OPINION

कैसे आएंगे कठघरे में साइबर क्रिमिनल

डिजिटल इंडिया’ के सरकारी नारों के पीछे हमारी साइबर सुरक्षा कितनी पुख्ता और अभेद्य है, इस बात की पोल एक बार फिर सरकारी वेबसाइटों में सेंध लगने और इन वेबसाइटों के बंद होने की घटना ने खोल दी है। पिछले दिनों अचानक रक्षा मंत्रालय की वेबसाइट के होम पेज पर चीनी शब्द दिखाई देने लगा। इसके कुछ देर बाद ही ...

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लहसुन का इस्तेमाल से खत्म होगा सिर का गंजापन

नई दिल्ली: झड़ते बालों की वजह से अगर पड़ोस में रहने वाली लड़कियां आपसे बात करने से कतराती हैं तो ये खबर आपके लिए हैं। आइए जानते हैं कैसे लहसुन के इस आसान तरीके को अपनाकर आप अपने बालों को काला, घना बनाकर अपना खोया हुआ आत्मविश्वास दोबारा पा सकते हैं। लहसुन बालों के झड़ने को तो रोकता ही है साथ ही साथ बालों के उगने ...

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अमिताभ बच्चन की लाडली श्वेता बनीं लेखिका

बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन की बेटी श्वेता बच्चन नंदा ने हमेशा ही खुद को अभिनय जगत से दूर रखा है। हालांकि इसके बावजूद वह लाइमलाइट में रही हैं। वह अक्सर सोशल मीडिया पर अपने परिवार के साथ तस्वीरें और वीडियो पोस्ट करती रहती हैं। श्वेता ने बेशक फिल्मी जगत में अपनी करियर नहीं चुना, लेकिन अब वह अपनी किताब को लेकर चर्चा में ...

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आतंकवादियों और कट्टरवादियों ने तलाशा सुरक्षित ठिकाना

लंदन: आतंकवादियों और कट्टरवादियों ने अपने लिए एक नए और सुरक्षित ठिकाने की तलाश कर ली है। वे भविष्य के हमलों की साजिश रचने, फंड जुटाने व नए समर्थकों की भर्ती करने के लिए ‘डार्क नेट’ पर सुरक्षित पनाहगाह बना रहे हैं। गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक, विदेश नीति से संबंधित थिंकटैंक हेनरी जैक्शन सोसाइटी के शोधकर्ताओं ने कहा कि आतंकवादी संगठन ...

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देश के बजट में स्वास्थ्य के लिए कंजूसी क्यों ?

विश्व स्वास्थ्य दिवस पर हर देश अपने स्वास्थ्य की समीक्षा करता है. विश्व समुदाय के सदस्य होने के नाते हमें भी करना चाहिए. वैसे ये काम छोटा-मोटा काम नहीं है. फिर भी हम इतना तो कर ही सकते हैं कि समय-समय पर जो योजनाएं बनाते हैं. पलटकर उन पर नज़र डाल लिया करें. इस लिहाज़ से देखें तो सबसे पहले ...

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बेरोजगारों का दर्द आखिर कौन समझेगा ?

(रवीश कुमार ) भारत में बेरोज़गारों की न तो संख्या किसी को मालूम है और न ही उनके जीवन के भीतर की कहानी. हमारे लिए बेरोज़गार हमेशा नाकाबिल नौजवान होता है जो मौके की तलाश में एक ही शहर और एक ही कमरे में कई साल तक पड़ा रहता है. कई बार तो लोग इसलिए भी बेकार कहते हैं कि ...

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देश के अंदर हो रहे आंदोलनों से खतरे की ओर संकेत

एक सभ्य समाज में संदिग्धता के लिए कोई जगह नहीं होती. फिर भी यदि कोई व्यक्ति विशेष संदिग्ध हो जाये, तो चलेगा. यदि कोई संस्था संदिग्ध हो जाये, तो एक बार वह भी ढक जायेगा. लेकिन यदि कोई जनान्दोलन, और वह भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में, संदिग्ध हो जाये, तो इसे चलाते रहना व्यवस्था के भविष्य के लिए बेहद खतरनाक हो ...

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एक्सिडेंट करा कर क्यों मारे जा रहे पत्रकार

(आकाश नागर) मोदी सरकार में माफियाओ के हौसले बुलंद है. हालात यहाँ तक ख़राब हो चुके है कि चौथे स्तंभ के प्रतीक पत्रकारों को सच लिखने पर जान से मार दिया जा रहा है। मोदी सरकार के पिछले चार साल के दौरान 30 पत्रकार बेमौत मारे जा चुके है। अब माफिया पत्रकारों को एक्सिडेंट में हत्या करा रहे है। मध्यप्रदेश ...

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उत्तराखंड में शराब सिंडिकेट का मुख्या बना “बूंदी सेठ “

(चेतन गुरुंग, वरिष्ठ पत्रकार ) लो यारों..शराब की दुकानों को और एक-दो महीने पुरानी लॉटरी पर ही चलते रहने देने की साजिश कामयाबी के करीब..एक दुकान से पांच लाख रूपये तक मिलने हैं.मालिकों से डील पक्की.आप क्या सोच रहे..यूँ ही नई आबकारी नीति का शासनादेश लटका हुआ है?अरे इतने गए-बीते और नाकारा भी नहीं..अपने विधायी वाले.फिर भी नीति वहां लटक ...

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क्या फर्क है दूसरे नाकाम रहे मुख्यमंत्रियों और त्रिवेंद्र में ?

(लेखक : योगेश भट्ट, वरिष्ठ पत्रकार, देहरादून ) राजधानी अटी हुई है त्रिवेंद्र के “गुणगान” से, “केंद्र में नरेंद्र, उत्तराखंड में त्रिवेंद्र” और “भ्रष्टाचार पर प्रहार, पारदर्शी सरकार” जैसे नारे हर मोड़ और चौराहे पर हैं । समाचार पत्रों के पन्ने एडवर्टोरियल से रंगे हैं तो पार्टी से लेकर सरकार का पूरा तंत्र प्रचार में जुटा है, करोड़ों रुपया प्रचार ...

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