चुनाव आते ही जातिगत राजनीति हावी

इस साल दिसंबर में होने वाले हिन्दी पट्टी के तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों से पहले जातिगत राजनीति सिर चढ़ कर बोलने लगी है. बात हो रही है मध्य प्रदेश के अलग-अलग शहरों में सवर्णों के उस आंदोलन की जिसके विरोध के चलते कई मंत्रियों, सांसदों की घेरेबंदी हो रही है और उन्हें आंदोलनकारियों से बचाने के लिए पीछे के दरवाजों से निकाला जा रहा है. कल देर रात सीधी में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की एक सभा में उन पर चप्पलें भी फेंक दी गईं. दरअसल, पूरा मामला अनुसूचित जाति तथा जनजाति अत्याचार निवारण कानून को लेकर शुरू हुआ है. सवर्ण संगठनों का आरोप है कि एससी/एसटी वर्ग को खुश करने के चक्कर में केंद्र सरकार ने सवर्णों को इस कानून की ज्यादतियों का शिकार बनने का रास्ता खोल दिया है. बीजेपी के लिए सिरदर्द इसलिए बढ़ रहा है कि यह विरोध सिर्फ मध्य प्रदेश तक ही सीमित नहीं है. कई दूसरे राज्यों में भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश को बदलने के लिए एससी/एसटी एक्ट में संशोधन का विरोध शुरू हो चुका है. इस मुद्दे पर 6 सितंबर को बंद का आव्हान भी किया गया है. इस जटिल सामाजिक मुद्दे के कई पहलू हैं. उन्हें एक-एक कर समझने की कोशिश करते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने इस साल मार्च में एक आदेश दिया. इसमें कहा गया कि अनुसूचित जाति तथा जनजाति वर्ग के किसी भी सदस्य पर अत्याचार करने के आरोपी की तत्काल गिरफ्तारी नहीं होगी. इसके लिए मंजूरी जरूरी होगी. साथ ही अग्रिम जमानत का प्रावधान भी किया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ये सुरक्षा उपाय इसलिए किए जा रहे हैं ताकि इस कानून का दुरुपयोग रोका जा सके. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले का तीखा विरोध शुरू हो गया. देश भर के दलित संगठनों ने इसके विरोध में आवाज़ उठाई और भारत बंद का एलान किया. दो अप्रैल को बुलाए गए भारत बंद के दौरान कई राज्यों में हिंसा हुई जिनमें 9 लोग मारे गए. अकेले मध्य प्रदेश में छह लोगों की मौत हुई.

इससे पहले सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर कर चुकी थी. मॉनसून सत्र में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए बिल लाने का फैसला किया जिसे सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया. लेकिन अब कई राज्यों में सवर्ण तबका नाराज हो गया है. उन्हें लगता है कि सुप्रीम कोर्ट ने कानून का दुरुपयोग रोकने के लिए जो दिशा-निर्देश दिए थे, उन्हें बदलने की जरूरत नहीं थी. खुद सरकारी आंकड़े कहते हैं कि इस कानून का दुरुपयोग किया गया है. हाल में नोएडा में एक रिटायर्ड सेना अधिकारी की इस कानून के तहत गिरफ्तारी इसका बड़ा उदाहरण बताया जा रहा है.

उधर, सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध करने वालों का कहना है कि एससी/एसटी वर्ग पर अत्याचार की घटनाओं में पिछले चार साल में चालीस फीसदी से भी ज्यादा का इजाफा हुआ, इसलिए कानून में बदलाव की जरूरत नहीं है. कांग्रेस के मल्लिकार्जुन खड़गे ने तो इसे संविधान की नौवी अनुसूची में रखने की मांग तक कर डाली ताकि भविष्य में कोई भी अदालत इसकी समीक्षा ही न कर सके. पर अब इस पूरे मसले ने एक नया मोड़ ले लिया है. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में दिसंबर में चुनाव होने हैं. मध्य प्रदेश में अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने का विरोध हो रहा है. इसके पीछे ‘सपाक्स’ यानी सामान्य, पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक वर्ग अधिकारी कर्मचारी संस्था है.

शनिवार को ‘सपाक्स’ के लोगों ने गुना में केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत और सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया को घेरा, उनके खिलाफ नारेबाजी की… हालात ऐसे बने कि पुलिस को इन दोनों को सर्किट हाउस के पिछले दरवाजे से बाहर निकालना पड़ा. भिंड से बीजेपी सांसद भगीरथ प्रसाद को भी अपने क्षेत्र में लोगों के विरोध का सामना करना पड़ा. मुरैना में स्वास्थ्य मंत्री रुस्तम सिंह को काले झंडे दिखाए गया. गंजबासौदा में सामान्य पिछड़ा अल्पसंख्यक अधिकारी कर्मचारी संघ ने मध्यप्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ को भी काले झंडे दिखाए.

‘सपाक्स’ के आंदोलन का ज्यादा असर ग्वालियर-चंबल संभाग में है जहां दो अप्रैल के भारत बंद के दौरान हिंसा हुई थी. अब यह आंदोलन विदिशा भी पहुंच गया है जहां ‘सपाक्स’ कार्यकर्ताओं ने विदेश मंत्री एमजे अकबर का नारेबाजी करते हुए घेराव किया. बीजेपी को इस पूरे मसले की गंभीरता और चुनावों में इसके संभावित परिणाम का अंदाजा है. तीस सितंबर को दिल्ली में मुख्यमंत्री परिषद की बैठक में सवर्णों की नाराजगी पर चर्चा की गई थी. कुछ नेताओं ने यह मुद्दा उठाया था. उनका कहना था कि एससी/एसटी ऐक्ट में संशोधन कर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटने से देश के सवर्णों के एक हिस्से में नाराजगी पनप रही है. बैठक में तय किया गया था कि सवर्ण नेता अपने समर्थकों को समझाएंगे कि आखिर किन परिस्थितियों में सरकार को यह फैसला लेना पड़ा. लेकिन मध्य प्रदेश से आ रही खबरों के मुताबिक निशाने पर सिर्फ बीजेपी ही नहीं बल्कि कांग्रेस भी है. ऐसे में यह ज़रूरी है कि ये दल आपसी खींचतान से उठकर लोगों को समझाएं और उन्हें भरोसे में लें कि आखिर क्या वजह हैं जिनके चलते उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटा ताकि सामाजिक तानेबाने पर इस सियासी उठापटक का बुरा असर न हो.

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