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कुमाऊं की इन दो बेटियों ने कैसे बदली किसानों की जिंदगी

(मोहन भुलानी, न्यूज़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया)

आज के युवा जहाँ एक ओर शहरी चमक धमक से प्रभावित हो रहे हैं और शहरों में बसने की चाह में अपनी जन्मभूमि अपने गाँवों से विमुख हो रहे हैं। आए दिन हम पढ़ते हैं कि उत्तराखंड के गाँवों से निरंतर पलायन हो रहा है, गाँवों में केवल बुजुर्ग शेष रह गए हैं। ऎसे में यदि हम आपको बताये कि आज भी कुछ युवा हैं जो महानगरों की चमक-धमक, अच्छी ख़ासी नौकरी और समस्त सुख सुविधाओं को अलविदा कहकर अपने गाँवों का रुख कर रहे हैं, अपने गाँवों को तरक्की के पथ पर अग्रसर करने के लिए कार्यरत हैं तो आपको विश्वास नहीं होगा।

यह सच है कि उत्तराखंड की दो बेटियाँ  कुशिका शर्मा  और  कनिका शर्मा  ने अपनी अच्छी ख़ासी मोटी तनख़्वाह की नौकरी को तवज्जो ना देकर रुख किया अपने गाँव का। दिल्ली जैसे महानगर की सुख सुविधाएं सिर्फ इसलिए छोड़ दी ताकि पहाड़ों को फिर से जीवन दे सकें। जी हाँ कुशिका और कनिका शहर में रहकर अपनी जिंदगी बड़े आराम से गुजार रही थीं लेकिन उन्होंने अनुभव किया कि रोज की भागदौड़ में वो सुकून नहीं था जो पहाड़ की वादियों में था। दोनों बहनों ने तय किया कि वो सब कुछ छोड़कर उत्तराखंड में बसे अपने गाँव मुक्तेश्वर में जाकर गाँव की प्रगति में अपना योगदान देंगी। परिवार का समर्थन मिला और उन्होंने गाँव जाकर रास्ता चुना ऑर्गेनिक खेती के प्रति जागरूकता लाने का। मुक्तेश्वर जाकर दोनों बहनों ने‘*दयो – द ओर्गानिक विलेज रिसॉर्ट*‘ का शुभारंभ किया और स्थानीय लोगों को जैविक खेती के प्रति जागरूक करने लगी। साथ ही अब दोनों बहनों की कोशिश अपना कार्यक्षेत्र विस्तारित करने की है ताकि उत्तराखंड के अन्य गाँवों को भी जागरूक किया जा सके। साथ वे अब कृषि उत्पादों को बेचने के लिये सप्लाई चेन बनाने की भी योजना पर कार्य कर रही हैं।

कुशिका और कनिका ने अपनी स्कूली शिक्षा उत्तराखंड के नैनीताल और रानीखेत से पूरी की। स्कूली शिक्षा पूर्ण होने के बाद कुशिका ने एम.बी.ए करने का निर्णय लिया। एम.बी.ए करने के बाद कुशिका ने करीब चार साल तक गुड़गांव की एक मल्टी नेशनल कंपनी में बतौर सीनियर रिसर्च एनालिस्ट के रूप में कार्य किया। तो वहीं दूसरी ओर उनकी बहन कनिका ने दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया से अच्छे अंको के साथ मास्टर्स की डिग्री हासिल की जिसके बाद कनिका को हैदराबाद में आंत्रप्रेन्योरशिप में स्कॉलरशिप मिल गई। अपने-अपने कार्य क्षेत्रों में दोनों बहनों को कई राष्ट्रीय और  अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के साथ काम करने का अवसर मिला। लेकिन पढ़ाई और नौकरी के सिलसिले में दोनों बहनों को नैनीताल में रहने वाले अपने परिवार से दूर रहना पड़ता था लेकिन जब भी उन्हें मौका मिलता तो वे दोनों अपने परिवार से मिलने के लिये नैनीताल पहुंच जाती। इस दौरान उन्होंने अनुभव किया कि अपने बच्चों को अपने पास पाकर उनके पिता को कितना सुकून मिलता है और जैसे ही दोनों बहनों के पुनः अपने काम पर
लौटने का दिन करीब आने लगता तो पिता की उदासी बढ़ने लगती, दोनों बहनों को भी पिता से दूर जाना अच्छा तो नही लगता पर क्या करे काम भी तो जरूरी था।

