देवभूमि में सत्ता, सरकार और संगठन के सामने चुनौती

देहरादून। मिशन निकाय और 2019 से पहले RSS की छत्रछाया के तले सरकार-संगठन के बीच समन्वय को लेकर गुरुवार को मैराथन मंथन हुआ। इससे एक बात तो साफ है कि उत्तराखंड बीजेपी चुनाव के चक्रव्यूह में कहीं अभिमन्यू की तरह फंस ना जाए, लिहाजा सरकार-संगठन में रूठे हुए योद्धाओं को मनाना जरूरी है। भले ही ये बैठक बीजेपी के लिए आरएसएस के साथ एक रुटीन एक्सरसाइज हो, मगर सरकार और संगठन के बीच समन्वय की डोर सही सलामत रहे ये भी किसी चुनौती से कम नही है और संघ इसे बखूबी जानता है। लिहाजा संघ सरकार और संगठन पर पकड़ ढीली छोड़ने का जोखिम मोल नहीं ले सकता।

2017 में देवभूमि की सत्ता पर प्रचंड बहुमत का ध्वज फहराने के बाद बीजेपी सरकार और संगठन के सामने चुनौती मिशन 2019 फतह करना है। त्रिवेंद्र सरकार भ्रष्टाचार पर ज़ीरो टोलरेंस का दावा करते हुए आगे बढ़ रही है । सूबे में निवेश लाने और सबसे बड़े नायक बनने के लिये मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत इनवेस्टर समिट करा रहे हैं, लेकिन ज़मीनी हालात पर गहरी पकड़ रखने वाला आर.एस.एस बखूबी जानता है कि कई मोर्चों पर सरकार और संगठन को अंदरूनी कलह-बाजी से जूझना पड़ रहा है। तो कई ऐसे मुद्दे भी हैं जिन पर नयी रणनीति बनाने की दरकार होगी।

फिर चाहे उत्तरकाशी में रेप और मर्डर से उबलते पहाड़ में आधी आबादी को आधी अधूरी सुरक्षा का मुद्दा हो या फिर अतिक्रमण को लेकर चल रहे बुलडोज़र से सियासी मोर्चे पर पड़ने वाले जनता के ग़ुस्से के हथौड़े का डर। पिछले दिनों विधायकों के बयान बहादुर कारनामों को भी संघ कहां नजरअंदाज करने वाला है भला। चाहे जुलाई में लक्सर विधायक संजय गुप्ता का सरकार के सूबेदार को लेकर आया ‘झोटा बिरयानी’ वाला बयान हो, या हाल में हरिद्वार में अटल जी के अस्थि कलश यात्रा से पहले दो काबिना मंत्रियों सतपाल महाराज और मदन कौशिक की आपसी खुन्नस में बार बार वेन्यू बदला जाना।

देवभूमि की सत्ता पर डबल इंजन लगे भले ही सवा साल से ज्यादा का वक्त हो चला हो, मगर दायित्व के दावेदारों का धैर्य भी जवाब देने लगा है। लिहाजा 2017 की महाजीत का इनाम काडर तक बँटना अभी बाकी है। कई तारीखें दी गई, कभी दिवाली तो कभी नया साल तो कभी चर्चा चली कि होली के बाद खुशियों के रंग बिखरेंगे तो कभी कहा गया कि थराली का युद्ध जीतने के बाद दायित्व के लड्डू बंटेगे, मगर हर बार आश्वासन लॉलीपॉप ही साबित हुए।

लिहाजा RSS सरकार के कामकाज को भी बारिकी से जानना और समझना चाह रहा है। ये पता लगाने की कोशिश हो रही है कि सरकार का फील्ड से फीडबैंक कैसा मिल रहा है, क्योकि सरदारी की पगड़ी सिर पर बंधने के बाद त्रिवेंद्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती निकाय का नायक बनने की है। आखिर 2019 के सियासी मैच से पहले निकाय किसी सेमिफाइनल से कम नहीं है। निकाय की जीत ही काफी हद तक त्रिवेंद्र के रिपोर्टकार्ड को मजबूत करेगी। लिहाजा सरकार और संगठन के बीच RSS उस सेतू का काम कर रहा है जिससे होकर ही 2019 की लोकतंत्र की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ी जानी है, लिहाजा RSS ये ही चाहेगा कि मोदी की जीत का तिलिस्म पहाड़ पर भी बरकरार रहे और ये भी संभव है जब सरकार-संगठन के बीच खटाई की खाई नहीं, बल्कि एकाजुटता की वो डोर हो जो एक एक दूसरे को जोड़े रहे, लेकिन सवाल आखिर में यही कि क्या संघ की शरण में जाकर मंत्रियों के मनमुटाव और विधायकों की बयान बहादुरी पर क़ाबू पाया जा सकेगा ?

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