ‘दलित’ जयेश सोलंकी. जयेश विजयदशमी के दिन पास के मंदिर में गरबा खेलने गया. जयेश को दलित कहने पर ज़ोर दिया गया है क्योंकि आगे की कहानी इसी के इर्द-गिर्द घूमती है. यहां संजय पटेल नाम के लड़के ने जयेश को दलित होने की वजह से खूब गालियां दीं. झगड़ा बढ़ गया और संजय समेत नौ पटेल कम्युनिटी के लड़के उसे पीटने लगे. दीवार पर उसका सिर ज़ोर से लड़ा दिया. बहुत चोट आई. उसे अस्पताल पहुंचाया गया. डॉक्टर ने बताया कि अस्पताल पहुंचने से पहले ही उसने दम तोड़ दिया था.

जयेश अपने कज़िन प्रकाश सोलंकी और दो और दलित लड़कों के साथ नवरात्रि सेलिब्रेट करने मंदिर गया था. पुलिस ने इन नौ आरोपियों को गिरफ़्तार कर लिया है. पुलिस ऑफ़िसर ने बताया कि इन नौ आरोपियों ने दलित लड़कों से कहा था कि दलित के पास गरबा देखने का अधिकार नहीं है.

इससे पहले 25 सितंबर और 29 सितंबर को गुजरात के गांधीनगर ज़िले के लिंबोदरा गांव में दो अलग-अलग लेकिन एक ही तरह के मामले सामने आए थे. यहां दोनों दलितों को राजपूत कम्युनिटी के लोगों ने मूंछें रखने की वजह से पीट दिया था.

ऐसे ही मामलों की वजह से गुजरात के कई दलित लड़के मिलकर सोशल मीडिया पर एक कैंपेन चला रहे हैं. यहां वो अपनी मूंछों के साथ तस्वीरें शेयर कर रहे हैं, #JativaadNaVirodhMa (जातिवाद के विरोध में) और #SamidhanNaSamarthanMa (संविधान के समर्थन में) जैसे हैशटैग्स के साथ.

गुजरात में जातिवाद का ये दलदल पुराना है. 2016 में गुजरात के ऊना शहर में हुए प्रोटेस्ट ने पूरे राज्य को हिलाकर रख दिया था. खुद को गौरक्षक बताने वाले कुछ लोग 11 जुलाई, 2016 को ऊना के एक गांव के पास पहुंचे. यहां इन लोगों ने चार दलितों को कार से बांधकर लोहे की रॉड से पीट दिया था. ये दलित ऐसी गायों की खाल निकाल रहे थे, जो मर चुकी थीं. फिर भी गौरक्षकों ने अपना ‘न्याय’ किया. इस घटना के बाद दलितों ने एक बड़ा प्रोटेस्ट किया था.

गुजरात और केंद्र, दोनों जगह बीजेपी की सरकार है. 2014 के लोकसभा चुनाव में गुजरात को ‘विकास का मॉडल’ बताकर वोट मांगे गए थे. एक ‘विकसित’ राज्य में जातिवाद के ऐसे मामलों का होना चिंता की बात है.

दलितों के गरबा में शामिल होने और मूंछें रखने के नाम पर जो हिंसा हुई, वो जातिवाद की घटिया सोच को दिखाती है. उन लोगों को बेपर्दा करती है जो सोचते हैं कि वो ‘ऊंचे हैं’ और सिर्फ़ उन्हें ही मूंछें रखने और त्योहार मनाने का अधिकार है. ये मान बैठे हैं कि मूंछें तो ‘ऊंची जात’ वालों की मर्दानगी की निशानी है और दलित तो इसके लायक ही नहीं हैं.

अनुसूचित जाति के लिए राष्ट्रीय आयोग (NCSC) के डेटा के मुताबिक, साल 2015 में गुजरात में अनुसूचित जाति के लोगों के साथ सबसे ज़्यादा क्राइम हुए थे. साल 2016 से 2017 के बीच कई नए लीडर्स खड़े हुए- पाटीदारों के हार्दिक पटेल, अन्य पिछड़ी जाति के लिए अल्पेश ठाकुर और दलितों के लिए जिग्नेश मेवानी.

कुछ ही महीनों बाद गुजरात में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. बीजेपी के लिए गुजरात उसका चमकता हुआ सितारा है, जिस पर उसे बहुत गर्व है. चुनाव में जातियां हमेशा बड़ा रोल प्ले करती रही हैं लेकिन जब तक सरकार जातिवाद के मामलों पर चुप्पी साधे रहेंगी, तब तक इसी तरह लोगों की जानें जाती रहेंगी.

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