राजनैतिक लड़ाई में उलझा सूचना आयुक्त की नियुक्ति

राज्य में अभी तक आयुक्त के चारों पद खाली पड़े हैं। एक मुख्य सूचना आयुक्त होने की वजह से उनके ऊपर सभी कामों का बोझ है, जिससे मामले निपटाने में देरी हो रही है। 2015 में सूचना आयुक्त अनिल शर्मा और प्रभात डबराल का कार्यकाल समाप्त हुआ था। इसके बाद मौजूदा सरकार ने साल 2017 में विनोद नौटियाल को सूचना आयुक्त की कुर्सी पर बैठाया था।
मई 2018 में सूचना आयुक्त राजेंद्र कोटियाल और 7 जून को सूचना आयुक्त एसएस रावत का कार्यकाल खत्म हुआ था। जिसके बाद से राज्य सूचना आयुक्त की कुर्सी खाली पड़ी है। ऐसा नहीं है कि इनकी नियुक्ति को लेकर कवायद न की गई हो। मीटिंगों में नियुक्ति को लेकर चर्चा तो हुई, लेकिन कभी विपक्ष और कभी सत्ता पक्ष के बीच नामों पर सहमति नहीं बन पाई।
बता दें, सूचना आयुक्त का चयन करने के लिए मुख्यमंत्री और सरकार के 1 कैबिनेट मंत्री के साथ-साथ नेता प्रतिपक्ष तय करते हैं। सत्ता और विपक्ष पक्ष अगर मान जाते हैं तो उसके बाद ही नियुक्ति हो पाती है। विपक्ष और सरकार की खींचतान की वजह से पीड़ितों की सैकड़ों फाइलें धूल फांक रही हैं। वहीं, आम जनमानस को भी काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
दरअसल, विपक्ष नहीं चाहता कि राज्य सरकार अपने चहेतों को इस पद पर बैठाए। यही कारण है कि, जब-जब सरकार ने अपने पसंदीदा नामों को बैठक में रखा तब-तब विपक्ष की नेता इंदिरा हृदयेश ने इसका विरोध किया। अब मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत यह कह रहे हैं, कि 10 जुलाई को एकबार फिर से सूचना आयुक्त के पदों को लेकर बैठक बुलाई जाएगी और उन्हें उम्मीद है कि इसमें कोई न कोई नतीजा जरूर निकलेगा।

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