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आखिर किसके भरोसे इंतजार करें कांग्रेसी विधायक!

!!सुरेंद्र किशोर, राजनीतिक विश्लेषक!!

हाल में देश के तीन राज्यों में विधानसभा के चार उपचुनाव हुए. इनमें से कांग्रेस को कोई सीट नहीं मिली. हालांकि संतोष की बात यह रही कि कांग्रेस को दिल्ली में इस बार पहले की अपेक्षा अधिक वोट मिले. दिल्ली में आप की विजय हुई. भाजपा दूसरे स्थान पर रही. गोवा की दोनों सीटें भाजपा को मिलीं. उधर, आंध्र प्रदेश की टीडीपी यानी भाजपा के सहयोगी दल को विजय मिली. कहां तो कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी कांग्रेस को मजबूत बनाने की कोशिश में अपना समय शक्ति लगाते, वहीं इस विपरीत राजनीतिक परिस्थिति के बावजूद हाल में राहुल गांधी एक बार फिर विदेश दौरे पर चले गये. राजद की हाल की महत्वपूर्ण पटना रैली में भी वह शामिल नहीं हुए.

शामिल होते तो स्थानीय कांग्रेसियों का उत्साह बढ़ता. अब सवाल है कि बिहार के कांग्रेसी विधायक किसके भरोसे और कितने दिनों तक पार्टी में बने रहेंगे? सन 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में तो एक मजबूत महागठबंधन की छत्रछाया के कारण कांग्रेस को 27 सीटें मिल गयीं. पर, अगले चुनाव में क्या होगा? आज जब अधिकतर नेता अपने और अपने परिजनों के भविष्य के बारे में ही सोचने में मशगूल रहते हैं तो कुछ कांग्रेसी विधायक अपनी सीटें बचाने के लिए सोच रहे हैं तो उसमें कोई अजूबी बात नहीं है. याद रहे कि राजनीतिक हलकों में इन दिनों इस बात की चर्चा जारी है कि कुछ कांग्रेसी विधायक पार्टी छोड़ सकते हैं. पता नहीं इस बात में कितनी सच्चाई है! पर आग के बिना धुआं भला कहां उठता है? कांग्रेस के भविष्य को लेकर कुछ वैसे लोग भी चिंतित नजर आते हैं जो कांग्रेस में नहीं हैं, पर चाहते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत विपक्ष रहना चाहिए. क्या कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व अपनी पुरानी नीतियां और कार्य नीतियां बदल कर वैसे जनतंत्र प्रेमियों की उम्मीद पूरी करेगा? पता नहीं.

आम लोगों की चिंता : आम लोगों की सोच और चिंता के बारे में कुछ बातें. उन आम लोगों की बातें जो न तो दलीय राजनीति में हैं और न ही जिनके दिल-दिमाग किसी राजनीतिक विचारधारा के पिंजड़े में बंद है. ऐसे अनेक लोगों से बातचीत से मुख्यतः तीन बातें सामने आयीं. उनकी मुख्य चिंता यह है कि देश के अधिकतर नेतागण अपने धन और वंश को बढ़ाने के काम में लगे हुए हैं. इनमें गैर राजग दलों के नेता अधिक हैं. उनकी दूसरी चिंता यह है कि सरकारी खजाने की लूट को रोकने में अधिकतर सत्ताधारी नेता व अफसर विफल हैं. तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण चिंता यह लगी हुई है कि इस देश के भीतरी और बाहरी दुश्मनों के खिलाफ कारगर कार्रवाई नहीं हो रही है. आम लोग की इस सोच-चिंता से राजनीतिक दलों और बुद्धिजीवियों की सोच-चिंता का कितना तालमेल है, यह बात आज वे सारे लोग आसानी से समझ सकते हैं जो प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को ध्यान से पढ़ते-देखते-सुनते हैं.

कोई चारा न था शरद यादव के पास : शरद यादव ने लालू प्रसाद को गले लगा कर वही किया जो काम चुनाव लड़ने वाला कोई भी नेता करता है. लालू परिवार के कुछ सदस्यों पर जांच एजेंसियों की ताजा कार्रवाइयों के बाद राजद का एम-वाई समर्थन और ठोस हो गया लगता है. इसलिए जदयू में रहकर शरद यादव के लिए इस एमवाई वोट बैंक से पार पाना आसान नहीं होता. आज की राजनीति में कोई नेता पहले अपनी सीट देखता है, उसके बाद ही अपनी पार्टी और फिर अपना कोई पिछला वचन या वादा. शरद यादव भी वही कर रहे हैं. यदि उनके किसी परिजन को अगला चुनाव लड़ना है, तब तो उनके लिए यह अधिक जरूरी है कि वे लालू प्रसाद के एम-वाई का लाभ उठाएं. वैसे यहां एक बात कहनी जरूरी है कि एमवाई वोट बैंक का लाभ राजद और शरद यादव को बिहार में लोकसभा के इने-गिने चुनाव क्षेत्रों में ही मिल सकता है. आप एमवाई को जितना ठोस बनाएंगे, उसकी प्रतिक्रिया अन्य समुदायों में उतनी ही अधिक होगी. न्यूटन का सिद्धांत कभी-कभी राजनीति में भी लागू हो जाता है.

