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Cold war-between-Trivendra-Singh-Rawat-and-Satpal-maharaj

कुछ तो गड़बड़ है महाराज!

भूपेश पंत, एनटीआई न्यूज उत्तराखंड।

पूर्व सांसद और केंद्रीय मंत्री रहे उत्तराखंड के मौजूदा पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज की नाराजगी की खबरें इन दिनों सत्ता के गलियारों में चटखारे लेकर कही और सुनी जा रही हैं. पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस से बीजेपी में शामिल हुए सतपाल महाराज का कद राज्य की सियासत में काफी बड़ा माना जाता रहा है. लेकिन दो दशक पहले ही केंद्रीय मंत्री रह चुके महाराज सूबे की मौजूदा सियासत में हाशिये पर खिसकते नज़र आ रहे हैं. यही वजह है कि कैबिनेट में बार-बार उनकी गैरमौजूदगी ने उनकी नाराजगी के कयासों को जम कर हवा दी. महाराज की ये नाराजगी भी बीजेपी से कम और मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से ज्यादा नज़र आ रही है.

पर्यटन और तीर्थाटन मंत्री सतपाल महाराज के साथ लगातार हुई कुछ घटनाओं से लगता है कि कैबिनेट में दूसरे नंबर का दर्जा मिलना तो दूर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत ही अंदरखाने उन्हें बौना साबित करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने सतपाल महाराज की पत्नी और पूर्व मंत्री अमृता रावत की जगह उन्हें विधायक का चुनाव लड़ाने का फैसला किया. इससे उत्तराखंड के भावी मुख्यमंत्री के तौर पर उनकी ताजपोशी की अटकलें लगने लगीं. वरिष्ठ नेता के उत्साहित समर्थकों ने भी इन्हें और हवा दी. बताया जाता है कि महाराज ने मुख्यमंत्री पद के लिए लॉबिंग भी की थी लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली. त्रिवेंद्र सरकार में मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार रहे प्रकाश पंत की मौजूदगी ने उनसे दूसरे नंबर के मंत्री का दर्जा भी छीन लिया. महत्वपूर्ण विभाग ना मिलने के कारण सियासी गलियारों में इसे महाराज के डिमोशन के तौर पर देखा गया. तभी मान लिया गया था कि मंत्रिमंडल में सबसे अनुभवी नेता सतपाल महाराज और सीएम त्रिवेंद्र के बीच तलवारें खिंच चुकी हैं. दोनों के बीच दूरियां इतनी बढ़ गई हैं कि पिछली तीन कैबिनेट बैठकों में महाराज शामिल तक नहीं हुए.

रावत सरकार के कामकाज और फैसले लेने की उसकी रफ्तार पर कुछ कहने के लिये भले ही अभी ज्यादा वक्त नहीं हुआ है लेकिन इतने कम समय में सरकार के भीतरखाने शुरू हुई ये जंग पूत के पांव पालने में दिखाने के लिये काफी है. अपनी उपेक्षा को लेकर सरकार के कुछ मंत्रियों और सत्ताधारी विधायकों की नाराजगी गाहे बगाहे मीडिया की सुर्खियों में आ ही जाती है. कांग्रेस से बीजेपी में आये एक और मंत्री हरक सिंह रावत इशारों इशारों में सीएम पर तंज कस चुके हैं. वन एवं पर्यावरण मंत्री हरक सिंह रावत को भी मुख्यमंत्री पद की होड़ में शामिल माना जा रहा था. और अब सतपाल महाराज अपनी उपेक्षा से आहत हैं.

पर्यटन और तीर्थाटन मंत्री सतपाल महाराज को नजरअंदाज किए जाने की शुरुआत सरकार बनने के एक महीने बाद ही देखने को मिल गई थी. अक्षय तृतीया पर यमुनोत्री और गंगोत्री के कपाट खुलने से एक दिन पहले 27 अप्रैल को ऋषिकेश में चारधाम यात्रा का विधिवत शुभारंभ हुआ. मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने 17 बसों का जत्था यमुनोत्री और गंगोत्री के लिए रवाना किया. मुख्यमंत्री और सतपाल महाराज के बीच बढ़ती दूरियां तब साफ दिखीं जब तीर्थाटन और पर्यटन से जुड़े इस कार्यक्रम से विभागीय मंत्री ही नदारद थे. मुख्यमंत्री के साथ हंस कल्चरल फाउंडेशन के प्रणेता भोले जी महाराज और मंगला माता ने चारधाम यात्रा का शुभारंभ किया। महाराज को दरकिनार कर उनके छोटे भाई भोले महाराज को अतिथि बनाने को उनका कद घटाने की मुख्यमंत्री की रणनीति का हिस्सा माना गया. सूबे की जागरूक जनता बखूबी जानती है कि भाई होने के बावजूद सतपाल महाराज और भोले महाराज के रिश्तों में खटास है. इसकी पुष्टि इससे भी होती है कि जब सतपाल महराज कांग्रेस में थे तब भोले महाराज बीजेपी के करीब थे, लेकिन जब महाराज कांग्रेस को छोड़ बीजेपी में आए तो भोले महाराज उससे दूरियां बनाकर कांग्रेस के करीब हो गए. भोले महाराज कई अन्य कार्यक्रमों में भी मुख्यमंत्री के साथ एक मंच पर नजर आए हैं जिनमें सरस्वती शिशु मंदिर और असम में हुआ एक सामूहिक विवाह कार्यक्रम शामिल हैं. अधिकतर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना भी यही है कि भोले महाराज के करीबी होने के कारण ही मुख्यमंत्री ने सतपाल महाराज को दूर किया है.

