और लगाओ दरबार !

(भूपेश पंत)

जनता की समस्याओं को सुनने के लिये राजा ने दरबार लगाने की मुनादी क्या करवाई, अनपढ़, गंवार और लाचार लोगों ने तो जैसे लोकतंत्र की स्थापना का जश्न ही मनाना शुरू कर दिया। वो ये भूल गयी कि राजा आज भी राजा ही है। समय समय पर लोगों के लिये दरबार लगाना दरअसल उसकी इसी प्रभुसत्ता को सार्वजनिक रूप से स्थापित करने की सतत प्रक्रिया है। राजा अगर खुश हुआ तो फ़रियादी पर ईनामों की झड़ी लगा दे और अगर कोई उसकी सत्ता को चुनौती देने का दुस्साहस करे तो भरे दरबार में उसका सिर भी कलम करा सकता है। इससे पूरे राज्य को ये संदेश और बेहतर तरीके से जाता है कि राजा से बगावत करने वालों का यही अंजाम होगा।

राज्य के विकास की बाट जोह रही प्रजा को इतनी समझ कहां कि वो अपनी लक्ष्मण रेखा के भीतर रह सके। वो तो राजतंत्र के भीतर लोकतंत्र के प्रस्फुटित होने का जश्न मनाने में जुटी है। इस जोश में कोई लाचार फ़रियादी अपनी मर्यादा ही भूल जाये तो इसमें राजा का क्या दोष। आखिर वो राजा है जो कभी भी गुस्से में आ सकता है क्योंकि उसके लिये मर्यादा की सीमा रेखा वही है जो उसने अपने लिये तय की है। लेकिन फ़रियादी को ये नहीं भूलना चाहिये कि वो राजा के दरबार में जा रहा है और वहां के कुछ नियम कायदे होते हैं। फ़रियादी कितना भी क्षुब्ध क्यों ना हो उसे राजा के सामने तेज आवाज में बात करने की इजाज़त नहीं है। रीढ़ की हड्डी को दोहरा किये बिना राजा से आंखें मिला कर बात करना बग़ावत की श्रेणी में आता है।

राजा फ़रियादी की समस्या का समाधान करने का आश्वासन दे या न दे, उसे झुक कर और मुस्कराते हुए उल्टे पाँव राजा को इस तरह दुआएं देते हुए जाना होगा कि राजा के दर्शन कर पाना ही उसके लिये सौभाग्य की बात है। राज्य के अधिकारियों के भ्रष्टाचार की कोई शिकायत सहन नहीं की जायेगी और इसे सामने लाने वाले किसी भी मामले में राजा जीरो टॉलरेंस अपनाते हुए तत्काल फ़रियादी की गिरफ़्तारी का हुक्म दे सकता है। जो फ़रियादी किसी वजह से दरबार में अपनी बात ना कह पाये उसे राजा की मुस्कुराहट को ही सत्ता का आशीर्वाद समझ कर धन्य हो लेना चाहिए। और खबरदार जो किसी फ़रियादी ने दरबार में अपनी जान लेने की कोशिश भी की तो, क्योंकि प्रजा की जान पर राजा का हक है और उसे निकालने के लिये उसकी अपनी व्यवस्था है। फ़रियादी के इस दुस्साहस को राजा के इस सिस्टम के नाकारेपन के तौर पर लिया जा सकता है लिहाजा ये राजद्रोह माना जाएगा।
गार्ड ऑफ ऑनर दे दे कर जिन जनसेवकों को मौन साधे जन प्रतिनिधि और जननायक बनाए जा रहे हो और लोकतंत्र को दरबार तंत्र बनाने पर तुले हो तो फिर झेलो ना दरबार के नियम कायदे भी। बात करते हैं….।

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