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“अपर्णा” धमकियों के बाद भी ग़रीब बच्चों क पढ़ाने में जुटी

वो राज्य स्तर की एथलीट रह चुकी हैं, पढाई में होशियार थीं इसलिए पत्रकारिता भी कर चुकी हैं। लेकिन आज वो जरूरी सुविधाओं से वंचित बच्चों को उनका वाजिब हक दिलाने, उनको अपने पैरों पर खड़ा करने, उनको शिक्षित करने के लिये मेहनत कर रही हैं। दिल्ली (Delhi) से सटे गुडगांव (Gurgoan) में रहने वाली अपर्णा लक्ष्मी आज डेढ़ सौ से ज्यादा बच्चों को अकेले दम पर शिक्षित कर रही हैं। ऐसे बच्चे जो स्कूल नहीं जाते उनको वो पढ़ाने का काम करती हैं। जो गरीब बच्चे सरकारी स्कूल में जाते तो हैं लेकिन वो पढ़ाई में पीछे ना छूट जायें इसके लिए वो उन पर खास ध्यान देती हैं।

लखनऊ में पैदा हुई और वहीं पर पढ़ाई लिखाई करने वाली अपर्णा स्कूल और कॉलेज के दिनों में एथलीट भी रह चुकी हैं। वो कई बार राज्य स्तर की प्रतियोगिताओं में अपना नाम रोशन कर चुकी हैं, बावजूद इसके उन्होंने खेल को अपना करियर बनाने की जगह गरीब बच्चों को पढ़ाना ज्यादा बेहतर समझा। अपर्णा ने पढ़ाई खत्म करने के बाद पत्रकारिता के क्षेत्र में भी कदम रखा। कई साल तक इस क्षेत्र में काम करने के बाद जब वो लखनऊ से दिल्ली और उसके बाद गुडगांव आईं तो उन्होंने तय किया कि जरूरी सुविधाओं से वंचित बच्चों के लिए ही काम करेंगी।

अपर्णा ने बताया

जब मैं गुडगांव के झरसा गांव में आई तो देखा की आसपास कई इमारतें बन रही थीं और इन इमारतों को बनाने के लिये मजदूर दूसरे राज्यों से यहां पर आते थे। जिनके बच्चे स्कूल नहीं जाते, क्योंकि एक तो ये तय नहीं होता था कि वो कितने दिन किसी जगह पर काम करेंगे और दूसरा उनके पास कोई ऐसा पहचान पत्र नहीं होता था जिसको दिखाकर उनके बच्चों का किसी स्कूल में दाखिला मिल जाये। ऐसे में वो बच्चे दिन भर खाली घूमा करते थे।

इस तरह अपर्णा ने साल 2012 में रेडियंट किड्स मल्टी एक्टिविटी सेंटर (Radiant Kids Multi Activity Center) की नींव रखी। इसके लिए उन्होंने शुरूआत में आसपास काम कर रहे दूसरे राज्यों से आये मजदूरों से बात की और उनको समझाया कि उनके बच्चों के लिए शिक्षा कितनी जरूरी है। जिसके बाद उन्होंने 45 बच्चों को पढ़ाने का काम शुरू किया। अपने बच्चों को पढ़ता देख उनके माता पिता काफी खुश हुए और दूसरे मजदूर भी उनके पास अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए भेजने लगे। अपर्णा बताती हैं कि छह महीने के अंदर ही पढ़ने वाले बच्चों की संख्या ढाई सौ तक पहुंच गई। इस दौरान वो बच्चों को पढ़ाई से जुड़ी बेसिक जानकारी ही देती थी।

