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हिन्दुओ के देश में “गाय माता” के खाने के लिए “प्लास्टिक “और कूड़ा है न !

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार ने आते ही गायों की रक्षा के लिए क़दम उठाया। सारे अवैध बूचड़खानों को बंद करने का आदेश आ गया। जैसे-जैसे बूचड़खाने बंद होते गए, मुझे नोटबंदी के दिन याद आने लगे। प्रधानमंत्री मोदी ने 8 नवंबर 2016 की रात देशवासियों से आह्वान किया था, कि नकली करेंसी को ख़त्म करने के लिए सब मिलकर आगे आएं। लेकिन बिना किसी ब्लूप्रिंट के सरकार ने जिस हड़बड़ी में नोटबंदी लागू कर दिया, उसे देखते हुए बूचड़खानाबंदी का सवालों के दायरे में आना तो लाज़मी है। हिन्दू हृदय सम्राट योगी आदित्यनाथ भी कुछ इसी अंदाज़ में उत्तर प्रदेश और देश से अपील कर रहे हैं, कि गौहत्या बंद हो। लेकिन ऐसी प्रतीत होता है कि उनके पास भी इसका कोई ब्लूप्रिंट नहीं है।

पिछले साल अगस्त में जयपुर के एक गौशाला में 200 से ज़्यादा गायों की मौत हुई थी। कारण बहुत से थे। गंदगी, अपर्याप्त चारा, धूप, कीचड़ और असामान्य रख-रखाव के चलते गायों ने दम तोड़ दिया था। मृत गायों को कीचड़ से खींचकर निकाला गया था। वो दृश्य मार्मिक था। बाद में पता चला कि उस गौशाला में कई गायों की मौत पॉलिथिन चबाने की वजह से हुई थी। ऊना में दलितों पर अत्याचार के बाद मोदी ने कथित गोरक्षकों को आगाह किया था। “ज़रा उनसब की एक हिटलिस्ट तो बनाओ। ज़रा पता तो चले कि उनमें से कितने आपराधिक रिकॉर्ड के निकलते हैं? अगर गायों की रक्षा करनी है तो पॉलिथिन सड़क पे मत फेंकें। सबसे ज़्यादा गायों की मौत इसके खाने की वजह से होती है।”
वहीं राजस्थान के ही पथमेड़ा, सांचौर ज़िले में स्थित ‘गोधाम महातीर्थ आनंदवन गौशाला’ भारत की सबसे बड़ी प्राकृतिक गौशाला है। (इंटरनेट पर एक-दो जगह दुनिया की सबसे बड़ी गौशाला भी पढ़ा है, लेकिन संदेह है, क्यूंकि कैनेडा के फार्म्स बहुत बड़े और अत्याधुनिक होते हैं।)

पथमेड़ा में कामधेनु पर सम्पूर्ण ध्यान दिया जाता है। साफ़-सफ़ाई, चारा व मैदान सब उत्तम दर्ज़े के होते हैं। राजस्थान के बड़े-बड़े व्यवसायी, सब छोड़-छाड़कर गौ सेवा में लगे हुए हैं। वहां वृहद स्तर पर दूध, घी, मक्खन और छांछ का कारोबार भी होता है। भारत के दूसरे राज्यों/ज़िलों में इस क़िस्म के गौशालाओं का आभाव है। चारे के रूप में उन्हें खल्ली और चोकर की अच्छी गुणवत्ता नहीं मिलती। गाय-पालन के लिए सरकार ने भी किसानों को कोई राहत मुहैया नहीं की है। ऐसे में मवेशी कमज़ोर हो जाते हैं। नतीजतन दूध का उत्पादन कम हो जाता है। हमारे यहां आज भी भैंसों का दूध ज़्यादा पिया जाता है।
ऊपर के तथ्यों को लिखने का सन्दर्भ ये है कि उत्तर प्रदेश में जितनी तेज़ी से बूचड़खानों को बंद किया जा रहा है, क्या उससे दुगनी तेज़ी से पथमेड़ा जैसे गौशालाओं के निर्माण हो रहे हैं? क्यूंकि बूचड़खाने बंद होने के बाद गायों का क्या होगा? क्या कपिला के रहने के लिए पर्याप्त इंतज़ाम किये गए हैं?