CM-with-Bhole Maharaj-Mata Mangala

सतपाल महाराज को नजरअंदाज करने की यह पहली और अंतिम घटना नहीं है बल्कि एक सप्ताह बाद एक बार फिर से ऐसी ही घटना हुई. केदारनाथ के कपाट खुलने के बाद 13 मई को दो केंद्रीय मंत्री बद्रीनाथ में दो महत्वपूर्ण योजनाओं की नींव रखने के लिये मौजूद थे. जिनमें से एक योजना तीर्थाटन और पर्यटन के लिहाज से ही नहीं सामरिक दृष्टि से भी अहम है. तेरह मई को बद्रीनाथ में रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने चारधाम रेल लाइन के फाइनल सर्वे का शिलान्यास किया. रेल राज्य मंत्री रहे सतपाल महाराज का ऋषिकेश- कर्णप्रयाग रेल लाइन से भावनात्मक लगाव सब जानते हैं. लेकिन चारधाम को रेल लाइन से जोड़ने वाले सर्किट के फाइनल सर्वे के शिलान्यास पर उनका ना होना हैरान करने वाले था. तीर्थाटन मंत्री के नाते भी प्रोटोकॉल के तहत सतपाल महाराज को कार्यक्रम में आमंत्रित किया जाना चाहिये था लेकिन ऐसा नहीं हुआ. जबकि उसी दिन बद्रीनाथ में कृषि से संबंधित एक और कार्यक्रम हुआ जिसमें जोशीमठ के कोठी में कृषि विज्ञान केंद्र का शिलान्यास किया गया. केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने इसकी नींव रखी. लेकिन इसमें प्रोटोकॉल का ध्यान रखते हुए प्रदेश के कृषि मंत्री सुबोध उनियाल को बाकायदा आमंत्रित किया गया. सुबोध उनियाल ने कार्यक्रम में शिरकत भी की लेकिन सतपाल महाराज की इस उपेक्षा से उनके समर्थकों में नाराजगी बढ़नी स्वाभाविक है. हालांकि इस सब पर अभी तक सतपाल महाराज ने अपनी कोई प्रतिक्रियाएं नहीं दी हैं, लेकिन बताया जाता है कि महाराज नाखुश हैं और सही वक्त का इंतज़ार कर रहे हैं.

सरकार के बेहद विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक गंगा में खनन के खिलाफ हरिद्वार में मातृसदन के संतों को मनाने के लिये सीएम बतौर आध्यात्मिक गुरु सतपाल महाराज को आगे करना चाहते थे लेकिन महाराज ने इसका जिम्मा लेने से साफ इंकार कर दिया और 30 मई को दिल्ली पहुंच गये.

महाराज अपनी उपेक्षा पर बेशक अभी तक कुछ ना बोले हों लेकिन मुख्यमंत्री ने महाराज से संबंधित एक सवाल पर जो प्रतिक्रिया दी उससे साफ है कि सरकार में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. मीडिया से मुखातिब सीएम ने चारधाम यात्रा की अव्यवस्थाओं और सुविधाओं की कमी पर सवालों की बौछार के बीच महाराज के बारे में पूछे जाने पर कहा कि वो कहां हैं ये उनसे ही पूछ लीजिये. पाण्डुकेश्वर में भूस्खलन के बाद भी पर्यटन मंत्री की बजाय सरकार के प्रवक्ता कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक ने मोर्चा संभाला. पिछले दिनों एक और घटना ने सतपाल महाराज को नीचा दिखाने का काम किया. उन्हें एक बार नहीं दो-दो बार गंतव्य पर पहुंचाए बिना हेलीकॉप्टर वापस लौट गया और महाराज कुछ नहीं कर सके. पहली बार महाराज को लाटू देवता के कपाट खुलने के दिन वाण गांव जाना था जबकि दूसरी बार 23 मई को उन्हें ट्रैक ऑफ द ईयर के समापन समारोह में द्रोणागिरी जाना था. लेकिन पायलट उन्हें जोशीमठ में उतारकर वापस चला गया. हालांकि बताया जाता है कि हैलिकॉप्टर द्रोणागिरी होते हुए ही देहरादून वापस हुआ. जानकारों का कहना है कि मंत्री के कार्यालय से पंद्रह दिन पहले ही कार्यक्रम की योजना भेजी जाती है. इस दौरान मंत्री का प्रोटोकॉल एवं अन्य औपचारिकताएं पूरी करनी होती हैं लेकिन सतपाल महाराज के मामले में ऐसा कुछ नहीं किया गया. यहां तक कि उन्हें तकनीकी विशेषज्ञों की सलाह मानने के लिये सीएम की नसीहत भी सुननी पड़ी.

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