“न्यूज़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया” से खास बातचीत में कुशिका ने बताया कि “हमारे पास सब कुछ था लेकिन जिंदगी में सुकून की कमी थी, वो सुकून हमें पहाड़ों में मिलता था। तब मैंने और मेरी बहन ने अपनी नौकरी छोड़कर प्रकृति की गोद में ही कुछ करने का सोचा। इसके लिए हमने फैसला लिया कि हम स्थानीय लोगों के साथ मिलकर ऑर्गेनिक खेती करेंगे।

इस तरह दोनों बहनों ने अपने गाँव के शांतिपूर्ण स्वच्छ वातावरण में रहते हुए जैविक खेती करने का दृढ़ निश्चय किया और अपनी नौकरी को अलविदा बोल कर अपने परिवार के साथ अपने गांव मुक्तेश्वर आ गयी। शुरुआत में उन्हें कई तरह की मुश्किलों का भी सामना करना क्योंकि वहाँ के लोगों के लिए उनका विचार बिलकुल नया था, जिस पर उन्हें विश्वास करने में कुछ समय लगना स्वभाविक था। मुक्तेश्वर में रहकर दोनों बहनों ने कुछ दिनों तक वहाँ की खेती योग्य स्थितियों और किसानों की स्थिति का जायजा लिया। इस दौरान इन दोनों ने अनुभव किया कि गाँव की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर आधारित है लेकिन स्थानीय लोगों में कृषि उत्पादन बढ़ाने को लेकर जागरूकता का अभाव है और ना वहाँ के किसानों को जैविक खेती के बारे में कुछ ज्ञान है और साथ ही उनका मार्गदर्शन करने वाला भी कोई नहीं है।

जबकि दूसरी ओर शहरों में जैविक उत्पादों की मांग है जो निरंतर बढ़ती जा रही है। अपने गाँव में जैविक खेती के विकास के संकल्प को लेकर कुशिका व कनिका ने किसानों से बात करने से पहले स्वयं जैविक खेती और जीरो बजट खेती कैसे की जाती है इसका प्रशिक्षण लेना प्रारम्भ किया। इस तरह की खेती के प्रशिक्षण के दौरान दोनों ने दक्षिण भारत व गुजरात के कई राज्यों का दौरा किया। पूर्ण प्रशिक्षण लेने के बाद साल 2014 में दोनों बहनों ने मिलकर मुक्तेश्वर में 25 एकड़ जमीन पर खेती का कार्य शुरू किया। साथ ही अन्य लोगों का रुख गाँवों की ओर करने हेतु ‘दयो– द ओर्गानिक विलेज रिसोर्ट’ की स्थापना की।

दयो – द ऑर्गेनिक रिसोर्ट के बारे में बताते हुए कनिका कहती हैं कि ” शहरों में  रहने  के दौरान हमने महसूस किया कि वहाँ रहने वाले लोग कुछ समय प्रकृति के करीब भी रहना चाहते हैं। तब हमने सोचा कि अगर हम लोगों से यह कहेंगे कि आप भी यहां आकर खेती करो तो कोई भ तैयार नहीं होगा। लेकिन जब हम उनसे यह कहेंगे कि आप यहां आकर कुछ दिन छुट्टियाँ मनाइये तो हर कोई इसके लिये तैयार हो जाएगा और गाँवों में आना भी पसंद करेगा।“

