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आखिर UP के संतराम पर क्यों मेहरवान है उत्तराखंड सरकार ?

लोक निर्माण विभाग में उत्तराखंड के कई अफसरों के पास मामूली काम है, लेकिन उत्तराखंड में उत्तर प्रदेश से प्रतिनियुक्ति पर आए अफसर मौज कर रहे हैं। लोक निर्माण विभाग के अफसर इससे खासे रोष में हैं, किंतु शासन का संरक्षण होने से कोई खुलकर विरोध नहीं कर पा रहा है। संतराम उत्तर प्रदेश में अधीक्षण अभियंता के पद पर तैनात थे। वर्ष २०१४ में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत उन्हें प्रतिनियुक्ति पर उत्तराखंड ले आए। तब हरीश रावत ने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को पत्र लिखा था कि संतराम एक योग्य और कर्मठ अधिकारी है और उनकी सेवाओं की उत्तराखंड सरकार को आवश्यकता है, इसलिए उन्हें प्रतिनियुक्ति पर उत्तराखंड भेज दिया जाए।

हरीश रावत २ फरवरी २०१४ को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने और ८ फरवरी २०१४ को उन्होंने उत्तर प्रदेश को पत्र लिख संतराम को बुला लिया था।
संतराम को उत्तराखंड में सीधे वल्र्ड बैंक की मदद से आपदा निर्माण कार्यों का चीफ इंजीनियर बना दिया गया। इसी दौरान वर्ष २०१५ में सुप्रीम कोर्ट के पदोन्नति में आरक्षण के आदेश के अनुपालन में संतराम को एक पद पदावनत करके अधिशासी अभियंता बना दिया गया। उत्तर प्रदेश ने संतराम को एक पद पदावनत कर दिया, किंतु उत्तराखंड में इस आदेश का अनुपालन नहीं किया गया। इस पर उत्तर प्रदेश सरकार ने संतराम की प्रतिनियुक्ति समाप्त करके उन्हें वापस भेजने के लिए उत्तराखंड सरकार को ४.९.२०१५ को पत्र लिखा, किंतु तब सरकार ने यह मांग अनसुनी कर दी।

उत्तर प्रदेश सरकार ने उत्तराखंड के मुख्य अभियंता स्तर-१ देहरादून को भी पत्र लिखकर संतराम को अधीक्षण अभियंता से पदावनत कर अधिशासी अभियंता के पद उत्तर प्रदेश के प्रमुख अभियंता कार्यालय के लिए कार्यमुक्त कर दिया जाए। संतराम कहते हैं कि उन्हें प्रतिनियुक्ति पर भेजा गया है और जब तक उत्तराखंड सरकार नहीं चाहेगी, उन्हें उत्तर प्रदेश नहीं भेजा जा सकता। उत्तर प्रदेश के प्रमुख अभियंता ने ४ सितंबर २०१५ को उत्तराखंड शासन में पीडब्ल्यूडी के प्रमुख सचिव को भी पत्र लिखकर संतराम की वापसी के लिए अनुरोध किया था, किंतु इस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। संतराम के खिलाफ कई अधिकारियों ने उन्हें हटाने की कोशिश की, किंतु असफल रहे। इस बीच १७ मार्च २०१६ में राष्ट्रपति शासन लागू हो जाने के बाद राज्यपाल ने संतराम को कार्यमुक्त करने की फाइल पर राज्यपाल ने अनुमोदन दे दिया था, किंतु २७ मई को फिर से कांग्रेस सरकार में यह फाइल ठंडे बस्ते में चली गई। इस बीच संतराम पदावनति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चले गए और फैसला उनके पक्ष में आया।

उत्तराखंड में यह विभाग अरविंद सिंह ह्यांकी के पास है। ह्यांकी पूर्व सीएम रावत के चहेते अफसर हैं। उनके पास वर्तमान में पीडब्ल्यूडी कार्मिक और विजिलेंस आदि विभाग भी है। इसलिए कोई अधिकारी कुछ खुलकर कहने को तैयार नहीं है कि कहीं उनके खिलाफ विजिलेंस जांच या विभागीय कार्रवाई जैसा कुछ न हो जाए। जिस आपदा रिकवरी परियोजना में संतराम कार्यरत है। उसमें अधिकांश अधिकारी कर्मचारी अत्यधिक वेतन पर नियुक्त किए गए हैं। पांच टीम लीडरों में प्रत्येक को ३ लाख वेतन और अन्य गाड़ी आदि खर्चे मिलते हैं। १३ रेजीडेंट इंजीनियर हंै, जिनका वेतन ढाई लाख प्रतिमाह है। लगभग ६५ हजार के मासिक वेतन पर ४० साइट सुपरवाइजर तैनात हैं। इन परियोजनाओं में कार्यरत सभी कंपनियां इंटरनेशनल हैं और कंसलटेंसी के नाम पर उन्हें रुपए का भुगतान किया जा रहा है। आपदा निर्माण के कार्यों में इस तरह के अत्यधिक भुगतान पर हमेशा से सवाल खड़े होते रहे हैं। सवाल यह है कि क्या नई सरकार में भी यह बेतहाशा खर्चे और महंगे अफसरों से प्रेमालाप जारी रहेगा या सरकार कुछ नया करेगी।

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