उत्तराखंड में सभी जाति के लोगो को मंदिर जाने की अनुमति -HC

नैनीताल हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि उच्च जाति के पुजारी किसी भी पूजा स्थल पर किसी भी निचली जाति के व्यक्ति के लिए पूजा करने से इनकार नहीं कर सकता है. अदालत ने कहा कि संविधान की धारा 14, 15(2), 17, 19, 21, 25, 29(2), 38, 46 और 51-ए के अनुसार राज्य के किसी भी मंदिर में किसी भी जाति का व्यक्ति प्रवेश कर सकता है. अदालत ने यह भी कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए उचित प्रशिक्षण प्राप्त और योग्य व्यक्ति को राज्य में मंदिर का पुजारी बनाया जा सकता है, चाहे वह किसी भी जाति का हो.

न्यायमूर्ति राजीव शर्मा और न्यायमूर्ति लोक पाल सिंह की खंडपीठ ने 15 जून को यह फ़ैसला सुनाया था जिसे बुधवार को उपलब्ध करवाया गया. अदालत ने यह फ़ैसला 2016 में हरिद्वार में एक धर्मशाला में संत रविदास की मूर्ति तक अलग सीढ़ियां बनाए जाने के लिए सरकार के 42 लाख रुपये जारी करने के फ़ैसले  को चुनौती देने वालली याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए.

याचिका का निस्तारण करते हुए खंडपीठ ने यह भी कहा कि आम हिंदुओं की पूजा के लिए खुले किसी मंदिर से किसी व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर निकालना संविधान की धारा 17 का उल्लंघन होगा. याचिका में कहा गया था कि चूंकि मूर्ति अनुसूचित जाति के संत की है इसलिए ऊंची जाति के पुजारी निचली जाति के तीर्थयात्रियों की दी दक्षिण स्वीकार नहीं करते हैं. याचिका में यह भी कहा गया है कि पुजारी इन तीर्थयात्रियों के लिए अनुष्ठान करने से भी इनकार कर देते हैं.

खंडपीठ ने हरिद्वार ज़िला प्रशासन को आदेश दिया कि सीढ़ी को मौजूदा स्थान से हटाने से पहले वह अनुसूचित जाति-जनजाति के संबंधित पक्षों से बात करे. अदालत ने यह भी कहा कि चूंकि हर की पौड़ी के पास संत रवि दास का एक ही मंदिर है इसलिए सरकार को तीन हफ़्ते के अंदर उसके आस-पास के इलाके के सौंदर्यीकरण के लिए हर संभव कदम उठाना चाहिए.

 

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