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बैंकों के आपस में विलय से डूबने का है खतरा

ऐसे समय में जब कंपनियां सरकारी बैंकों को कर्ज नहीं चुका पा रही हैं तो भारत सरकार ने बैंकों के विलय के लिए वैकल्पिक व्यवस्था बनाने की घोषणा पिछले महीने की है। इसके जरिए बैंकों के बोर्ड से आए विलय प्रस्तावों पर निर्णय होगा। ऐसे नीतिगत निर्णय के लिए इससे खराब समय हो नहीं सकता था। अभी भारत के सरकारी बैंकों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि कैसे कंपनियों को दिए कर्जो पर उन्हें ब्याज मिले और उनकी पूंजी बढ़े ताकि वे फिर से कर्ज देने की शुरुआत कर सकें। ऐसे में बैंकों के विलय से कुछ नहीं होने वाला। बल्कि इससे तो गैर निष्पादित संपत्तियां यानी एनपीए की समस्या और केंद्रित हो जाएगी।

यह विलय का सही वक्त नहीं है

सफल विलय तो सही समय पर होते हैं। तनावग्रस्त संपत्तियों, यानी वैसे कर्जे जिनके वापस आने में दिक्कत दिख रही हो, वाले दो बैंकों के विलय से बैंकों का आकार तो बढ़ेगा लेकिन साथ ही ऐसे कर्जे भी बढ़ जाएंगे। यह स्पष्ट नहीं है कि आखिर कैसे विलय के बाद बना बैंक आर्थिक तौर पर ठीक हो जाएगा। यह भी स्पष्ट नहीं है कि बैंकों के लिए जरूरी अतिरिक्त पूंजी की समस्या का समाधान इससे कैसे होगा?

उदाहरण के लिए भारतीय स्टेट बैंक में इसके सहयोगी बैंकों के विलय को लें। इसके बाद बैंक का बैलेंस सीट तो बढ़ गया लेकिन तनावग्रस्त कर्जे भी बढ़ गए। हालांकि, ऐसे विलय की सिफारिश 1991 में नरसिम्हन समिति ने की थी। लेकिन भारतीय स्टेट बैंक को ऐसे उपयुक्त वक्त का इंतजार करना चाहिए था जब उसकी सहयोगी बैंकों पर एनपीए का बोझ कम होता। जिन पांच बैंकों का विलय हुआ है, उन्हें 2016-17 में जितना नुकसान हुआ था, स्टेट बैंक को उससे कम शुद्ध मुनाफा हुआ था। इसका मतलब साफ है। जब देश के सबसे बड़े बैंक में इससे जुड़े बैंकों के विलय के बाद यह स्थिति बन सकती है तो दूसरे बैंकों के मामले में स्थिति और बुरी हो सकती है।

उदारीकरण के बाद बैंकों का विलय लाभकारी नहीं

लोगो, ब्रांडिंग और प्रबंधन से लेकर अहम मसलों में इन पांच बैंकों में स्टेट बैंक की भूमिका रही है। ऐसे में इस विलय के आर्थिक फायदे तभी होंगे जब कर्मचारियों और शाखाओं का संयोजन नए सिरे से होगा। लेकिन इसके लिए काफी इंतजार करना होगा। 1991 के बाद बैंकों के विलय के अच्छे नतीजे नहीं आए हैं।

ट्वीन बैंलेंस सीट की समस्या के लिए सरकारी बैंकों को सबसे अधिक जिम्मेदार ठहराया जाता है। इसमें कुछ सच्चाई हो सकती है। इन बैंकों ने जिन कारोबारों को कर्ज दिए वे चले नहीं लेकिन इन्होंने कर्ज देने का निर्णय वैसे दबावों में लिया जो उनके हाथ से बाहर थे। अनियमितता और भ्रष्टाचार के भी कुछ मामले थे लेकिन यह इकलौती वजह नहीं है।

सच्चाई यह है कि कुछ बैंकों ने कर्ज वसूलने और इनकी संरचना में संशोधन करने की कोशिशें कीं। कई मामलों में इन्साॅल्वेंसी ऐंड बैंकरप्शी कोड, 2016  के तहत कार्रवाई हो रही है। भारतीय रिजर्व बैंक ने कर्ज वाले निश्चित खातों पर कार्रवाई की जो रूपरेखा तैयार की है, उससे भी फायदा होगा लेकिन इसमें समय लगेगा। कुछ कर्ज लेने वालों ने कोर्ट के जरिए बैंकों की वसूली प्रक्रिया रोकने की कोशिशें की हैं। ऐसे में सरकार के पास सरकारी बैंकों में पैसे डालने के अलावा कोई और विकल्प बचा नहीं है।

साल दर साल बढ़ रहा है एनपीए

अब तक सरकार ने क्या किया है?  मार्च 2014 तक एनपीए कुल कर्जों का 4 प्रतिशत था। इस साल मार्च में यह बढ़कर 9.5 प्रतिशत यानी 7.28 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया। नरेंद्र मोदी सरकार ने 2015 के अगस्त में मिशन इंद्रधनुष शुरू किया था और इसे बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद बैंकिंग क्षेत्र को सबसे अहम कदम बताया था। लेकिन दो साल बाद भी यह खास राहत देने में नाकाम ही दिख रहा है। इसके तहत सबसे अधिक जोर बैंकों में और पैसे लगाने और इनके प्रबंधन के चयन प्रक्रिया को स्वतंत्र बनाने पर था। चार सालों में 70,000 करोड़ रुपये डालना पर्याप्त नहीं है। वित्त मंत्रालय ने इस साल के लिए तय 10,000  करोड़ रुपये से अधिक पैसे जरूरत के हिसाब से लगाने की बात कही है। सरकार को यह समझना चाहिए कि सरकारी बैंकों में पैसे लगाने के लिए सही समय का इंतजार करने की जरूरत नहीं है बल्कि इसका समय अब आ गया है।

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