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कांग्रेस के लिए गुजरात में जाति कार्ड संजीवनी या मुसीबत?

गुजरात विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान हो चुका है. गुजरात के सियासी रणभूमि में कांग्रेस और बीजेपी के बीच तलवारें खिच चुकी हैं. बीजेपी लगातार छठी बार राज्य की सत्ता पर काबिज होने की जद्दोजहद में लगी है. कांग्रेस जातिय समीकरण के जरिए 22 साल के सत्ता के वनवास को तोड़ना चाहती है. गुजरात में जाति कार्ड कांग्रेस के लिए संजीवनी बनेगा या फिर मुसीबत का सबब, ये तो 18 दिसंबर को ही पता चलेगा?

गुजरात का जातिय समीकरण

गुजरात की सियासत में  करीब 52 फीसदी अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) बेताज बादशाह है. राज्य में 146 जातियां ओबीसी की कटेगरी में आती हैं. इसके अलावा 16 फीसदी पाटीदार समुदाय (सामान्य जाति में आता है) को गुजरात का किेंगमेकर कहा जाता है. गुजरात में 7 फीसदी दलित, 11 फीसदी आदिवासी, 9 फीसदी मुस्लिम और 5 फीसदी में सामान्य जाति के ब्राह्मण, बनिया और अन्य जातियां शामिल हैं.

बिहार के जाति फॉर्मूले पर कांग्रेस

बीजेपी के लिए सबसे मुश्किल बात यह है कि जातिगत राजनीति उसे रास नहीं आती है. बिहार का विधानसभा चुनाव इसका उदाहारण है. आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने बिहार विधानसभा चुनाव को जाति के इर्द-गिर्द सिमटाकर बीजेपी को धराशाही कर दिया था. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी बिहार के जाति समीकरण के फार्मूले को गुजरात के सियासी रण में अजमाने उतरे हैं.

गुजरात में कांग्रेस का ओबीसी कार्ड

कांग्रेस ने गुजरात की जंग तो जीतने के लिए जाति फॉर्मूला बनाया है. गुजरात के ओबीसी समुदाय को साधने के लिए कांग्रेस ने पहले राज्य के प्रभारी की कमान ओबीसी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले अशोक गहलोत को दी. गहलोत सैनी समुदाय से हैं और वह पढ़ोसी प्रदेश राजस्थान से हैं. सैनी समुदाय की अच्छी खासी आबादी गुजरात में भी है. इसके अलावा उन्होंने ओबीसी समुदाय के भरत सिंह सोलंकी को प्रदेश अध्यक्ष की कमान दी गई.

ओबीसी के युवा चेहरा माने जाने वाले अल्पेश ठाकोर को भी राहुल गांधी ने गले लगा लिया है. इसके अलावा पाटीदार को साथ जोड़ने के लिए हार्दिक पटेल और दलित मतों साधने के लिए जिग्नेश मेवानी को कांग्रेस से जोड़ने की कवायद की जा रही है.

पुराने नक्शेकदम पर कांग्रेस

गुजरात की सियासत में कांग्रेस पहली बार जातिय समीकरण के सहारे नहीं उतर रही है. इससे पहले भी कांग्रेस जाति समीकरण के फॉर्मूले को बनाकर गुजरात के सत्ता के सिंहासन पर काबिज होती रही है. 1985 में भी कांग्रेस इस फॉर्मूलों को अपनाकर चुनावी जीत हासिल कर चुकी है. लेकिन ओबीसी समुदाय को जब गुजरात में आरक्षण दिया गया तो पाटीदार समुदाय कांग्रेस से जुदा हो गया था. इसके बाद कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री माधव सिंह सोलंकी ने सियासी फॉर्मूला बनाया था, जिसमें गुजरात के ओबीसी, मुस्लिम, दलित और आदिवासी शामिल थे. इन जातियों के गठजो़ड़ से गुजरात में ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी. लेकिन वक्त और हालात ऐसे बने कि कांग्रेस के इस फॉर्मूले में बीजेपी ने सेंधमारी करके सत्ता छीन लिया.

बीजेपी के पास मोदी और कोविंद

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2014 में गुजरात के सीएम से देश के पीएम बन जाने के बाद बीजेपी का जातिय समीकरण डगमगाया है. यही वजह है कि कांग्रेस अपने पुराने जाति फॉर्मूले पर लौटती नजर आ रही है. लेकिन उसके लिए सियासी फॉर्मूला सेट करना आसान भी नहीं है. बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी पिछड़े समुदाय से आते हैं. बीजेपी मोदी के ओबीसी कार्ड को भी कैश कराने में जुटी है. इसके अलावा हाल ही में राष्ट्रपति बने रामनाथ कोविंद की जाति कोली समुदाय को भी बीजेपी अपने पाले में लाने की जुगत में है जो कि गुजरात में ओबीसी समुदाय में आता है.

ओबीसी-पाटीदार को एक साथ साधना कांग्रेस के लिए टेढ़ी खीर

कांग्रेस गुजरात में ओबीसी और पाटीदार दोनों को एक साथ साधने में जुटी है. दोनों को एक साथ लाना कांग्रेस के लिए आसान नहीं है. हालांकि बीजेपी ने ओबीसी और पाटीदार को एक साथ हिंदुत्व के नाम पर जोड़कर रखा. पर कांग्रेस उन्हें जाति के नाम पर एक साथ लाने की कवायद कर रह है, जो कांग्रेस के लिए मुसीबत का सबब बन सकता है.

कांग्रेस पाटीदार समुदाय की शर्तों को मानती है, तो ओबीसी के छिटकने का खतरा बढ़ जाएगा. कांग्रेस ऐसे में कांग्रेस 52 फीसदी ओबीसी को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाएगा. क्योंकि पटेल आरक्षण की मांग जिस समय उठी थी, उसी समय ओबीसी समुदाय ने भी पाटीदारों के मांग के खिलाफ आवाज बुलंद की थी. ऐसे में कांग्रेस के लिए गुजरात में जातिय समीकरण संजीवनी बनेगा या फिर मुसीबत का सबब? इसपर सबकी निगाह होगी.

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