किसानों को गाय-पालन खेती से भी महंगा पड़ता है कभी-कभी। हर रोज़ 7-8 लीटर दूध के लिए सालाना 70-80 हज़ार ख़र्च होते हैं। जब मवेशी पैसे की कमी से बीमार पड़ने लगते हैं, तब जगह-जगह मजबूर किसान उन बीमार गायों को बेचने लगते हैं। बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश और बंगाल में इन गायों की तस्करी की जाती है। इन्हें कसाईयों के पास बेचा जाता है और किसान जर्जर गायों से थोड़ा मुनाफ़ा कमाने लगते हैं। मेरा आशय है कि ‘डू वी हैव एनी बैकअप’ या फिर से नोटबंदी की तरह गोलपोस्ट शिफ़्ट करते रहना है? कि भैया पहले शुरू किया गौरक्षा से, फिर भटकते हुए देशभक्ति, फिर धर्म-रक्षा, फिर राष्ट्र-रक्षा, पर्यावरण-रक्षा और ग्रीन-हाउस इफ़ेक्ट। (इस सर्व-रक्षा के बीच मुख्य मुद्दा केंद्रबिंदु बने रहना चाहिए, है ना?) ठीक वैसे ही जैसे नोटबंदी का उद्घोष ‘नकली करेंसी पे विराम’ के साथ, फिर दूसरे दिन काले धन पर लगाम, फिर आतंक पे रोक, कैशलेस इकॉनमी, लेसकैश इकॉनमी/डिजिटल लेनदेन और…… अरे, अब तो याद भी नहीं कितने गोलपोस्ट बदल डाले आपने!

किसी ने मुझसे कहा कि, “बूढ़ी गायें ज़्यादा नहीं खातीं। वो घास पर आश्रित रह सकती हैं।”
ये क्या तुक है? देहात गावों में जानवर स्वयं घास इसलिए चरते हैं, क्योंकि हमारे यहाँ उनके स्टेपल डाइट के नाम घास ही होते हैं। दुनिया भर के फार्म्स में भूसे, चारे, चोकर और खल्ली की अच्छी गुणवत्ता होती है। कैनेडा में डेरी फार्म पूरे देश के सकल घरेलू उत्पाद, जीडीपी, में 18 बिलियन डॉलर का योगदान देती है। लगभग 2 लाख से ज़्यादा नौकरियां डेरी सेक्टर में होते हैं। क्या हमारे इतने चिल्ल-पों के बजाय इधर ध्यान नहीं दे सकते?

भारत में नवम्बर-दिसम्बर के महीने में घासों में नमी होती है। जानवरों को पोषण कम और पानी ज़्यादा मिलता है। अमेरिका और यूरोप में ‘ग्रेजिंग मैनेजमेंट’ के तहत किसानों को प्रशिक्षण दिया जाता है कि फार्म्स में उत्तम गुणवत्ता वाले घास कैसे उपजाये जाएँ, ताकि गायों को उचित मात्रा में पोषण मिलता रहे। इसके अलावा वहाँ मवेशियों के रहने का प्रबंध विश्व-स्तरीय होता है।

ये देश आस्था, धर्म और समाज के त्रिकोण में फंसा हुआ है। एक तरफ़ तो लोग गंगा नदी में साबुन-शैम्पू से स्नान करते हैं, कपड़े धोते हैं, विसर्जन करते हैं, उसमें नालों के पानी से लेकर मल-मूत्र सब प्रवाहित करते हैं, वहीं दूसरी ओर उसे माँ मानकर उसकी पूजा भी करते हैं। एक तरफ़ तो गायों को पूजा जाता है, दूसरी तरफ़ हम दुनिया के बड़े मांस-निर्यातकों में से एक हैं। जिस तरह गंगा नदी को आस्था से जोड़कर उसकी मट्टी-पलीद की गई है, उसी तरह गायों को एक ख़ास धर्म और आस्था के नाम पर यूज़ किया गया है। अगर आपको मांस-निषेध राष्ट्र बनाना है तो लोकतंत्र का क्या मतलब है? राष्ट्रवाद के नाम पर कहीं न कहीं हम अपनी पंथनिरपेक्षता को धूमिल कर रहे हैं। लोकतंत्र में ‘चॉइस’ यानी कि पसंद को प्राथमिकता देनी चाहिए। ‘मल्टी-कल्चरल राज्य-राष्ट्र, नेशन- स्टेट, थ्योरी’ के तहत आप समाज में इस तरह के बैन नहीं कर सकते। आप एक ही देश में जल्लीकट्टू और बूचड़खाना पर दोहरा मापदंड नहीं अपना सकते।

 

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