साथ ही दोनों ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि जब भी कोई शहरों से यहां पर छुट्टियाँ मनाने के लिये आये तो उसे यहां स्वर्ग का आंनद अनुभव हो और गाँव में रहकर कुछ ऐसा करने को मिले जो उनके लिए नया और स्वास्थ्यवर्धक हो। इसलिए उन्होंने अपने ऑर्गेनिक विलेज रिसोर्ट के नाम के आगे दयो शब्द का प्रयोग किया जो कि संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है “स्वर्ग“। रिसॉर्ट प्रारम्भ होने के साथ ही दोनों बहनों को सैलानियों से बहुत अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है। 5 कमरों वाले मुक्तेश्वर के इस रिसोर्ट में कमरों का नामकरण भी किया गया है जो संस्कृत भाषा से लिए गए प्रकृति के पांच तत्वों पर आधारित है। रिसोर्ट के कमरो के नाम है उर्वी, इरा, विहा, अर्क और व्योमन। यह अपने आप में अनोखा है।

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यहां आने वाले सैलानियों को यह सुविधा दी जाती है कि वो फॉर्म में जाकर अपने हाथों से अपनी पसंद की सब्जियों को तोड़ सकते हैं और रिसॉर्ट के शेफ को देकर मनपसंद खाना बनवा सकते हैं। उनके रिसॉर्ट में इस समय करीब 20 लोग काम कर रहे हैं। रिसोर्ट की बाकी जमीन पर ये बहनें अपनी खेती का काम कर रही हैं। इसके साथ ही दोनो बहने गाँव के बच्चों को शिक्षा के प्रति भी जागरूक कर रही है।

“अगर पहाड़ से लोगों का पलायन रोकना है तो स्थानीय लोगों को यहीं पर रोजगार उपलब्ध कराना होगा क्योंकि हर किसी को आजीविका चलाने के लिए पैसे की जरूरत होती है और उत्तराखंड में सबसे ज्यादा रोजगार की संभावना पर्यटन विकास से ही संभव है।” — कनिका

पर्यटन विकास और आजीविका के अवसर उपलब्ध कराने को ध्यान में रखते हुए ही कुशिका और कनिका ने सबसे पहले स्थानीय लोगों को हॉस्पिटैलिटी का प्रशिक्षण दिया। जिसका परिणाम यह है कि आज खेती से लेकर किचन तक का सारा काम स्थानीय लोग स्वयं संभाल रहे हैं और उन्हें
आर्थिक सहायता भी प्राप्त हो रही है। दोनों बहनें यहां रिसॉर्ट में पैदा होने वाले जैविक कृषि उत्पादों को बेचने के लिए सप्लाई चेन बनाने का विचार कर रही है। इसी विचार को प्रयोग में लाते हुए उन्होंने इस सीजन में अपने रिसॉर्ट की सब्जियों और फलों को मंडियों में भी बेचना प्रारम्भ किया है।

आज कुशिका और कनिका ना केवल अपने इस काम से बहुत खुश और उत्साहित हैं बल्कि आसपास रहने वाले ग्रामीण लोगों को रोजगार उपलब्ध करवा रही जिससे पलायन की समस्या को हल किया जाए। जैविक खेती के प्रति भी जागरूक कर रही है जो गाँव के लोगों को एक दिशा प्रदान
करने का कार्य है।

वाकई में यदि पलायन रोकना है तो हमे भी किसी नए विचार के साथ फिर से अपने गाँवों का रुख करना होगा और एक नयी शुरुआत को जन्म देना होगा। आज समय आ गया है कि युवाओं को शहरों की भीड़ से आगे आकर अपने गाँव को संभालना होगा क्योंकि कुछ अलग करना है तो भीड़ से
हटकर चलने की आवश्यकता है। भीड़ साहस तो देती है मगर पहचान छीन लेती है।

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