नक्सली हिंसा में कमी का सरकारी दावा: गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि नक्सली हिंसा की घटनाओं में 53 प्रतिशत की कमी हुई है. साथ ही उनके अनुसार इस तरह की हिंसा में मृतकों की संख्या में 72 प्रतिशत कमी आयी है. यह तो अच्छी खबर है. सरकार को इस स्थिति का तुरंत लाभ उठा लेना चाहिए. पिछली केंद्र सरकार कहती रही कि चूंकि नक्सली अपनी हिंसक कार्रवाइयों के जरिये एक बहुत बड़े क्षेत्र में विकास ही नहीं करने देते, इसलिए वे क्षेत्र अविकसित हैं. अब जब नक्सली हिंसा में भारी कमी आयी है तब तो इससे लगता है कि नक्सलियों का प्रभाव भी थोड़ा घटा है. फिर तो सरकार अब विकास कार्य कर ही सकती है. अनेक जानकार लोग बताते हैं कि अविकसित इलाकों में नक्सलियों को अपनी जड़ें जमाने में सुविधा होती है. यदि सचमुच नक्सलियों का असर घट रहा है तो सरकारी विकास कार्यों में तेजी आनी ही चाहिए. यदि तेजी नहीं आयेगी तो माना जायेगा कि सरकार का यह दावा सही नहीं है. याद रहे कि 10 राज्यों के 106 जिलों में वाम अतिवादी सक्रिय हैं. इनमें से 35 जिलों में उनका काफी असर है. यदि केंद्र की भाजपानीत सरकार यह समझती है कि नक्सली हिंसा सिर्फ कानून-व्यवस्था की समस्या है, तो उसे अपने पुराने विचार को अब बदल लेना चाहिए.

एक भूली-बिसरी याद : साठ के दशक की बात है. एक दिग्गज पूर्व सत्ताधारी नेता के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच चल रही थी. नेता जी के पास जायज आय से अधिक धनराशि पायी गयी थी. उनके बैंक खाते में 1966 में करीब 6 लाख रुपये पाये गये थे, जबकि 1946 में सिर्फ 6 सौ रुपये ही थे. जांच आयोग ने उनसे पूछा कि आपके पास इतने पैसे कहां से आए? उन्होंने कहा कि जिस सरकारी बंगले में मैं रहता था, उसके अहाते में मैंने धान की खेती की थी. उसी धान को बेच कर पैसे आये. पूरक सवाल यह था कि उस उपज का आधा हिस्सा आपने सरकारी खजाने में जमा कराया था? इस पर वे कोई जवाब नहीं दे पाये. उन पर कई अन्य आरोप भी थे. याद रहे कि जांच आयोग ने 1970 में उन्हें भ्रष्टाचार का दोषी पाया था. सरकारी बंगलों के अहातेे में उपज के इस्तेमाल का अब क्या नियम है? इसकी जानकारी इन पंक्तियों के लेखक को नहीं है. पर यदि नियम पुराना ही है तो बड़े-बड़े बंगलों में रहने वालों को इस नियम की नोटिस लेनी चाहिए. अन्यथा कभी ….?

और अंत में : बात पुरानी है. बिहार विधान परिषद की लॉबी में एक स्वतंत्रता सेनानी से मेरी बात हो रही थी. वह धनवान व्यक्ति थे. एमएलसी भी थे. अब नहीं रहे. सरल हृदय के व्यक्ति लगे. कुछ भी छिपाते नहीं थे. उनके परिवार के बारे में बात चली तो उन्होंने बताया कि मेरी कोई संतान नहीं. मैंने अपनी पूरी संपत्ति अपने दल को दे देने का निर्णय कर लिया है. ऐसा कहते समय उनके चेहरे पर ऐसा कोई भाव नहीं था, जिससे यह लगे कि उनसे जबर्दस्ती संपत्ति ली जा रही है. मुझे तब अच्छा लगा था कि एक व्यक्ति अपनी पार्टी के प्रति इतना समर्पित है. पर अब मेरे मन में सवाल उठ रहा है कि आखिर बात क्या थी!

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