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200 करोड़ खर्च के बाद भी अधर में है पुल का निर्माण

अगर इस पुल को चुनावी ब्रीज कहा जाए तो शायद गलत नहीं होगा। क्योंकि हर चुनाव में इस ब्रीज का निर्माण पूरा करने का वादा किया जाता है जो कभी पूरा नहीं हो पाता। इस वादे की मदद से नेता सत्ता की कुर्सी तो तय कर लेते हैं लेकिन विकास का कुछ अता-पता नहीं रहता।
डेढ़ लाख से अधिक की आबादी का यह इलाका विकास से आज भी कोसों दूर है। चुनाव में सीट जीतने के बाद इन्हें पूछने वाला तक कोई नहीं मिलता। लेकिन इस पुल को मुद्दा बनाकर राजनीति चमकाने और विधानसभा का सफर तय करने का काम जरूर हो जाता है। भले पुल का निर्माण हो या न हो लेकिन चुनाव के मैनिफेस्टो में ये पुल अमर हो गया है।

निर्माण कार्य की जांच की मांग
पुल के मुद्दे को उठाते हुए भाजपा के वरिष्ठ नेता खेम सिंह चौहान ने निर्माण में लगी कंपनी के खिलाफ जांच की मांग की है। उन्होंने कहा कि इतने साल बीतने और करीब दो सौ करोड़ खर्च होने के बाद भी प्रतापनगर क्षेत्र के करीब डेढ़ लाख आबादी वाले उत्तरकाशी जिले को सजा मिल रही है जो कि एकदम गलत है।

इसके साथ ही उन्होंने कहा कि पुल निर्माण में लगी कंपनी से हुए समझौते के मुताबिक पुल को अगस्त 2017 तक बनकर तैयार हो जाना चाहिए था, लेकिन पुल निर्माण में लगी गुप्ता एसोसिएट और अधिकारियों के उदासीनता के कारण समय से पुल का निर्माण नहीं हो पाया।

उन्होंने पुल निर्माण में लगी कंपनी और लेट-लतीफी करने वाले अधिकारियों के खिलाफ जांच की मांग की है। साथ ही सरकार से बांध प्रभावित प्रतापनगर और उत्तरकाशी गाजणा पट्टी के लोगों को मुआवजे के तौर पर क्षेत्र में आइटीआई, मेडिकल कॉलेज और अन्य संस्थान खोलने के साथ ही टिहरी बांध प्रभावितों को भूमिधरी का अधिकार दिए जाने की मांग भी की है।

जानें पुल की कहानी
टिहरी झील बनने के बाद से जिला मुख्यालय के प्रतापनगर से दूरी कम करने के लिए मई 2006 में डोबरा और चांटी को जोड़कर एक पुल बनाने का फैसला लिया गया था। तत्कालीन सीएम एनडी तिवारी की सरकार में पुल को स्वीकृति मिली थी जिसके कुछ समय बाद ही सर्वे का काम शुरू किया गया था।

2007 में भाजपा के सत्ता में आते ही पुल के डिजाइन में कमी पाई गई और पुल के निर्माण कार्य को रोक दिया गया। लेकिन तब से अबतक पुल के डिजाइन की रजिस्ट्री सहित सर्वे और टॉवरों में करीब 145 करोड़ रुपये से अधिक खर्च हो गए हैं तब भी अबतक पुल नहीं बन पाया है।

जानकारी के मुताबिक, लोनिवि ने डिजाइन बनने से पहले ही करीब 80 करोड़ का सामान खरीद लिया जो कि अब बर्बाद हो रहा है। 2015 में गढ़वाल कमिश्नर को प्रकरण की जांच करने के आदेश दिए गए जिसमें लोनिवि अफसरों की गलती की बात सामने आई, लेकिन अबतक कोई भी कार्रवाई नहीं हो पाई है।

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