OPINION

सूखती ज़मीन और मरता किसान, मेरा भारत महान

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(मोहन भुलानी) देश के इतिहास में सबसे कष्टकारी सूखे में से एक के रूप में वर्गीकृत, 2015-16 में सूखे भारत में 11 राज्यों के 266 जिलों के 2.5 लाख से अधिक गांवों में 330 मिलियन से अधिक लोगों को प्रभावित किया है। इससे आम जनमानस के जीवन पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा है क्योंकि इससे पानी की उपलब्धता, कृषि, आजीविका, खाद्य ...

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अब नक्सलियों का सर्जिकल स्ट्राइक करो सरकार

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(मोहन भुलानी ) छत्तीसगढ़ के सुकमा में हुई नक्सली वारदात में 25 जवानों की शहादत से पूरा देश स्तब्ध है। खून से लथपथ निष्प्राण देह के चित्र मन को व्यथित कर रहे हैं। दरअसल यह भारतीय गणराज्य के खिलाफ नक्सलियों के हथियारबंद संघर्ष का ऐलान है। आखिर, एक राज्य में दूसरा राज्य या देश में दो समानांतर सेनाओं जैसी बात ...

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आस्था के नाम पर बच्चियों का शोषण करती है ये प्रथा

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(वर्षा ठाकुर ) समाज का घिनौना सच बयान करती एक प्रथा, जो मुख्य रूप से कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और महाराष्ट्र में प्रचलित है। लेकिन सोचने वाली बात है, कि ये आज भी कई इलाकों में जस की तस बनी हुई है। हजारों सालों से धर्म के नाम पर महिलाओं का शोषण होता आया है। देवदासी ऐसी ही एक प्रथा थी, जिसमें ...

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हैवानियत की घटनाओं के बाद ही बदलेगा समाज?

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(दीपा धामी ) सवाल ये है कि क्या समाज में बदलाव के लिए किसी लड़की के साथ हैवानियत होना जरूरी है? क्या ऐसी वारदातों के बाद ही हम महिलाओं के अधिकारों और उनकी सुरक्षा के प्रति जागरूक होंगे? आखिर हमारी न्यायिक व्यवस्था, उस बलात्कार के बारे में कब जागेगी, जो घरों के भीतर होते आए हैं? आईपीसी की धारा 375, ...

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जमीन जनता की “कब्ज़ा” सरकार का क्यों ?

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(अनिल गर्ग सामाजिक-कार्यकर्ता ) 2006 में लागू वन अधिकार क़ानून कहता है कि जो ज़मीनें आज़ादी के पहले सामुदायिक अधिकारों के लिए थीं, वो यथावत बनी रहेंगी. लेकिन मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 90 लाख हेक्टेयर ऐसी ज़मीनों पर सरकार का क़ब्ज़ा है. सन 1950 में संविधान लागू होने के बाद इस देश में पहला सबसे क्रांतिकारी क़ानून मालगुजार, ज़मींदार, ...

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येे मोदी की जीत से ज़्यादा अरविंद की हार

(सुशील बहुगुणा) भीड़ अगर किसी को पीट रही हो तो कभी उस भीड़ का हिस्सा नहीं बनना चाहिए. क्योंकि भीड़ में मार पिटाई करने वाले अधिकतर लोग बिना किसी तर्क और जानकारी के हाथ पैर चला रहे होते हैं और पिटने वाला भी अपने गुनाह से ज़्यादा और कई बार बेवजह पिट जाता है. मैं दिल्ली के निगम चुनावों की ...

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हिन्दी इंग्लिश की तरह सेक्सी नहीं

-श्रद्धा शर्मा जैसे-जैसे इंसान की भाषा बदलती है, वैसे-वैसे उसकी इच्छाएं, ज़रूरतें और ज़िंदगी को देखने-सोचने-समझने का नज़रिया भी बदलता है। मैं भी कहीं बदल न जाऊं, इसलिए मैंने अपनी भाषा को कभी खुद से दूर नहीं होने दिया। कहते हैं न अपनी मिट्टी और अपनी भाषा कभी दिल से नहीं जुदा होते, तो मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही ...

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इस गांव में जिंदगियां निगल रही खदानों की धूल

उत्तरी गोवा के धूलभरे खनन क्षेत्र सोंशी गांव के निवासी 10 वर्षीय वासुदेव गावड़े की वार्षिक परीक्षाएं करीब हैं, लेकिन पढ़ाई या परीक्षाओं की तैयारी का ख्याल तक उसके दिलों-दिमाग से कोसों दूर है। गावड़े जैसे और भी कई नाबालिग अपने माता-पिता के कैद से छूटने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं, जिन्हें गांव में ट्रकों के जरिए लौह ...

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Bullet ट्रेन से ज़्यादा ज़रूरत है Safe ट्रेन की

(नीरज त्यागी ) 15 अप्रैल को हुआ राज्यरानी एक्सप्रेस का रेल हादसा इस साल की तीसरा बड़ा रेल हादसा है। इससे पहले महाकौशल एक्सप्रेस और भुवनेश्वर एक्सप्रेस के रेल हादसे भी पिछले महीनो में हुए। वहीं राज्य सभा में एक प्रश्न के जवाब में जानकरी सामने आई, जिसमे कहा गया की 1 अप्रैल 2016 से 28  फ़रवरी 2017 तक कुल ...

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दिल्ली में क्यों “मल” खा रहा किसान – धिक्कार है

(मोहन भुलानी ) मैं किसान हूं। पेशाब पीना मेरे लिए खराब बात नहीं है। जहर पीने से बेहतर है पेशाब पीना। जहर पी लिया तो मेरे साथ मेरा पूरा परिवार मरेगा पर पेशाब पीने से केवल आपकी संवेदनाएं मरेंगी, मेरा परिवार शायद बच जाए। कई बार लगता है आपकी संवेदनाएं मेरे लिए बहुत पहले ही मर गईं थी लेकिन कई ...

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