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हिमालय की वादियों में महिलाओ को आत्म रक्षा के गुर सिखाती ये लड़कियां

महिलाओं के प्रति बढ़ती हिंसा, यौन उत्पीड़न की बाढ़ ने दुनिया के कोने-कोने में लोगों के दिमाग की घंटी बजा दी है। महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। उन पर बढ़ते खतरे की गूंज हिमालय के शांत घाटियों में भी पहुंच गई है। बुद्धिस्ट मठों में कार्यरत गुरु और ननें आत्म रक्षा के लिए महिलाओं को तैयार करने में लगी हुई हैं। 

बुद्धिज्म में नन से परंपरागत कामों को करने की अपेक्षा की जाती है। इन कामों में खाना बनाने और साफ-सफाई जैसे काम शामिल होते हैं। लेकिन दुनियाभर में फैले द्रुपकावंश के बौद्धों का मानना है कि महिलाएं भी पुरुषों के बराबर ही होती हैं इसलिए उन्हें पुरुष बौद्ध भिक्षुओं के बराबर ही सम्मान मिलना चाहिए।

द्रुपका बौद्धों के आध्यात्मिक प्रमुख ग्यालवंग द्रुपकाा ने कहा कि द्रुपका वंश हिमालय क्षेत्रों में प्रमुख है। द्रुपका वंशावली का समृद्ध और दिलचस्प इतिहास है।

महिलाओं के प्रति बढ़ती हिंसा, यौन उत्पीड़न की बाढ़ ने दुनिया के कोने-कोने में लोगों के दिमाग की घंटी बजा दी है। महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। उन पर बढ़ते खतरे की गूंज हिमालय के शांत घाटियों में भी पहुंच गई है। बुद्धिस्ट मठों में कार्यरत गुरु और ननें आत्म रक्षा के लिए महिलाओं को तैयार करने में लगे हैं। अगर कोई बौद्ध भिक्षुणी हमें अपने अनुभव के बारे में बताने लगे तो हम यही सोचेंगे कि वो करुणा,दयालुता और सकारात्मक जैसी चीजों के बारे में हमसे बात करेगी। लेकिन द्रुपका वंश की नन इन सब चीजों से एकदम अलग कुंग फू की ट्रेनिंग से बाकी महिलाओं को पितृसत्तात्मक समाज में खुद को बचाने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं। ये बाकी महिलाओं को सिखा रही हैं कि मार्शल आर्ट के जरिए खुद को कैसे सुरक्षित रखा जा सकता है।

बुद्धिज्म में नन से परंपरागत कामों को करने की अपेक्षा की जाती है। इन कामों में खाना बनाने और साफ-सफाई जैसे काम शामिल होते हैं। लेकिन दुनियाभर में फैले द्रुपकावंश के बौद्धों का मानना है कि महिलाएं भी पुरुषों के बराबर ही होती हैं इसलिए उन्हें पुरुष बौद्ध भिक्षुओं के बराबर ही सम्मान मिलना चाहिए। यह सब संभव हो सका है ग्यालवांग द्रुपका की बदौलत जो कि अपनी मां से खासी प्रभावित हैं। उनकी मां महिलाओं की बराबरी और आजादी की पैरोकार हैं। अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी ‘रॉयटर्स’ से बात करते हुए 19 साल की बौद्ध भिक्षुणी जिग्मे वांगचुक ने कहा, ‘ज्यादातर लोग यही मानते हैं कि नन का काम सिर्फ बैठकर प्रार्थना करना होता है, लेकिन हम इससे ज्यादा कर सकते हैं। कुंग फू से महिलाएं मजबूत होने के साथ ही आत्मविश्वास से भरी रहेंगी।’

इन ननों ने हिमालय की महिलाओं को आत्मरक्षा के लिए कुंग फू सिखाना शुरू कर दिया है। इसके अलावा ये नन हिमालय के रिहायशी क्षेत्रों में सामाजिक मुद्दों के बारे में समाज को जागरूक करती हैं। इनमें से कुछ महिलाएं तो कारपेंटर और इलेक्ट्रीशियन जैसे कामों में ट्रेंड भी हैं।

द्रुपका वंश के लोग मुख्य रूप से हिमालय के क्षेत्र में रहते हैं। यह भारत में सबसे प्रमुख बौद्ध वंश है। द्रुपकाा वंश के 999 वर्ष पूर्ण होने के मौके पर रंगारंग समारोह में डाक विभाग ने स्मारक डाक टिकट जारी किया। द्रुपका बौद्धों के आध्यात्मिक गुरू ग्यालवंग द्रुपकाा और वंश के आध्यात्मिक रीजेन्ट द्रुपका थुकसे रिनपोचे मौजूद थे। द्रुपका बौद्धों के आध्यात्मिक प्रमुख ग्यालवंग द्रुपकाा ने कहा कि द्रुपका वंश हिमालय क्षेत्रों में प्रमुख है। द्रुपका वंशावली का समृद्ध और दिलचस्प इतिहास है।  ऐसे में आमतौर पर देश के लिए तथा खासतौर पर बौद्ध धर्म के लिए उनका योगदान उल्लेखनीय है और इसकी खूब प्रशसा की जाती है। ग्यालवंग द्रुपकाा हिमालय क्षेत्र में रहने वाले एक हजार साल पुराने द्रुपका वंश के प्रमुख हैं। दुनिया भर में इनके लाखों अनुयायी हैं। उनका मिशन दुनिया भर में शाति और सद्भाव फैलाना है।

बेहतरीन बात ये है कि द्रुपका वंश की ये ननें न सिर्फ आत्मरक्षा के लिए कुंगफू सिखा रही हैं बल्कि महिलाओं के शारीरिक स्वास्थ्य के लिए जागरूकता भी फैला रही हैं। ये ननें हिमालय के घुमावदार रास्तों पर हजारों किलोमीटर तक साइकिल चलाकर, चढ़ाई करके जाती हैं और लोगों से बात करके उनको जागरूक करती हैं। ये कुंगफू ननें हिमालय की हीरो हैं। वो बहुत ही दयालु हैं और उतनी ही बहादुर भी। यहां तक कि भूकंप और हिमस्खलन भी इनकी हिम्मत और दृढ़निश्चय को डिगा नहीं पाता है। कैरी ली नाम की समाजसेविका इन ननों के साथ मिलकर हिमालय के दूरदराज और दुर्गम इलाकों में रह रहे लोगों के हित के लिए काम कर रही हैं। द्रुपका वंश की ये ननें न सिर्फ हिमालयन रेंज बल्कि पूरी दुनिया के लिए मिसाल हैं। 2015 में जब नेपाल में भयानक भूकंप आया था तब इन ननों ने अपनी जी-जान लगाकर लोगों को सुरक्षित निकालने का काम किया था। वो उन्हें खाना खिलाती थीं, पहनने को साफ कपड़े भी देती थीं।

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