एक ओर अपर्णा दूसरे राज्यों से आए मजदूरों के बच्चों को पढ़ाने का काम कर रही थीं तो दूसरी ओर स्थानीय लोगों ने उनका विरोध करना शुरू कर दिया। क्योंकि वो लोग नहीं चाहते थे कि ये बच्चे पढ़ लिख कर समझदार बन सकें। इसलिए कई बार लड़ाई झगड़े वाले हालात बन जाते थे। इतना ही नहीं मामला ज्यादा बढ़ने पर कई बार बात पुलिस तक पहुंच जाती थी। लोगों के विरोध के बावजूद अपर्णा ने दूसरे राज्यों से आये मजदूरों के बच्चों को पढ़ाना नहीं छोड़ा और वो लगातार अपने मिशन में जुटी रहीं। आज अपर्णा का ये स्कूल दो पालियों में चलता है और हर पाली 3 घंटों की होती है। पहली पाली सुबह 9 बजे से दोपहर 12 तक तक चलती है, इसमें वो बच्चे पढ़ने के लिए आते हैं जो स्कूल नहीं जाते। जबकि दूसरी पाली दोपहर 3 बजे से शाम 6 बजे तक चलती है। इसमें स्कूल जाने वाले बच्चे आते हैं। अपर्णा के पास आने वाले बच्चों की उम्र 7 साल से 17 साल तक के बीच है। वो इन बच्चों को अंग्रेजी, गणित और कम्प्यूटर की ट्रेनिंग देती हैं। इसके अलावा पढ़ाई के साथ ये नृत्य संगीत, ऑर्ट एंड क्रॉफ्ट, योग, कराटे और दूसरी तरह की गतिविधियां कराती हैं। जिन बच्चों के लिए दुनिया उनका छोटा सा घर और परिवार होता है उनको अपर्णा समय-समय पर अलग-अलग जगहों की सैर के लिए ले जाती हैं। पढ़ाई के साथ-साथ वो उनको फिल्में दिखाती हैं, विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बच्चों के साथ हिस्सा लेती हैं, अलग-अलग म्यूजियम में घुमाने ले जाती हैं, इन बच्चों के जरिये वो थियेटर आयोजित करती हैं ताकि पढ़ाई के साथ-साथ इन बच्चों के अंदर छिपे हुनर को दुनिया पहचान सके।

अकेले दम पर पढ़ाने में जुटी अपर्णा इन बच्चों की पढ़ाई और दूसरी गतिविधियों का खर्चा बिना किसी सरकारी मदद के खुद ही उठाती हैं। इस काम में उनके पति सबसे ज्यादा मदद करते हैं और वो खुद भी अपने खर्चे में कटौती कर इन बच्चों का भविष्य बेहतर बनाने में जुटी रहती हैं। बावजूद इसके आज भी उनको स्थानीय लोगों के विरोध को झेलना पड़ता है। अपर्णा के मुताबिक,

आज भी कई बार आसपास के लोग हमारे बच्चों पर गलत आरोप लगाते हैं और इस कोशिश में जुटे रहते हैं कि ये बच्चे ज्यादा पढ़ लिख ना लें।

आज करीब डेढ़ सौ से ज्यादा बच्चों को पढ़ा रही अपर्णा की और भी कई तरह की दिक्कतें हैं। उनके पास इन बच्चों को पढ़ाने के लिए अपनी कोई जगह नहीं है, इसलिए वो किराये में जगह लेकर इन बच्चों को पढ़ाने और उनका भविष्य बेहतर बनाने में लगी रहती हैं। वो बताती हैं कि पिछले 4 सालों के दौरान कई बार जगह बदलने को मजबूर हुई हैं। बावजूद इसके आज भी अपर्णा में इन बच्चों की पढ़ाई को लेकर उत्साह में कोई कमी नहीं आई है। अपर्णा के पास अपनी 8 लोगों की एक छोटी सी टीम है। इनके अलावा कई वालंटियर भी बच्चों को पढ़ाने के काम में मदद करते हैं। तमाम परेशानियों को नजरअंदाज करते हुए अपर्णा इस काम को और आगे बढ़ाना चाहती हैं। उनकी कोशिश है कि जो बच्चे स्कूल नहीं जाते उनको पढ़ाने के लिए मोबाइल वैन जैसी सेवा शुरू की जाये, इसके लिए उनको तलाश है ऐसे संगठन की जो उनके इस काम में आर्थिक मदद कर सके।

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