असम शरणार्थियों के सामने नागरिकता का संकट

वर्ष 2017 के अंतिम दिन एनसीआर का पहला मसविदा आम जनता के बीच रखा गया. कुल 3.29 करोड़ लोगों ने नागरिकता हासिल करने के लिए आवेदन किया था, जिसमें से केवल 1.9 करोड़ लोगों को ही पहले चरण में शामिल किया गया है. मतलब इस सूची में शामिल होने से रह गए लोगों में नागरिकता पाने की बेचैनी बढ़ गई है. इनका भविष्य अधर में लटका हुआ है.

शेष भारत और बांग्लादेश से जुड़ा असम का दक्षिणी भाग असमंजस की लहरों में तैर रहा है. इस असमंजस को वही समझ सकता है, जिसने बड़ी मेहनत से घर बनाया हो और उसे आग की लपटों में गंवा बैठा हो.

देशों की ज़मीनी सीमाओं पर मौजूद दुनिया के सारे क्षेत्र एक अजीब सी असुरक्षा की स्थिति में रहने के लिये बाध्य होते हैं. सीमाएं कृत्रिम होती हैं जो जीविका और बेहतर जीवन की चाहत में स्वाभाविक रूप से बनती-बिगड़ती रहती हैं. लोगों की आर-पार आवाजाही तमाम बाधाओं के बावजूद जारी रहती है. यह हालत देश के अन्दर हो तो सरकारों को कोई समस्या नहीं होती है.

कहने का मतलब यह है की भले पूरा बिहार, दिल्ली या मुम्बई में बस जाए, इसका विरोध होने पर इसे क्षेत्रवाद की संकीर्ण मानसिकता बताकर नज़रअंदाज कर दिया जायेगा. लेकिन राष्ट्रीय सीमाओं को ऐसी सहूलियत हासिल नहीं है. वह देश की होती है और अपना अधिकार कॉलर पकड़कर मांगने में यकीन रखती हैं.

आज़ादी के पहले और बाद में भी असम अपने आजू-बाजू के क्षेत्रों के लिए जीविका और अच्छे जीवन स्तर के लिए बेहतर जगह रहा है. भारत में बंगाल, झारखंड, बिहार और छत्तीसगढ़ के प्रवासियों ने भी असम में रहकर जीना चुना तो बांग्लादेश की अशांत स्थितियां असम से सटे बांग्लादेशियों को हमेशा असम में धकेलती रहीं. लेकिन आवागमन के इस बहाव ने असम की मूल जनांकीय ढांचे को बड़े पैमाने पर बदल दिया है.

साल 1991 से 2001 के बीच असमिया भाषा बोलने वाले लोगों की संख्या 58 फीसदी से कम होकर 48 प्रतिशत रह गयी. बंगाली बोलने वाले लोगों की संख्या 21 फीसदी से बढ़कर 28 फीसदी हो गयी. साल 2011 की जनगणना के भाषाई आंकड़े अभी प्रकाशित नहीं हुए हैं लेकिन रुझानों के आधार पर कहा जा सकता है की असमिया भाषी वर्तमान में तकरीबन 40 फीसदी हैं और बंगाली भाषी तकरीबन एक तिहाई.

आज़ादी के समय असम में मुस्लिमों की आबादी तकरीबन 25 फीसदी थी जो 2011 में बढ़कर 34 फीसदी हो गयी है. प्रवास और आप्रवास ने मिलकर इलाके का जनांकीय ढांचें में भारी बदलाव किया है.

यही मूल समस्या है. असम हर जगह जैसी जगह नहीं हैं कि इसे सहन कर लिया जाए. यह दो देशों के बीच मौजूद भूमि पर अपनी जिंदगी जीता है. इसलिए प्रवासियों को लेकर असम की राजनीति आज़ादी के बाद से ही उफनती रही है. असम गण परिषद की स्थापना में आप्रवास और बांग्लादेशी विस्थापन का मुद्दा ही सबसे अहम था.

असम की राजनीति और समाज में साल 1985 का असम समझौता प्रवासियों से जुड़े एक प्रावधान के लिए मील का पत्थर है. इस समझौते के तहत 25 मार्च, 1971 के बाद असम में आये शरणार्थियों को उनके देश वापस भेजे जाने का प्रावधान है. इसी प्रवधान के आधार पर राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर भी काम कर रहा है. असम के मूल नागरिक के तौर पर एनसीआर उन्हें ही शामिल कर रही है जो साल 1971 से पहले असम से जुड़ी अपनी पहचान बताने में सफल हो पा रहे हैं.

यह तरीका सही भी है लेकिन अज़ीब भी है. अगर व्यावहारिकता के धरातल पर आकर सोचें तो यह साफ़ दिखता है कि प्रवासी, मूल नागरिकों के संसाधनों में सेंध लगाते हैं. इस बदलाव से सबसे अधिक परेशान मूलनिवासियों का सबसे निचला तबका होता है जो दैनिक, पाक्षिक और मासिक मजदूरी पर अपनी जिंदगी गुजारता है. इसके मन में प्रवासियों को लेकर नफ़रत पनपने लगती है. बाहरी लोगों के प्रति एक तिरस्कार और नकार का भाव होना आम बात है. यहीं से अपने-पराए की भावना को बल मिलता है. स्थानीय निवासी राजनीति से यह अपेक्षा रखता है कि वह उसकी परेशानियों का समाधान करे. देश के भीतर तो यह राजनीतिक मुद्दा नहीं बन पाता लेकिन देश की सीमाओं पर मौजूद ऐसी स्थितियां राजनीति के लिए चुनौती और अवसर दोनों बनती हैं.

इसी भावना के ऊपर कांग्रेस और भाजपा ने असम में लंबे समय से जमकर राजनीति की है. साम्प्रदायिकता के आधार पर राजनीति करने वालों के लिए तो यह उपजाऊ ज़मीन है. विस्थापितों की समस्या के साथ अलगाव की राजनीति करना आसान हो जाता है.

नागरिकता अधिनियम-1955 में संशोधन का प्रस्ताव है. इस संशोधन के एक प्रावधान का संदेश यह है कि भविष्य में हिन्दू, बौद्ध और जैन समुदाय से जुड़े लोगों को छोड़कर भारत के पड़ोसी देश से जुड़े किसी व्यक्ति को भारत की नागरिकता हासिल नहीं होगी. इसका सीधा अर्थ यह हुआ की मुस्लिम बहुलता वाले पड़ोसी देश के व्यक्ति भारत की नागरिकता के अधिकारी हो ही नहीं सकते. पहले चरण में एनसीआर की सूची में शामिल होने से रह गए लोगों की सबसे बड़ी चिंता यह नागरिकता संशोधन बिल ही है.

इस सूची में शामिल होने से असफल रहे लोग इस रजिस्टर को मसविदा या ड्राफ्ट मानकर भूलने की कोशिश भी करें तो भी नागरिकता अधिनियम में प्रस्तावित बदलाव की बात उन्हें चैन से सोने नहीं देगी. भीतर ही भीतर दक्षिणी असम के मूलनिवासी, भाषाई और धार्मिक ताने-बाने में टूटने की सारी परिस्थितियां बन गई हैं. अब देखना यह होगा कि राजनीति इसे संभाल पाती है या भीतर की टूटन और सुगबुगाहट किसी सुनामी को पैदा करती है.

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