पहाड़ों में कैसे पहुंचेगी घायलों तक एंबुलेंस

रविवार को धुमाकोट में हुए हादसे के बाद एक बार राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था की कमियां दुनिया के सामने आ गईं. स्थिति यह रही कि राहत कार्य में लगे पुलिस और एसडीआरएफ़ कर्मियों के पास घायलों और शवों को उठाने के लिए स्ट्रेचर तक नहीं थे. हालात इतने ख़राब हैं कि मुख्यमंत्री तक को यह कहना पड़ा कि हादसे होने पर प्रभावितों तक राहत पहुंचाने में देर हो जाती है. लेकिन देवभूमि की त्रासदी देखिए राज्य सरकार और 108 एंबुलेंस चलाने वाली कंपनी जीवीके में जारी खींचतान के चलते एंबुलेंस सेवा हांफ़ रही तो देहरादून में दसियों एंबुलेंस खड़े-खड़े सड़ रही हैं.

धुमाकोट में हुए बस हादसे में 48 लोगों की मौत हो गई थी. इस घटना ने एक बार फिर प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है. सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत मौके पर पहुंचे तो उन्हें भी जनता का गुस्सा झेलना पड़ा. लोगों के गुस्से को देखते हुए उन्होंने भी मान लिया कि इस सिस्टम में  लोगों को राहत पहुंचाने में अक्सर देर हो जाती है. प्रभावितों का गुस्सा तो समझ आता है लेकिन सीएम की बेबसी नहीं. आखिर जिस सिस्टम के हाथों हार मानते त्रिवेंद्र सिंह रावत दिख रहे हैं वह सुधारने का ज़िम्मा भी उन्हीं का है. मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की ज़िम्मेदारी इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि स्वास्थ्य विभाग भी उन्हीं के पास है. और इसलिए एंबुलेंस सेवा दुरुस्त रहे, प्रभावितों तक समय पर पहुंचे बतौर स्वास्थ्य मंत्री इसकी पहली ज़िम्मेदारी भी उन्हीं पर है, मुख्यमंत्री के रूप में अंतिम तो है ही.

देहरादून के स्वास्थ्य निदेशालय में के एक कोने में 61 एंबुलेंस को पिछले 3 महीनों से ऐसे रखा गया है ताकि किसी की नज़रें उन पर न पड़ जाएं. एंबुलेंस जिन्हें इस समय प्रदेश की जनता को राहत देने के लिए सड़कों पर होना चाहिए था, स्वास्थ्य मुख्यालय के पीछे झाड़ियों में छुपी हुई हैं. मज़ेदार बात यह है कि सरकार के एक साल पूरे होने पर इन 61 एंबुलेंस को बाकायदा प्रदर्शित किया गया था और इन्हें पहाड़ों में लोगों को ज़रूरत के समय राहत देने की सरकार की कोशिशों का प्रतीक बताया गया था. लेकिन यह कोशिशें कितनी गंभीर हैं यह इसी से पता चलता है कि इन एंबुलेंस में लगने वाले जीवन रक्षक उपकरण अभी तक लगे ही नहीं हैं.

स्वास्थ्य महानिदेशक टीडी पंत कहते हैं कि दावा करते हैं कि एंबुलेंस में जीवन रक्षक उपकरण लगाने के लिए टेंडर हो गए हैं और एक महीने में ये एंबुलेंस सड़कों पर दौड़ने लगेंगी. हालांकि स्वास्थ्य विभाग के काम करने की रफ़्तार को देखते हुए लगता नहीं कि ये 61 एंबुलेंस मॉनसून में अपने छुपने के इस अड्डे से बाहर निकल पाएंगी. मॉनसून के बाद इनका क्या हाल होगा इसका भी अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

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